--अनिल बिहारी श्रीवास्तव
अहम गोपनीय दस्तावेजों को उजागर कर अमेरिका सरकार को परेशान कर देने वाली वेबसाइट विकीलीक्स की ताजा घोषणा से दुनिया भर के कर चोरों, भ्रष्ट तत्वों और गैर-कानूनी ढंग से कमाई कर उसे विदेशी बैंकों में जमा करने वालों की नींद उड़ गई होगी। विकीलीक्स के अनुसार उसे स्विस बैंकों के दो हजार ऐसे खातों का पता चला है कि जिनमें खरबों रुपयों के बराबर की अवैध कमाई जमा है। ऐसा बताया जा रहा है कि इनमें ४० राजनेताओं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रमुखों के गोपनीय खातों का भी विवरण है। उल्लेखनीय है कि विकीलीक्स की इस घोषणा के लगभग साथ एक अन्य चौंकाने वाली खबर आई । जर्मन बैंक द्वारा सौंपी गई सूची में २८ भारतीयों के नाम हैं। इन नामों का खुलासा अभी नहीं हुआ है। माना जा रहा है कि इनमें कुछ राजनेताओं, नौकरशाहों और उद्योगपतियों के नाम निश्चित रूप से होंगे।
विकीलीक्स के पिछले खुलासों से सबसे अधिक परेशानी अमेरिका को हुई क्योंकि कुछ ऐसे कड़वे सच सामने आए जिनकी जानकारी होते ही उनके प्रति अनभिज्ञता का स्वांग किया जाता था। विकीलीक्स अगर स्विस बैंक में अवैध कमाई रखने वालों के नाम सही-सही बताने में कामयाब हो जाती है तब भारत सहित कई विकासशील देशों में इसका व्यापक प्रभाव पडऩे की संभावना है। दस्तावेज बताते हैं कि विभिन्न विदेशी बैंकों में लगभग १.४ खरब अमेरिकी डालर की गैर-कानूनी कमाई जमा है। यह बहुत बड़ी रकम है। किसी कंगाल देश को मिल जाए तो वह दौडऩे लगेगा। पिछले दिनों ग्लोबल फायनेंशियल ट्रांसपरेन्सी ने दावा किया कि अकेले स्विस बैंकों में भारतीयों ने २०.८५ लाख करोड़ जमा कर रखे हैं। भारत का सकल घरेलु उत्पादन ५० से ५५ लाख करोड़ रुपये के बीच है। यह गणित आसानी से समझा जा सकता है कि स्विस बैंकों में जमा हमारे राष्ट्र के २०.८५ लाख करोड़ रुपये वापस सरकारी खजाने में आ जाएं तब न जाने कितनी विकास परियोजनाओं को गति मिल जाएगी। लेकिन यह वया इतना आसान काम है? क्या भारत सरकार में इतनी इच्छाशक्ति है? ग्लोबल फायनेंसियल ट्रांसपरेन्सी की रिपोर्ट आने से पहले से ही विपक्षी दल भाजपा विदेशी बैंकों खासकर स्विस बैंकों में जमा राष्ट्र का धन वापस लाने के लिए जरूरी कदम उठाने की मांग करती आ रही है। ऐसा नहीं लगता कि सरकार की कान में जूं रेंगी हो। निश्चित रूप से यह जटिल और लंबी प्रक्रिया है लेकिन आम आदमी की अपेक्षा सिर्फ इतनी है कि सरकार प्रक्रिया तो शुरू करे। सबसे पहले मौजूदा कानून को और सख्त बनाया जाना चाहिए। टैक्स चोरी पर सिर्फ अर्थदंड के प्रावधान से काम नहीं चलेगा। काली कमाई पर आपराधिक मुकदमा दर्ज हो, ऐसे मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रेक अदालतों से करवाई जाए, सिर्फ एक अपील का प्रावधान रखें और दोष साबित होने पर संपत्ति राजसात किये जाने के साथ-साथ जेल में डाल दिया जाए। काला धन रखने वालों को चुनाव ल$डऩे से अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। जिस व्यक्ति का नैतिक पतन इस हद तक हो गया हो कि वह अवैध तरीकों से कमाई कर राष्ट्र के साथ विश्वासघात करे और उस कमाई को विदेशी बैंकों में जमा करवाये, ऐसे व्यक्ति को चुनाव लडऩे का अधिकार आखिर क्यों दिया जाए। ऐसे देशद्रोहियों का मताधिकार भी निलंबित किया जाना चाहिए।
बहरहाल, विश्वास करें कि विकीलीक्स की ताजा घोषणा ने विदेशी बैंकों में धन जमा करने वालों की नींद उड़ा दी है। सवाल यह है कि हमारी सरकार स्वयं जागी या वह अभी भी खर्राटे भर रही है? २जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले को लेकर आम आदमी में संप्रग सरकार की नीयत पर संदेह पैदा हो गया है। काला धन रखने वालों पर कार्रवाई करके सरकार अपने दामन में लगे भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने के आरोपों के छींटे कुछ हद तक साफ कर सकती है। काली कमाई करने वालों के मुंह काले कर उन्हें घुमाने का साहस सरकार दिखाये।
Tuesday, January 18, 2011
संवेदनशील मामले में भी राजनीति
-- अनिल बिहारी श्रीवास्तव
दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर दक्षिण दिल्ली के जंगपुरा में नूर मस्जिद की जमीन को दिल्ली विकास प्राधिकरण द्वारा अपने कब्जे में लिये जाने को लेकर मुस्लिम समुदाय के लोगों की प्रतिक्रिया कुछ हद तक स्वाभाविक मानी जा सकती है लेकिन इस मुद्दे पर कतिपय राजनेताओं की उछलकूद आश्चर्यजनक है। यह विश्वास और अधिक मजबूत हुआ है कि हमारे कुछ राजनेताओं को वोट बैंक की राजनीति से हटकर सूझता ही नहीं है। वे लोगों की भावनाओं का शोषण करते समय एक पल के लिए विचार नहीं करते कि देश में कानून का शासन नाम की कोई चीज है, उनके व्यवहार से कानून एवं व्यवस्था की समस्या खड़ी हो सकती है और साम्प्रदायिक उन्माद फैल सकता है। डीडीए ने गत १२ जनवरी को उस जमीन पर बने निर्माण को ध्वस्त कर दिया था। यह एक अलग बात है कि इस कार्रवाई के कुछ घण्टों बाद ही, रातों रात उस भूखण्ड पर अस्थायी मस्जिद खड़ी कर दी गई और नूर मस्जिद नाम से एक बोर्ड लगा दिया गया। वहां तैनात पुलिस वाले कहते है कि उन्होंने ऐसा करने से लोगों को रोका था लेकिन वे नहीं माने। कितनी हैरानी की बात है कि लोग नही माने तो पुलिस वाले चुपचाप उन्हें देखते रहे। जाहिर है कि इस मामले में राजनेताओं की दिलचस्पी को देखते हुए दिल्ली विकास प्राधिकरण और पुलिस ने भी सब चलता है वाला रवैया अपना लिया होगा।
ऐसा कहा जा रहा है कि वह धार्मिक स्थल लगभग ३० वर्षो से वहां था। लेकिन इस बारे में कितने लोग मुंह खोल रहे है कि वह निर्माण वैध था अथवा अवैध? गत शुक्रवार को दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ढहा दिये गए ढांचा स्थल पर नमाज अता की। उसके साथ मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों का वहां जाने की वजह समझ में आती है। प्रश्न यह है कि समाजवादी पार्टी के अगुआ मुलायम सिंह यादव उस समय वहां क्या कर रहे थे? यदि संवेदनशील मामलों में राजनीति में माहिर मुलायम कही धमक पड़ें ऐसी स्थिति में भला अन्य राजनेता चुप कैसे बैठेंगे? राजद के विधायक शोएब इकबाल भी ढहाए गए ढांचे की जगह पर गए और नमाज अता की। समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता अमरसिंह के साथ फिल्मी दुनिया से राजनीति में पदार्पण करने वाली सुंदरी जयाप्रदा आ धमकी। स्थानीय कांग्रेस विधायक तरविंदर सिंह मरवाह को पहुंचना ही था। आखिर मामला वोट बैंक का जो है।
