Monday, February 28, 2011

गोधरा फैसला : बैनर्जी का झूठ उजागर

---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
गोधरा कांड पर विशेष अदालत के फैसले ने उन तमाम दावों और लोगों के इस विश्वास की पुष्टि की है कि २७ फरवरी २००२ को साबरमती एक्सप्रेस के स्लीपर कोच एस-६ में साजिश के तहत बाहर से आग लगाई गई थी। विशेष अदालत ने कल गोधरा कांड मामले में अपना फैसला सुनाते हुए दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। उस दिल दहला देने वाले हमले में सांप्रदायिक उन्मादियों के हाथों ५८ कारसेवक जिंदा जला दिये गये थे। अदालत ने तथ्यों, गवाहों के बयान और सबूतों के आधार पर ३१ लोगों को दोषी पाया है। ६३ अन्य आरोपी बरी कर दिये गये। सजा का ऐलान २५ फरवरी को किया जाएगा। गोधरा कांड मामले में विशेष अदालत का फैसला उन पाखण्डी सेकुलरिस्टों के मुंह पर करारा तमाचा है जिन्होंने गोधरा जैसी घटना तक में वोट बैंक की राजनीति करने में शर्म महसूस नहीं की। तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा अनावश्यक और विशुद्ध रूप से भ्रम फैलाने के मकसद से नियुक्त यूसी बैनर्जी कमेटी के निष्कर्ष अदालत के फैसले से झूठे और गलत साबित हुए हैं। बैनर्जी कमेटी ने कहा था कि गोधरा में कारसेवकों के स्लीपर कोच में आग दुर्घटनावश अंदर से ही लगी थी। कारसेवकों की मौत दम घुटने से हुई तथा इस साजिश में कोई बाहरी व्यक्ति शामिल नहीं था जबकि गोधरा कांड पर नानावटी कमीशन कह चुका था कि ट्रेन के डिब्बे में आग बाहर बाहरी से लोगों द्वारा जानबूझकर लगाई गई थी। नानावटी कमीशन ने मौतों का कारण आग से जल जाना बताया था। नानावटी कमीशन की रिपोर्ट और विशेष अदालत के फैसले ने यू.जी. बैनर्जी के समक्ष नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को लेकर सवाल खड़ा कर दिया है। इस तथ्य की जांच होनी चाहिए कि बैनर्जी कमीशन ने किस दबाव, अनुरोध, किसकी प्रेरणा और किस प्रलोभन के चलते सत्य पर पर्दा डालकर न्याय को गुमराह करने का पाप किया? इस बात की जांच होनी चाहिए कि गोधरा कांड के सच पर पर्दा डालने की कोशिश करके तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने कौन सा लाभ लेने की कोशिश की थी। हैरानी होती है कि लोग गुजरात के दंगों को लेकर आज तक मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने की कोशिश करते आ रहे हैं लेकिन कितने लोगों ने गोधरा में जिंदा जला दिये गये ५८ रेल यात्रियों के परिजनों की खबर ली। गुजरात के दंगों को गोधरा कांड की प्रतिक्रिया माना जाता है । न तो गुजरात के दंगाइयों का बचाव किया जाना चाहिए और ना ही गोधरा में निहत्थे रेल यात्रियों को घेर कर जला डालने वाली उन्मादियों की भीड़ के बचाव में किसी का किसी भी तरह से आगे आना शोभा देता है। दोनों ही स्थितियां बर्बर प्रवृत्तियों के पुन: सिर उठाने का प्रमाण रही हैं। कानून पसंद सभ्य समाज में ऐसी हरकतों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। आश्चर्य होता है कि कतिपय गैर-सरकार संगठन (एनजीओ) मीडिया, का एक वर्ग, कुछेक बुद्धिजीवी और राजनीति की धूर्त सेकुलरिस्ट लॉबी ने गुजरात दंगों की बात करते समय हमेशा ही गोधरा कांड की चर्चा से कन्नी काट ली। गुजरात दंगों को अगर आप प्रशासनिक मशीनरों की असफलता और कानून के शासन का पंगु हो जाना मानते हैं तब गोधरा कांड को क्या कहेंगे? कारसेवकों को ंिजदा जला रहे उन्मादी तत्वों में कानून का खौफ तो था नहीं, उन्हें भरोसा रहा होगा कि ऐसे जघन्य कृत्य के बाद उनका बाल बांका नहीं होने दिया जाएगा। ऐसे हत्यारों को सजा उनके रोंगटे खड़े कर देने वाली सुनाई जाना चाहिए।