इन घटनाक्रमों के बीच एक नई और साहसिक बात यह हुई कि जंगपुरा रेजिडेंटस एसोसिएशन ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग की है। यहां शेष राजनेताओं की बात करके उनका अनावश्यक रूप महत्व नहीं बढ़ाना चाहते लेकिन मुलायम सिंह यादव आखिर कब क्षुद्र स्वार्थो के लिए स्तरहीन राजनीति से मुक्त हो पाएंगे? मुलायम सिंह यादव को यह भ्रम हो गया है कि अपने पुराने सियासी हथकंडों के बूते वह उन मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने में सफल हो जाएंगे जो पिछले चुनावों मे सपा को ठेंगा दिखा चुके हैं। लंबी राजनीतिक पारी के बावजूद उनका कुलाटी खाना जारी है। मुलायम ऐसा कोई मौका नही छोडऩा चाहते जिससे वह मुस्लिम मतदाताओं के प्रति अपनी वफादारी साबित कर सकें। वैसे उन का पी.आर. कमजोर है। उन्हें यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि उनके पुन: बदलते व्यवहार और हथकंडों पर आम आदमी क्या सोच रहा है। मुलायम की गिरगिटिया राजनीति से मुस्लिम मतदाता परिचित हो चुका है।
दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर दक्षिण दिल्ली के जंगपुरा में नूर मस्जिद की जमीन को दिल्ली विकास प्राधिकरण द्वारा अपने कब्जे में लिये जाने को लेकर मुस्लिम समुदाय के लोगों की प्रतिक्रिया कुछ हद तक स्वाभाविक मानी जा सकती है लेकिन इस मुद्दे पर कतिपय राजनेताओं की उछलकूद आश्चर्यजनक है। यह विश्वास और अधिक मजबूत हुआ है कि हमारे कुछ राजनेताओं को वोट बैंक की राजनीति से हटकर सूझता ही नहीं है। वे लोगों की भावनाओं का शोषण करते समय एक पल के लिए विचार नहीं करते कि देश में कानून का शासन नाम की कोई चीज है, उनके व्यवहार से कानून एवं व्यवस्था की समस्या खड़ी हो सकती है और साम्प्रदायिक उन्माद फैल सकता है। डीडीए ने गत १२ जनवरी को उस जमीन पर बने निर्माण को ध्वस्त कर दिया था। यह एक अलग बात है कि इस कार्रवाई के कुछ घण्टों बाद ही, रातों रात उस भूखण्ड पर अस्थायी मस्जिद खड़ी कर दी गई और नूर मस्जिद नाम से एक बोर्ड लगा दिया गया। वहां तैनात पुलिस वाले कहते है कि उन्होंने ऐसा करने से लोगों को रोका था लेकिन वे नहीं माने। कितनी हैरानी की बात है कि लोग नही माने तो पुलिस वाले चुपचाप उन्हें देखते रहे। जाहिर है कि इस मामले में राजनेताओं की दिलचस्पी को देखते हुए दिल्ली विकास प्राधिकरण और पुलिस ने भी सब चलता है वाला रवैया अपना लिया होगा।
ऐसा कहा जा रहा है कि वह धार्मिक स्थल लगभग ३० वर्षो से वहां था। लेकिन इस बारे में कितने लोग मुंह खोल रहे है कि वह निर्माण वैध था अथवा अवैध? गत शुक्रवार को दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ढहा दिये गए ढांचा स्थल पर नमाज अता की। उसके साथ मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों का वहां जाने की वजह समझ में आती है। प्रश्न यह है कि समाजवादी पार्टी के अगुआ मुलायम सिंह यादव उस समय वहां क्या कर रहे थे? यदि संवेदनशील मामलों में राजनीति में माहिर मुलायम कही धमक पड़ें ऐसी स्थिति में भला अन्य राजनेता चुप कैसे बैठेंगे? राजद के विधायक शोएब इकबाल भी ढहाए गए ढांचे की जगह पर गए और नमाज अता की। समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता अमरसिंह के साथ फिल्मी दुनिया से राजनीति में पदार्पण करने वाली सुंदरी जयाप्रदा आ धमकी। स्थानीय कांग्रेस विधायक तरविंदर सिंह मरवाह को पहुंचना ही था। आखिर मामला वोट बैंक का जो है।
इन घटनाक्रमों के बीच एक नई और साहसिक बात यह हुई कि जंगपुरा रेजिडेंटस एसोसिएशन ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग की है। यहां शेष राजनेताओं की बात करके उनका अनावश्यक रूप महत्व नहीं बढ़ाना चाहते लेकिन मुलायम सिंह यादव आखिर कब क्षुद्र स्वार्थो के लिए स्तरहीन राजनीति से मुक्त हो पाएंगे? मुलायम सिंह यादव को यह भ्रम हो गया है कि अपने पुराने सियासी हथकंडों के बूते वह उन मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने में सफल हो जाएंगे जो पिछले चुनावों मे सपा को ठेंगा दिखा चुके हैं। लंबी राजनीतिक पारी के बावजूद उनका कुलाटी खाना जारी है। मुलायम ऐसा कोई मौका नही छोडऩा चाहते जिससे वह मुस्लिम मतदाताओं के प्रति अपनी वफादारी साबित कर सकें। वैसे उन का पी.आर. कमजोर है। उन्हें यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि उनके पुन: बदलते व्यवहार और हथकंडों पर आम आदमी क्या सोच रहा है। मुलायम की गिरगिटिया राजनीति से मुस्लिम मतदाता परिचित हो चुका है।
जुबानी बल्लेबाजी और दादागिरी
--अनिल बिहारी श्रीवास्तव
कोलकाता से खबर आई है कि कोलकाता नाइट राइट्र्स द्वारा पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान सौरभ गांगुली को आईपीएल-४ सत्र के लिए नहीं खरीदे जाने से गांगुली के प्रशंसक नाराज हैं। सौरव गांगुली के प्रशंसकों के संगठन ने कह दिया है, ‘‘नो दादा नो केकेआर।’’ उन्होंने सडक़ों पर प्रदर्शन का कार्यक्रम तय कर रखा है। यह ज्ञात नहीं हो पा रहा है कि अपने प्रशंसकों की नाराजगी और उनके तेवरों पर स्वयं सौरव गांगुली क्या राय रखते हैं लेकिन उन्हें इस बात के लिए खुश होना चाहिए कि देश के कुछ पूर्व दिग्गज खिलाड़ी और ताकतवर राजनेताओं ने सौरव गांगुली की ओर से जुबानी बल्लेबाजी शुरू कर दी है। शिवसेना नेता बाल ठाकरे ने गत दिवस ‘सामना’ में अपनी सम्पादकीय में कोलकाता नाइट राइड्र्स के फ्रैंचाइजी, अभिनेता शाहरुख खान को अपने अंदाज में गरियाया। ठाकरे को शिकायत है कि शाहरूख ने पिछले सत्रों में खूब धन कूटा अब गांगुली जैसे बेहतरीन खिलाड़ी को दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल बाहर फेंका। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान तथा धाकड़ आल राउंडर कपिल देव भी सौरव गांगुली के नहीं बिक पाने पर हैरान हैं। उधर, लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी इस बात को लेकर स्तब्ध हैं कि सौरव गांगुली जैसे हीरे को आईपीएल के १० फ्रैंचाइजी में से किसी ने भी नहीं खरीदा। स्वयं माकपाई राजनीति से पीडि़त सोमनाथ चटर्जी को सौरव गांगुली की पीड़ा का अहसास होगा।