Sunday, February 27, 2011

उपद ठूंठ पर बैठना

---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
बाबा रामदेव ने कांग्रेस की चुनौती स्वीकार कर ली है। बाबा यहीं नहीं रुके। उन्होंने पलटवार किया है। बाबा अपने ट्रस्ट की जांच कराने को तैयार हैं लेकिन चाहते हैं कि नेहरू-गांधी परिवार के ट्रस्टों की भी जांच हो। बाबा ने मांग की है कि नेहरू-गांधी परिवार के प्रत्येक सदस्य की कमाई और उनके खर्च का विवरण राष्ट्र को दिया जाए। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह द्वारा बाबा रामदेव के विरुद्ध छेड़े गये इस वाव् युद्ध में आगे काफी कुछ देखने-सुनने को मिलने की आशा है। एक बात तय है कि दिग्विजय सिंह ने बाबा रामदेव पर निशाना साधते समय कल्पना नहीं की होगी कि इस निशानेबाजी पर देश भर में इतनी व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिलेगी। उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि बिना झोली के फकीर सा दिखने वाला योगगुरु विशुद्ध राजनेताओं की स्टाइल में बखिया उधेडऩे की मुद्रा में आ जाएगा। दिग्विजय सिंह ने गत दिवस आरोप लगाया था कि बाबा रामदेव के ट्रस्ट के पास करोड़ों की सम्पत्ति है जिसकी जांच होनी चाहिए। यह योग गुरु पर सीधा हमला था। विश्लेषकों का कहना है कि कालेधन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध बाबा रामदेव द्वारा चलाये जा रहे अभियान को कांग्रेस के कुछ लोग राजनीतिक साजिश मान रहे हैं। उन्हें लगता है कि बाबा रामदेव संन्यासी हैं और अपनी लोकप्रियता के बूते वह कांग्रेस को राजनीतिक नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह द्वारा लगाये गये आरोपों को उसी अभियान का जवाब माना जा रहा है। प्रश्न यह है कि बाबा रामदेव द्वारा चलाये रहे अभियान के बीच उन पर लगाया गया आरोप क्या गलत समय पर उठाया गया गलत कदम नहीं है।
कहा जा रहा है कि कालेधन और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने तथा उसकी अनदेखी करने जैसे आरोपों से घिरी कांग्रेस की अगुआई वाली संप्रग सरकार के बचाव में तो बाबा रामदेव को घेरने की कोशिश नहीं की गई है? यदि उत्तर हां है तब कहना होगा कि इससे कांग्रेस को ही नुकसान होगा। बाबा रामदेव ने टेलीविजन कैमरों के सामने सीना ठोंककर कह दिया है कि उनके नाम पर एक इंच भूमि तक नहीं है। उनका कोई बैंक एकाउण्ट नहीं है।’’ योग गुरु मानते हैं कि उनके ट्रस्ट के पास १११५ करोड़ रुपये की सम्पत्ति है। उन्हें देशवासियों के आध्यात्मिक उत्थान और सभी के लिए आरोग्य सुनिश्चित करने के लिए अधिक धन की आवश्यकता है। अत: आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण और बिक्री तथा योग प्रशिक्षण की फीस और दान के रूप में मिलने वाला धन उनका ट्रस्ट लेता रहेगा।
यह तय है कि बाबा रामदेव अपने कदम वापस नहीं लेंगे। कुछ लोग सलाह देते हैं कि बाबा योग गुरु हैं, संन्यासी हैं अत: उन्हें राजनीति की दलदल में नहीं उतरना चाहिए। सुनने में ऐसी टिप्पणी कुछ हद तक उचित लगती है किन्तु विचारणीय मुद्दा यह है कि बाबा ने अभी तक राजनीति के शुद्धिकरण और पुनर्जन्म की बात की है। उन्होंने कहां कहा है कि वह स्वयं राजनीति में आ रहे हैं। वैसे भी इस देवभूमि का इतिहास गवाह है कि यहां संकट की स्थिति और मुश्किलों के दौर में ऋषि-मुनि, संत और संन्यासी राष्ट्र की रक्षा के लिए आगे आते रहे हैं। कांग्रेस द्वारा छेड़े जाने से उन्हीं विभूतियों की Ÿोणी में बाबा रामदेव के आ खड़े होने की संभावना बन गई है। अब कांग्रेस क्या करेगी? बरबस एक मुहावरा याद आ गया, ‘‘उपद ठूंठ पर बैठना।’’ यह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने से मिलता-जुलता है। कांग्रेस की स्थिति कुछ ऐसी ही दिखाई दे रही है।