आईपीएल चौथे सत्र के लिए सौरव गांगुली के नहीं बिक पाने के पीछे दर्जनों कारण गिनवाये जा सकते हैं। इस विषय में काफी कुछ लिखा और बोला जा चुका है। कुछ लोग इसे शाहरुख द्वारा किया गया विश्वासघात बता रहे तो वहीं कुछ को आईपीएल बोली में गहरी राजनीतिक साजिश की गंध तक महसूस हो रही है। कोलकाता नाइट राइड्र्स की ओर से सफाई दे दी गई है कि गांगुली का प्रदर्शन भले ही संतोषजनक रहा हो लेकिन इस बार खिलाडिय़ों को खरीदते समय जीत की संभावनाओं को ध्यान में रखा गया। यह स्पष्टीकरण तर्क संगत है। जब आप कोई काम पूरे व्यवसायिक दृष्टिकोण के साथ करते हैं, ऐसी स्थिति भावनाओं और भावुकता के बहाव से बचा जाता है। आईपीएल फैंचाइजी ने खिलाड़ी खरीदते समय इसी बात पर जोर दिया। नि:संदेह सौरव गांगुली का अतीत कीर्तिमानों से भरा पड़ा है तथा उनकी गणना दुनिया के सफलतम क्रिकेट कप्तानों में होती है। आज स्थिति उससे उलट है। पिछले कुछ समय से वह क्रिकेट को पूर्व की तरह समय नहीं दे पा रहे। फटाफट क्रिकेट के लिए जरूरी समझ बूझ और स्टेमिना में फ्रैंचाइजी महसूस कर रहे थे। फिर उनका ऊंचा दाम एक अड़चन बन गया। शाहरुख खान समझ रहे हैं कि सौरव गांगुली को नहीं लेने से कोलकाता में सौरव समर्थक हंगामा कर सकते हैं। शायद इसीलिए उन्होंने सौरव गांगुली के समक्ष मेंटर बनने का प्रस्ताव रखा था। दादा की कोलकाता में दादागिरी से वाकिफ लोग जानते हैं कि उनका अहं सबसे बड़ी अड़चन रहा है। एक पल के लिए शाहरुख खान पर लगाये जा रहे आरोपों का सच मान लें लेकिन विचार करें कि शेष फैंचाइजी ने गांगुली को क्यों नहीं खरीदा? आईपीएल खेल में व्यवसाय है। टीम खरीदने वालों का उद्देश्य धन कमाना है। वे जोखिम क्यों उठाना चाहेंगे? आप गांगुली के प्रशंसक है इससे आपको यह अधिकार नहीं मिल जाता कि अपने प्रिय खिलाड़ी को खरीदने के लिए आप किसी व्यवसायी पर दबाव डालें। यह तो जबरन की दादागिरी हुई।
कोलकाता से खबर आई है कि कोलकाता नाइट राइट्र्स द्वारा पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान सौरभ गांगुली को आईपीएल-४ सत्र के लिए नहीं खरीदे जाने से गांगुली के प्रशंसक नाराज हैं। सौरव गांगुली के प्रशंसकों के संगठन ने कह दिया है, ‘‘नो दादा नो केकेआर।’’ उन्होंने सडक़ों पर प्रदर्शन का कार्यक्रम तय कर रखा है। यह ज्ञात नहीं हो पा रहा है कि अपने प्रशंसकों की नाराजगी और उनके तेवरों पर स्वयं सौरव गांगुली क्या राय रखते हैं लेकिन उन्हें इस बात के लिए खुश होना चाहिए कि देश के कुछ पूर्व दिग्गज खिलाड़ी और ताकतवर राजनेताओं ने सौरव गांगुली की ओर से जुबानी बल्लेबाजी शुरू कर दी है। शिवसेना नेता बाल ठाकरे ने गत दिवस ‘सामना’ में अपनी सम्पादकीय में कोलकाता नाइट राइड्र्स के फ्रैंचाइजी, अभिनेता शाहरुख खान को अपने अंदाज में गरियाया। ठाकरे को शिकायत है कि शाहरूख ने पिछले सत्रों में खूब धन कूटा अब गांगुली जैसे बेहतरीन खिलाड़ी को दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल बाहर फेंका। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान तथा धाकड़ आल राउंडर कपिल देव भी सौरव गांगुली के नहीं बिक पाने पर हैरान हैं। उधर, लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी इस बात को लेकर स्तब्ध हैं कि सौरव गांगुली जैसे हीरे को आईपीएल के १० फ्रैंचाइजी में से किसी ने भी नहीं खरीदा। स्वयं माकपाई राजनीति से पीडि़त सोमनाथ चटर्जी को सौरव गांगुली की पीड़ा का अहसास होगा।
आईपीएल चौथे सत्र के लिए सौरव गांगुली के नहीं बिक पाने के पीछे दर्जनों कारण गिनवाये जा सकते हैं। इस विषय में काफी कुछ लिखा और बोला जा चुका है। कुछ लोग इसे शाहरुख द्वारा किया गया विश्वासघात बता रहे तो वहीं कुछ को आईपीएल बोली में गहरी राजनीतिक साजिश की गंध तक महसूस हो रही है। कोलकाता नाइट राइड्र्स की ओर से सफाई दे दी गई है कि गांगुली का प्रदर्शन भले ही संतोषजनक रहा हो लेकिन इस बार खिलाडिय़ों को खरीदते समय जीत की संभावनाओं को ध्यान में रखा गया। यह स्पष्टीकरण तर्क संगत है। जब आप कोई काम पूरे व्यवसायिक दृष्टिकोण के साथ करते हैं, ऐसी स्थिति भावनाओं और भावुकता के बहाव से बचा जाता है। आईपीएल फैंचाइजी ने खिलाड़ी खरीदते समय इसी बात पर जोर दिया। नि:संदेह सौरव गांगुली का अतीत कीर्तिमानों से भरा पड़ा है तथा उनकी गणना दुनिया के सफलतम क्रिकेट कप्तानों में होती है। आज स्थिति उससे उलट है। पिछले कुछ समय से वह क्रिकेट को पूर्व की तरह समय नहीं दे पा रहे। फटाफट क्रिकेट के लिए जरूरी समझ बूझ और स्टेमिना में फ्रैंचाइजी महसूस कर रहे थे। फिर उनका ऊंचा दाम एक अड़चन बन गया। शाहरुख खान समझ रहे हैं कि सौरव गांगुली को नहीं लेने से कोलकाता में सौरव समर्थक हंगामा कर सकते हैं। शायद इसीलिए उन्होंने सौरव गांगुली के समक्ष मेंटर बनने का प्रस्ताव रखा था। दादा की कोलकाता में दादागिरी से वाकिफ लोग जानते हैं कि उनका अहं सबसे बड़ी अड़चन रहा है। एक पल के लिए शाहरुख खान पर लगाये जा रहे आरोपों का सच मान लें लेकिन विचार करें कि शेष फैंचाइजी ने गांगुली को क्यों नहीं खरीदा? आईपीएल खेल में व्यवसाय है। टीम खरीदने वालों का उद्देश्य धन कमाना है। वे जोखिम क्यों उठाना चाहेंगे? आप गांगुली के प्रशंसक है इससे आपको यह अधिकार नहीं मिल जाता कि अपने प्रिय खिलाड़ी को खरीदने के लिए आप किसी व्यवसायी पर दबाव डालें। यह तो जबरन की दादागिरी हुई।
Friday, January 14, 2011
एक ही थैली के चट्टे-बट्टे
--अनिल बिहारी श्रीवास्तव
२६ जनवरी, गणतंत्र दिवस पर श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने के भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रम को भले ही राजनीति निरुपित किया जाए लेकिन भाजपा के इसके विरोध में जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मोहम्मद यासिन मलिक की धमकी को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। मोहम्मद यासीन मलिक ने कहा है कि २६ जनवरी को लाल चौक पर झंडा फहराया गया तो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में आग लग जाएगी। हैरानी इस बात को लेकर है कि जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला तक ने भाजपा को उक्त ध्वजारोहण कार्यक्रम को रद्द करने के लिए कहा है। उमर अब्दुल्ला को आशंका इस बात की है कि तिरंगा फहराये जाने से कश्मीर घाटी के अलगाववादी बवाल मचा सकते हैं। भाजपा नेतृत्व को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने के लिए मुख्यमंत्री ने वरिष्ठ नेता अटल बिहारी बाजपेयी के नाम का सहारा लिया है। उमर अब्दुल्ला का कहना है कि भाजपा नेता अटल बिहारी बाजपेयी ने कभी कट्टरपन नहीं दिखाया, अत: भाजपा को उसी लाइन पर चलना चाहिए। भाजपा के तिरंगा ध्वजारोहण के विरोध में न तो यासीन मलिक की धमकी पर आश्चर्य हुआ और ना ही उमर अब्दुल्ला की प्रतिक्रिया विशेष प्रभाव डालने वाली लगी। इन दोनों की लाइन और रणनीति अलग है। वे अपने व्यापक राजनीतिक और गैर-राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर ही ऐसी बातें बोल रहे हैं। इस घटनाक्रम के बीच मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रतिक्रिया को आप कैसे खारिज कर सकते हैं? चौहान ने उमर अब्दुल्ला और विवादास्पद लेखिका अरुंधति राय को एक ही तराजू में तौलते हुए इन दोनों के लिए सही जगह जेल बताई है। एक राष्ट्रवादी नागरिक से इसी तरह की प्रतिक्रिया की आशा की जाती है। विचार करें कि यासीन मलिक, उमर अब्दुल्ला और अरुंधति राय की सोच में अंतर कितना है? यासीन मलिक घोषित अलगाववादी नेता है। इस लोकतंत्र में मिली जरूरत से ज्यादा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चलते मलिक जैसे नेता दिल्ली से कोलकाता तक हमारे देश, हमारे सुरक्षा बलों और हमारी सरकारों के विरुद्ध जुबान चलाते दिख जाते हैं। तिरंगा फहराने पर समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में आग लग जाने की धमकी देने वाले ऐसे व्यक्तियों को हम झेल क्यों रहे हैं? यही बात अरुंधति राय जैसी सिरफिरी महिला के विषय में कही जा सकती है। माओवादियों और कश्मीरी अलगाववादियों के प्रति अरुंधति राय के प्रेम पर चुप रह जाना ठीक नहीं है। इस महिला को माओवादियों के बीच जंगलों में छोड़ दिया जाए या फिर यह महिला कश्मीरी अलगाववादियों के बीच साथ रहे। दोनों स्थितियां संभव नहीं होने पर लेखिका को जेल में डालना ही Ÿोष्ठ विकल्प होगा। उमर अब्दुल्ला एक नाकाम मुख्यमंत्री साबित हो चुके हैं। इसे उमर की असफलता ही मानें जो अलगाववादी तत्व सन् २०१० में लगभग ६ माह तक सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी करवाने में कामयाब होते रहे। वैसे भी कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग नहीं बताकर उमर अपनी अक्ल का प्रमाण दे चुके हैं। अब लाल चौक पर भाजपा के ध्वजारोहण कार्यक्रम का विरोध कर उमर अलगाववादियों के समक्ष अपना दब्बू चरित्र उजागर कर बैठे। जाहिर है कि या तो उमर अब्दुल्ला को अपने प्रशासन, पुलिस के अलावा सुरक्षा बलों की क्षमताओं पर भरोसा नहीं है या फिर वह अलगावादियों के हथकंडों से आतंकित हैं। ऐसे अटल सत्य के सामने यासीन मलिक, उमर अब्दुल्ला और अरुंधति राय के बीच भेद करना कठिन प्रतीत हो रहा है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने उमर और अरुंधति के संबंध में जो कहा उसमें गलत क्या है? दोनों एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं।
२६ जनवरी, गणतंत्र दिवस पर श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने के भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रम को भले ही राजनीति निरुपित किया जाए लेकिन भाजपा के इसके विरोध में जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मोहम्मद यासिन मलिक की धमकी को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। मोहम्मद यासीन मलिक ने कहा है कि २६ जनवरी को लाल चौक पर झंडा फहराया गया तो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में आग लग जाएगी। हैरानी इस बात को लेकर है कि जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला तक ने भाजपा को उक्त ध्वजारोहण कार्यक्रम को रद्द करने के लिए कहा है। उमर अब्दुल्ला को आशंका इस बात की है कि तिरंगा फहराये जाने से कश्मीर घाटी के अलगाववादी बवाल मचा सकते हैं। भाजपा नेतृत्व को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने के लिए मुख्यमंत्री ने वरिष्ठ नेता अटल बिहारी बाजपेयी के नाम का सहारा लिया है। उमर अब्दुल्ला का कहना है कि भाजपा नेता अटल बिहारी बाजपेयी ने कभी कट्टरपन नहीं दिखाया, अत: भाजपा को उसी लाइन पर चलना चाहिए। भाजपा के तिरंगा ध्वजारोहण के विरोध में न तो यासीन मलिक की धमकी पर आश्चर्य हुआ और ना ही उमर अब्दुल्ला की प्रतिक्रिया विशेष प्रभाव डालने वाली लगी। इन दोनों की लाइन और रणनीति अलग है। वे अपने व्यापक राजनीतिक और गैर-राजनीतिक हितों को ध्यान में रखकर ही ऐसी बातें बोल रहे हैं। इस घटनाक्रम के बीच मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रतिक्रिया को आप कैसे खारिज कर सकते हैं? चौहान ने उमर अब्दुल्ला और विवादास्पद लेखिका अरुंधति राय को एक ही तराजू में तौलते हुए इन दोनों के लिए सही जगह जेल बताई है। एक राष्ट्रवादी नागरिक से इसी तरह की प्रतिक्रिया की आशा की जाती है। विचार करें कि यासीन मलिक, उमर अब्दुल्ला और अरुंधति राय की सोच में अंतर कितना है? यासीन मलिक घोषित अलगाववादी नेता है। इस लोकतंत्र में मिली जरूरत से ज्यादा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चलते मलिक जैसे नेता दिल्ली से कोलकाता तक हमारे देश, हमारे सुरक्षा बलों और हमारी सरकारों के विरुद्ध जुबान चलाते दिख जाते हैं। तिरंगा फहराने पर समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में आग लग जाने की धमकी देने वाले ऐसे व्यक्तियों को हम झेल क्यों रहे हैं? यही बात अरुंधति राय जैसी सिरफिरी महिला के विषय में कही जा सकती है। माओवादियों और कश्मीरी अलगाववादियों के प्रति अरुंधति राय के प्रेम पर चुप रह जाना ठीक नहीं है। इस महिला को माओवादियों के बीच जंगलों में छोड़ दिया जाए या फिर यह महिला कश्मीरी अलगाववादियों के बीच साथ रहे। दोनों स्थितियां संभव नहीं होने पर लेखिका को जेल में डालना ही Ÿोष्ठ विकल्प होगा। उमर अब्दुल्ला एक नाकाम मुख्यमंत्री साबित हो चुके हैं। इसे उमर की असफलता ही मानें जो अलगाववादी तत्व सन् २०१० में लगभग ६ माह तक सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी करवाने में कामयाब होते रहे। वैसे भी कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग नहीं बताकर उमर अपनी अक्ल का प्रमाण दे चुके हैं। अब लाल चौक पर भाजपा के ध्वजारोहण कार्यक्रम का विरोध कर उमर अलगाववादियों के समक्ष अपना दब्बू चरित्र उजागर कर बैठे। जाहिर है कि या तो उमर अब्दुल्ला को अपने प्रशासन, पुलिस के अलावा सुरक्षा बलों की क्षमताओं पर भरोसा नहीं है या फिर वह अलगावादियों के हथकंडों से आतंकित हैं। ऐसे अटल सत्य के सामने यासीन मलिक, उमर अब्दुल्ला और अरुंधति राय के बीच भेद करना कठिन प्रतीत हो रहा है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने उमर और अरुंधति के संबंध में जो कहा उसमें गलत क्या है? दोनों एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं।
अन्नदाताओं को अनाज के लाले
--अनिल बिहारी श्रीवास्तव
मध्यप्रदेश में पिछले कुछ दिनों में किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने और आत्महत्या के प्रयासों के समाचारों ने समूचे देश का ध्यान एक बार फिर किसानों की समस्याओं की ओर खींचा है। यह सोचने पर हम विवश हुए हैं कि आखिर क्या कारण है जो सरकार चलाने वाले लोग अन्नदाताओं को ही भूखों मरने या उन्हें आत्महत्या जैसा कदम उठाने से नहीं रोक पा रहे हैं। हालांकि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने अथवा उनके आत्महत्या के प्रयासों को गंभीरता से लेकर कुछ कदम उठाते हुए प्रशासन को निर्देश दिये हैं लेकिन अभी उन निर्देशों का पालन और उसके प्रभाव का ऑकलन होना शेष है। हैरानी की बात कि इस कृषि प्रधान देश का कृषक ही सैकड़ों समस्याओं से जूझ रहा है। पहले महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके और कर्नाटक के किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने के मामले प्रकाश में आ चुके हैं। केंद्र और राज्य सरकारों के प्रति आमजन में नाराजगी काफी बढ़ी है। एक अनुमान के अनुसार इस देश में १९९७ से अब तक लगभग दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने के जो प्रमुख कारण सामने आते रहे हैं उनमें आर्थिक तंगी, मौसम की मार के चलते फसलों के बर्बाद हो जाने, बैंकों और निजी स्रोतों से लिये गये कर्ज की अदायगी नहीं कर पाने, बिजली और पानी की अपर्याप्त आपूर्ति, घटिया बीज और नकली खाद आदि के कारण पर्याप्त फसल नहीं आ पाना आदि हैं। आज एक ओर विश्व के अधिकांश भागों में जब कृषि में वैज्ञानिक साधनों का उपयोग कर भरपूर उत्पादन प्राप्त किया जा रहा है, ऐसे दौर में भारत के दो-चार राज्यों को छोडक़र शेष सभी स्थानों पर किसान परम्परागत साधनों के साथ बंधा हुआ है। कितने ही राज्यों में बिजली के खम्बे खड़े और तार खिंचे दिख जाते हैं। लेकिन विद्युत आपूर्ति चार-छह घंटे भी नहीं हो पाती। विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व व्यापार संगठन की मुक्त व्यापार नीतियों की मार भारतीय किसानों पर पड़ी है। कृषि उत्पादों के दाम इतने टूटे कि वे लागत तक नहीं निकाल पाते। उस पर बीज बिक्री से लेकर उत्पादन, वितरण तक में वैश्विक कारपोरेट की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष घुसपैठ ने किसानों को विचलित कर दिया है। इसके अलावा बिचौलियों ने उनके लाभ पर अलग डाका डाल रखा है। यह सुनिश्चित माना जाए कि इस देश में कम से कम सात राज्यों का किसान लगातार तनावग्रस्त रहता है। इनमें छोटे और सीमान्त किसानों की स्थिति अधिक खराब है। दरअसल, सरकारी तंत्र की ओर से सहयोग, समर्थन और मार्गदर्शन नहीं मिलने से ९५ प्रतिशत किसान समस्याओं से अकेले जूझते हैं। सफल हो गये तो ठीक वरना असफलता उनमें निराशा, कुण्ठा और तनाव पैदा करती है। सर्वेक्षण करा लिया जाए किस राज्य सरकार अथवा केंद्र ने किसानों की समस्याएं जानने स्थानीय निकायों, पंचायतों ,गैर सरकारी संगठनों से कभी कोई सीधी बात की? किसानों के लिए बनी कल्याणकारी योजनाओं, सहायता योजनाओं का लाभ किसानों तक कितना पहुंच पा रहा है? किसानों को बैंक ऋण सहायता राज्य सरकार की गारंटी पर मिलनी चाहिए। किसानों को छोटे-छोटे समूहों में खेती करने के बजाय समूह में सहकारिता के तहत खेती करने के लिए प्रेरित किया जाना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। इससे उत्पादन लागत घटने में मदद मिलेगी। दरअसल, खेती को एक फलदायी और आकर्षक पेशे के रूप में पुन: स्थापित किये जाने की जरूरत है। यह जिम्मेदारी सरकार की है कि वह खेती को आकर्षक कैसे बनायें। अन्नदाताओं को ही अनाज के लाले हों, हम कैसे चुपचाप बर्दाश्त कर सकते हैं।
मध्यप्रदेश में पिछले कुछ दिनों में किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने और आत्महत्या के प्रयासों के समाचारों ने समूचे देश का ध्यान एक बार फिर किसानों की समस्याओं की ओर खींचा है। यह सोचने पर हम विवश हुए हैं कि आखिर क्या कारण है जो सरकार चलाने वाले लोग अन्नदाताओं को ही भूखों मरने या उन्हें आत्महत्या जैसा कदम उठाने से नहीं रोक पा रहे हैं। हालांकि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने अथवा उनके आत्महत्या के प्रयासों को गंभीरता से लेकर कुछ कदम उठाते हुए प्रशासन को निर्देश दिये हैं लेकिन अभी उन निर्देशों का पालन और उसके प्रभाव का ऑकलन होना शेष है। हैरानी की बात कि इस कृषि प्रधान देश का कृषक ही सैकड़ों समस्याओं से जूझ रहा है। पहले महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके और कर्नाटक के किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने के मामले प्रकाश में आ चुके हैं। केंद्र और राज्य सरकारों के प्रति आमजन में नाराजगी काफी बढ़ी है। एक अनुमान के अनुसार इस देश में १९९७ से अब तक लगभग दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने के जो प्रमुख कारण सामने आते रहे हैं उनमें आर्थिक तंगी, मौसम की मार के चलते फसलों के बर्बाद हो जाने, बैंकों और निजी स्रोतों से लिये गये कर्ज की अदायगी नहीं कर पाने, बिजली और पानी की अपर्याप्त आपूर्ति, घटिया बीज और नकली खाद आदि के कारण पर्याप्त फसल नहीं आ पाना आदि हैं। आज एक ओर विश्व के अधिकांश भागों में जब कृषि में वैज्ञानिक साधनों का उपयोग कर भरपूर उत्पादन प्राप्त किया जा रहा है, ऐसे दौर में भारत के दो-चार राज्यों को छोडक़र शेष सभी स्थानों पर किसान परम्परागत साधनों के साथ बंधा हुआ है। कितने ही राज्यों में बिजली के खम्बे खड़े और तार खिंचे दिख जाते हैं। लेकिन विद्युत आपूर्ति चार-छह घंटे भी नहीं हो पाती। विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व व्यापार संगठन की मुक्त व्यापार नीतियों की मार भारतीय किसानों पर पड़ी है। कृषि उत्पादों के दाम इतने टूटे कि वे लागत तक नहीं निकाल पाते। उस पर बीज बिक्री से लेकर उत्पादन, वितरण तक में वैश्विक कारपोरेट की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष घुसपैठ ने किसानों को विचलित कर दिया है। इसके अलावा बिचौलियों ने उनके लाभ पर अलग डाका डाल रखा है। यह सुनिश्चित माना जाए कि इस देश में कम से कम सात राज्यों का किसान लगातार तनावग्रस्त रहता है। इनमें छोटे और सीमान्त किसानों की स्थिति अधिक खराब है। दरअसल, सरकारी तंत्र की ओर से सहयोग, समर्थन और मार्गदर्शन नहीं मिलने से ९५ प्रतिशत किसान समस्याओं से अकेले जूझते हैं। सफल हो गये तो ठीक वरना असफलता उनमें निराशा, कुण्ठा और तनाव पैदा करती है। सर्वेक्षण करा लिया जाए किस राज्य सरकार अथवा केंद्र ने किसानों की समस्याएं जानने स्थानीय निकायों, पंचायतों ,गैर सरकारी संगठनों से कभी कोई सीधी बात की? किसानों के लिए बनी कल्याणकारी योजनाओं, सहायता योजनाओं का लाभ किसानों तक कितना पहुंच पा रहा है? किसानों को बैंक ऋण सहायता राज्य सरकार की गारंटी पर मिलनी चाहिए। किसानों को छोटे-छोटे समूहों में खेती करने के बजाय समूह में सहकारिता के तहत खेती करने के लिए प्रेरित किया जाना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। इससे उत्पादन लागत घटने में मदद मिलेगी। दरअसल, खेती को एक फलदायी और आकर्षक पेशे के रूप में पुन: स्थापित किये जाने की जरूरत है। यह जिम्मेदारी सरकार की है कि वह खेती को आकर्षक कैसे बनायें। अन्नदाताओं को ही अनाज के लाले हों, हम कैसे चुपचाप बर्दाश्त कर सकते हैं।
Tuesday, January 11, 2011
खोटे सिक्के नहीं चलते आईपीएल में
-अनिल बिहारी श्रीवास्तव
यह बात सुनिश्चित रही है कि इंडियन प्रीमियर लीग के चौथे सत्र के लिए नीलामी में शामिल साढ़े तीन सौ खिलाडिय़ों में से एक सौ खिलाडिय़ों को नहीं बिक पाने के कड़वे सच का सामना करना होगा लेकिन कम ही लोगों ने कल्पना की होगी कि सच की यह कड़वी गोली कल के दिग्गज सौरव गांगुली, सनथ जयसूर्या और ब्रायनलारा जैसों के भाग्य में लिखी थी। आईपीएल चौथे सत्र में भाग लेने वाली दस टीमों के लिए ढाई सौ खिलाडिय़ों की नीलामी होनी है। नीलामी के पहले दिन यह उलटफेर देखने में आया कि बॉलीवुड सुपर स्टार शाहरुख खान ने अपने पूर्व कप्तान सौरव गांगुली और कैरिबियाई बल्लेबाज क्रिस गेल से पीछा छुड़ा लिया। शाहरुख ने अपनी टीम कोलकाता नाइटराइड्र्स के लिए गौतम गंभीर को ११.०४ करोड़ में खरीदकर अपने तेवरों का अहसास करा दिया। शाहरुख ने सौरव गांगुली तक यह संदेश पहुंचा दिया कि वह उनके स्तरहीन प्रदर्शन को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज नहीं कर सकते क्योंकि वह कल के क्रिकेट सुपरस्टार रहे हैं। सौरव गांगुली जैसी स्थिति का सामना करने वालों में ब्रायन लारा और सनथ जयसूर्या के अलावा क्रिसगेल, जेसी राइडर, हर्शल गिब्स, मैट प्रायर, मार्क बाउचर, लक राइट, जेम्स एडरसन और कपुगेडरा के नाम सामने आए हैं। दरअसल, सौरव गांगुली और ब्रायन लारा का पहले दिन ही नहीं बिक पाना सीनियर और जूनियर क्रिकेटर खिलाडिय़ों के लिए एक सबक है। भविष्य में दौलत और शोहरत कमाने की कामना रखने वाले खिलाडिय़ों को आज ही कुछ बातें अपने दिमाग में बैठा लेनी चाहिए। मसलन, आईपीएल टीमों के फ्रैंचाइजी इमोशनल कम और प्रोफेशनल अधिक है। वे उन्हीं घोड़ों पर दाम लगाएंगे जो दौड़ें, फिर दौड़ में वह भले अव्वल न हो किन्तु उसे फिसड्डी भी नहीं होना चाहिए। दूसरा सबक यह है कि सीनियरिटी के गुरूर में मैदान से बाहर नहीं रहिये। लगातार खेलते रहें। छोटे मुकाबलों में उतरने में संकोच और झिझक न हो। बल्लेबाजी क्रम को लेकर रवैया अडिय़ल नहीं हो। आप विनम्र रहें। ज्यादा अहम और टकराव खेल के लिए जरूरी एकाग्रता को भंग करता है। आईपीएल जैसे विशुद्ध व्यावसायिक खेल आयोजन में जगह पाने के लिए अपनी मौजूदा क्षमताओं के अनुरूप कीमत की अपेक्षा की जानी चाहिए। सौरव गांगुली और ब्रायन लारा के संदर्भ में यह बात नकारात्मक पाई गई कि उन्होंने अपनी न्यूनतम मांग बहुत अधिक रखी थी। गांगुली अपने झूठे अहंकार से मुक्त होकर स्वयं ही रेट कम कर लेते तब संभव था कि दस टीम के मालिकों में से कोई न कोई उनके नाम पर पहले दिन ही विचार कर लेता। सीमित बीस-बीस ओवरों वाले आईपीएल मैचों ने लगभग समूची दुनिया में धूम मचा दी है। इस प्रतियोगिता का पेशेवराना अंदाज लगभग समूची क्रिकेट दुनिया के दिग्गजों को आकर्षित करता है। इस फटाफट क्रिकेट ने खेल की दिशा और दशा बदलकर रख दी। कम ही लोगों ने कल्पना की होगी कि भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड का यह प्रयोग इतना सफल होगा। इसमें खेलने वाले खिलाड़ी मालामाल हो रहे, इसकी टीम के मालिकों के खजाने ठसाठस भरे हैं, क्रिकेट बोर्ड की पांच अंगुलियां घी में और सिर कढ़ाई में नजर आ रहा एवं विज्ञापन दाता जमकर कमाई कूट रहे। सबसे बड़ी बात यह है कि दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमी आईपीएल के दौरान गजब के बौराये से नजर आते हैं। क्रिकेट और कमाई के लिए ऐसी दीवानगी पहले कभी कहां देखी गई थी? सच यह है कि सीमित पचास ओवरों के एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों के शुरूआती दिनों में देखा गया क्रेज तक आईपीएल के सामने आज फीका नजर आता है। आईपीएल का रुतबा भविष्य में बढ़ता ही जाएगा । लेकिन टीमों के लिए खरीदे गए खिलाडिय़ों को एक बात समझ लेनी चाहिए जो व्यावहारिक होगा और अच्छा खेल सकेगा, वही चलेगा। अन्यथा कल सौरव गांगुली जैसी स्थिति का सामना उन्हें भी करना होगा।
यह बात सुनिश्चित रही है कि इंडियन प्रीमियर लीग के चौथे सत्र के लिए नीलामी में शामिल साढ़े तीन सौ खिलाडिय़ों में से एक सौ खिलाडिय़ों को नहीं बिक पाने के कड़वे सच का सामना करना होगा लेकिन कम ही लोगों ने कल्पना की होगी कि सच की यह कड़वी गोली कल के दिग्गज सौरव गांगुली, सनथ जयसूर्या और ब्रायनलारा जैसों के भाग्य में लिखी थी। आईपीएल चौथे सत्र में भाग लेने वाली दस टीमों के लिए ढाई सौ खिलाडिय़ों की नीलामी होनी है। नीलामी के पहले दिन यह उलटफेर देखने में आया कि बॉलीवुड सुपर स्टार शाहरुख खान ने अपने पूर्व कप्तान सौरव गांगुली और कैरिबियाई बल्लेबाज क्रिस गेल से पीछा छुड़ा लिया। शाहरुख ने अपनी टीम कोलकाता नाइटराइड्र्स के लिए गौतम गंभीर को ११.०४ करोड़ में खरीदकर अपने तेवरों का अहसास करा दिया। शाहरुख ने सौरव गांगुली तक यह संदेश पहुंचा दिया कि वह उनके स्तरहीन प्रदर्शन को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज नहीं कर सकते क्योंकि वह कल के क्रिकेट सुपरस्टार रहे हैं। सौरव गांगुली जैसी स्थिति का सामना करने वालों में ब्रायन लारा और सनथ जयसूर्या के अलावा क्रिसगेल, जेसी राइडर, हर्शल गिब्स, मैट प्रायर, मार्क बाउचर, लक राइट, जेम्स एडरसन और कपुगेडरा के नाम सामने आए हैं। दरअसल, सौरव गांगुली और ब्रायन लारा का पहले दिन ही नहीं बिक पाना सीनियर और जूनियर क्रिकेटर खिलाडिय़ों के लिए एक सबक है। भविष्य में दौलत और शोहरत कमाने की कामना रखने वाले खिलाडिय़ों को आज ही कुछ बातें अपने दिमाग में बैठा लेनी चाहिए। मसलन, आईपीएल टीमों के फ्रैंचाइजी इमोशनल कम और प्रोफेशनल अधिक है। वे उन्हीं घोड़ों पर दाम लगाएंगे जो दौड़ें, फिर दौड़ में वह भले अव्वल न हो किन्तु उसे फिसड्डी भी नहीं होना चाहिए। दूसरा सबक यह है कि सीनियरिटी के गुरूर में मैदान से बाहर नहीं रहिये। लगातार खेलते रहें। छोटे मुकाबलों में उतरने में संकोच और झिझक न हो। बल्लेबाजी क्रम को लेकर रवैया अडिय़ल नहीं हो। आप विनम्र रहें। ज्यादा अहम और टकराव खेल के लिए जरूरी एकाग्रता को भंग करता है। आईपीएल जैसे विशुद्ध व्यावसायिक खेल आयोजन में जगह पाने के लिए अपनी मौजूदा क्षमताओं के अनुरूप कीमत की अपेक्षा की जानी चाहिए। सौरव गांगुली और ब्रायन लारा के संदर्भ में यह बात नकारात्मक पाई गई कि उन्होंने अपनी न्यूनतम मांग बहुत अधिक रखी थी। गांगुली अपने झूठे अहंकार से मुक्त होकर स्वयं ही रेट कम कर लेते तब संभव था कि दस टीम के मालिकों में से कोई न कोई उनके नाम पर पहले दिन ही विचार कर लेता। सीमित बीस-बीस ओवरों वाले आईपीएल मैचों ने लगभग समूची दुनिया में धूम मचा दी है। इस प्रतियोगिता का पेशेवराना अंदाज लगभग समूची क्रिकेट दुनिया के दिग्गजों को आकर्षित करता है। इस फटाफट क्रिकेट ने खेल की दिशा और दशा बदलकर रख दी। कम ही लोगों ने कल्पना की होगी कि भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड का यह प्रयोग इतना सफल होगा। इसमें खेलने वाले खिलाड़ी मालामाल हो रहे, इसकी टीम के मालिकों के खजाने ठसाठस भरे हैं, क्रिकेट बोर्ड की पांच अंगुलियां घी में और सिर कढ़ाई में नजर आ रहा एवं विज्ञापन दाता जमकर कमाई कूट रहे। सबसे बड़ी बात यह है कि दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमी आईपीएल के दौरान गजब के बौराये से नजर आते हैं। क्रिकेट और कमाई के लिए ऐसी दीवानगी पहले कभी कहां देखी गई थी? सच यह है कि सीमित पचास ओवरों के एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों के शुरूआती दिनों में देखा गया क्रेज तक आईपीएल के सामने आज फीका नजर आता है। आईपीएल का रुतबा भविष्य में बढ़ता ही जाएगा । लेकिन टीमों के लिए खरीदे गए खिलाडिय़ों को एक बात समझ लेनी चाहिए जो व्यावहारिक होगा और अच्छा खेल सकेगा, वही चलेगा। अन्यथा कल सौरव गांगुली जैसी स्थिति का सामना उन्हें भी करना होगा।
Monday, January 10, 2011
कहां जा रहीं हमारी गोरैया ?
(अनिल बिहारी श्रीवास्तव)
अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संघ की रेड लिस्ट के अनुसार भारत में पक्षियों की ८२ प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। पक्षियों की लगभग सवा बारह सौ प्रजातियां इस देश में पाई जाती हैं। जिन पक्षी प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा बताया जा रहा है उनमें सफेद सिर वाली बतख, कैरिना, स्कल, चुलाटा, ग्रेड इंडियन बस्टर्ड, बेंगाल फ्लोरिकन, लेजर फ्लोरिकन और जिप्स इंडिकस प्रजातियां शामिल हैं। इनमें से पक्षियों की कुछ प्रजातियां देखने को भी नहीं मिलतीं। कभी किसी का ध्यान इस बात पर नहीं जा रहा है कि खतरा पक्षियों अकेले पर नहीं मंडरा रहा है। पक्षी या वन्य जीवों का अस्तित्व खतरे में है तो यह तय मानें कि मनुष्य का भविष्य भी सुरक्षित नहीं है। पिछले दिनों कम-से-कम चार बड़े अखबारों में पक्षियों की घटती संख्या पर आंखें खोल देने वाले लेख प्रकाशित किये थे। तथ्यों के आधार पर बताया गया था कि आज हमारे आसपास दिखते रहे कौये, गिद्ध, गोरैया चिडिय़ा, तोते और फाख्ता अचानक बहुत कम हो गये हैं। यहां गिद्धों की संख्या में इतनी गिरावट आई है कि लंदन तक में उसको लेकर चिंता व्यक्त की गई। अब पितृपक्ष में कौये देख लेना भाग्य की बात हो गई है। तोतों के झुण्ड आकाश में कहां दिखाई देते हैं? बगुलों को मांस प्रेमियों से खतरा बढ़ा है। सबसे बड़ी बात हमारे घरों के आसपास फुदकने वाली नन्हीं चिरैया-गोरैया तक काफी कम हो गई हैं। गोरैया उन इने-गिने पक्षियों में से एक है जिसे मनुष्य बस्तियों में मनुष्यों के बीच फुदकते देखा जाता रहा है। कितने लोगों ने महसूस किया कि अब पहले जैसे गोरैया नहीं दिखतीं।
अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संघ ने पक्षियों के विलुप्त होने के लिए जो कारण गिनाये हैं उनमें जंगलों की तेजी से कटाई, पक्षियों का शिकार, पक्षियों के प्राकृतिक आवासों में बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप तथा कृषि बागवानी में कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग शामिल है। एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने व्यापक अध्ययन के बाद उन कारणों को गिनाया जो पक्षियों की हत्या के लिए जिम्मेदार पाए गए। बीस वर्षों तक किये गये अध्ययन के अनुसार कांच की खिड़कियों और दरवाजों से टकराकर हर साल १० से लेकर ९० करोड़ पक्षी मर जाते हैं। पश्चिमी देशों में बिल्ली पालने का शौक बहुत देखा जाता है। हर साल ७० लाख पक्षियों को पालतू बिल्लियां मार डालती हैं। विश्व भर के हाइवेज पर ५ से १० करोड़ पक्षी कारों ट्रकों की चपेट में आकर मारे जाते हैं। विद्युत पारेषण लाइनें, कृषि में कीटनाशकों के उपयोग, नगरों बस्तियों में विकास के लिए वृक्षों की कटाई, टेलीकॉम के संचार टावरों, वाहनों और कारखानों के कारण बढ़ रहे प्रदूषण, अवैध शिकार, बिजली लाइनों और व्यावसायिक मत्स्य दोहन कुछ ऐसे प्रमुख कारण हैं जो हर साल करोड़ों पक्षियों का सफाया कर रहे हैं।
पक्षियों के साथ समस्या यह है कि मनुष्यों में बहुत थोड़े लोगों को ही परिस्थितिकी असंतुलन मेंं पक्षियों की भूमिका का महत्व मालूम है। सरकार चलाने और चलवाने लोगों को पक्षियों पर संकट की परवाह ही नहीं है। थोड़ी सी सक्रियता और सख्ती से पक्षियों को बेमौत मरने से बचाया जा सकता है। शहरीकरण में आज खड़े हो रहे कांक्रीट जंगलों के बीच एक पल के लिए पक्षियों के विषय में विचार होना चाहिए। आवासीय परिसरों में उद्यान अनिवार्य हो तथा कम से कम पांच बड़े वृक्ष लगाने के स्पष्ट निर्देश हों। बहुमंजिली इमारतों, अपार्टमेंट के चारों ओर वृक्षारोपण करने के साथ ही कुछ ऊंचाई तक ऐसी दीवार बनाई जाए जिसमें पक्षियों को घोंसले बनाने के लिए छोटे-छोटे चैम्बर हों। दरअसल, बच्चों में पशु -पक्षियों के प्रति प्रेम की भावना को बढ़ा कर इन मूक प्राणियों के संरक्षण में योगदान दिया जा सकता है। आप अपना घर बनाने के लिए वन्य जीवों और पक्षियों के प्राकृतिक आवास उजाड़ते जा रहे हैं। इससे परिस्थितिकी डगमगाने की ओर है। यह तय मानें कि इसका मानवीय जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। आज उनकी तो कल हमारी बारी है।
अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संघ की रेड लिस्ट के अनुसार भारत में पक्षियों की ८२ प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। पक्षियों की लगभग सवा बारह सौ प्रजातियां इस देश में पाई जाती हैं। जिन पक्षी प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा बताया जा रहा है उनमें सफेद सिर वाली बतख, कैरिना, स्कल, चुलाटा, ग्रेड इंडियन बस्टर्ड, बेंगाल फ्लोरिकन, लेजर फ्लोरिकन और जिप्स इंडिकस प्रजातियां शामिल हैं। इनमें से पक्षियों की कुछ प्रजातियां देखने को भी नहीं मिलतीं। कभी किसी का ध्यान इस बात पर नहीं जा रहा है कि खतरा पक्षियों अकेले पर नहीं मंडरा रहा है। पक्षी या वन्य जीवों का अस्तित्व खतरे में है तो यह तय मानें कि मनुष्य का भविष्य भी सुरक्षित नहीं है। पिछले दिनों कम-से-कम चार बड़े अखबारों में पक्षियों की घटती संख्या पर आंखें खोल देने वाले लेख प्रकाशित किये थे। तथ्यों के आधार पर बताया गया था कि आज हमारे आसपास दिखते रहे कौये, गिद्ध, गोरैया चिडिय़ा, तोते और फाख्ता अचानक बहुत कम हो गये हैं। यहां गिद्धों की संख्या में इतनी गिरावट आई है कि लंदन तक में उसको लेकर चिंता व्यक्त की गई। अब पितृपक्ष में कौये देख लेना भाग्य की बात हो गई है। तोतों के झुण्ड आकाश में कहां दिखाई देते हैं? बगुलों को मांस प्रेमियों से खतरा बढ़ा है। सबसे बड़ी बात हमारे घरों के आसपास फुदकने वाली नन्हीं चिरैया-गोरैया तक काफी कम हो गई हैं। गोरैया उन इने-गिने पक्षियों में से एक है जिसे मनुष्य बस्तियों में मनुष्यों के बीच फुदकते देखा जाता रहा है। कितने लोगों ने महसूस किया कि अब पहले जैसे गोरैया नहीं दिखतीं।
अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संघ ने पक्षियों के विलुप्त होने के लिए जो कारण गिनाये हैं उनमें जंगलों की तेजी से कटाई, पक्षियों का शिकार, पक्षियों के प्राकृतिक आवासों में बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप तथा कृषि बागवानी में कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग शामिल है। एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने व्यापक अध्ययन के बाद उन कारणों को गिनाया जो पक्षियों की हत्या के लिए जिम्मेदार पाए गए। बीस वर्षों तक किये गये अध्ययन के अनुसार कांच की खिड़कियों और दरवाजों से टकराकर हर साल १० से लेकर ९० करोड़ पक्षी मर जाते हैं। पश्चिमी देशों में बिल्ली पालने का शौक बहुत देखा जाता है। हर साल ७० लाख पक्षियों को पालतू बिल्लियां मार डालती हैं। विश्व भर के हाइवेज पर ५ से १० करोड़ पक्षी कारों ट्रकों की चपेट में आकर मारे जाते हैं। विद्युत पारेषण लाइनें, कृषि में कीटनाशकों के उपयोग, नगरों बस्तियों में विकास के लिए वृक्षों की कटाई, टेलीकॉम के संचार टावरों, वाहनों और कारखानों के कारण बढ़ रहे प्रदूषण, अवैध शिकार, बिजली लाइनों और व्यावसायिक मत्स्य दोहन कुछ ऐसे प्रमुख कारण हैं जो हर साल करोड़ों पक्षियों का सफाया कर रहे हैं।
पक्षियों के साथ समस्या यह है कि मनुष्यों में बहुत थोड़े लोगों को ही परिस्थितिकी असंतुलन मेंं पक्षियों की भूमिका का महत्व मालूम है। सरकार चलाने और चलवाने लोगों को पक्षियों पर संकट की परवाह ही नहीं है। थोड़ी सी सक्रियता और सख्ती से पक्षियों को बेमौत मरने से बचाया जा सकता है। शहरीकरण में आज खड़े हो रहे कांक्रीट जंगलों के बीच एक पल के लिए पक्षियों के विषय में विचार होना चाहिए। आवासीय परिसरों में उद्यान अनिवार्य हो तथा कम से कम पांच बड़े वृक्ष लगाने के स्पष्ट निर्देश हों। बहुमंजिली इमारतों, अपार्टमेंट के चारों ओर वृक्षारोपण करने के साथ ही कुछ ऊंचाई तक ऐसी दीवार बनाई जाए जिसमें पक्षियों को घोंसले बनाने के लिए छोटे-छोटे चैम्बर हों। दरअसल, बच्चों में पशु -पक्षियों के प्रति प्रेम की भावना को बढ़ा कर इन मूक प्राणियों के संरक्षण में योगदान दिया जा सकता है। आप अपना घर बनाने के लिए वन्य जीवों और पक्षियों के प्राकृतिक आवास उजाड़ते जा रहे हैं। इससे परिस्थितिकी डगमगाने की ओर है। यह तय मानें कि इसका मानवीय जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। आज उनकी तो कल हमारी बारी है।
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