Friday, February 25, 2011

मुस्लिम आरक्षण: वोट बैंक का खेल

---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
सोमवार को अखबारों में यह खबर पूरी सुर्खियों के साथ छपी है कि केंद्र में कांग्रेस की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार मुस्लिम आरक्षण पर फैसला लेने का मन बना रही है। उल्लेखनीय है कि रंगनाथ मिश्र आयोग की संसद में पेश की गई रिपोर्ट में भी अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने का सुझाव दिया गया था। अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि सरकार का इरादा समूचे अल्पसंख्यक समुदाय को इस योजना में शामिल करने का है या फिर किसी सियासी तिकड़म के द्वारा सिर्फ मुस्लिमों को आरक्षण देने की कोशिश की जाएगी। वैसे सरकार की राह उतनी आसान नहीं होगी क्योंकि प्रमुख विपक्षी दल-भारतीय जनता पार्टी धर्म के आधार पर मुसलमानों को आरक्षण देने का विरोध करती आई है। मुसलमानों को आरक्षण देने की बात सोनिया गांधी द्वारा अल्पसंख्यक आयोग को दिये गए आश्वासन से जोड़ी जा रही है। सच यह है कि यह सारा खेल असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी और केरल विधानसभा के इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर खेला जा रहा है। कांग्रेस की नजर उत्तर प्रदेश के मुस्लिम वोट बैंक पर भी लगी जो अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे जानकारियों के अनुसार मुसलमानों को आरक्षण की रेवड़ी देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, केरल, कर्नाटक और कुछ अन्य राज्यों में आरक्षण के फार्मूलों का सहारा लिया जाएगा। ऐसे राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) कोटे में से मुसलमानों को आरक्षण दिया जा रहा है। मुसलमानों को आरक्षण को लेकर देश में कभी भी आम सहमति नहीं बन पाई। कतिपय राजनीतिक दल जिनमें वामपंथी गठबंधन भी शामिल हैं मुस्लिम आरक्षण की वकालत करते रहे हैं लेकिन इस समर्थन का एक मात्र उद्देश्य मुसलमानों के वोटों को हथियाना ही रहा है। दूसरी ओर भाजपा समेत बहुसंख्यक समुदाय का एक बड़ा वर्ग मानता है कि धर्म के आधार पर आरक्षण एक खतरनाक और विध्वंसकारी सोच है। उनका मानना है कि आरक्षण से मुस्लिम समुदाय का कोई विशेष भला नहीं होगा। जरूरत मुस्लिमों में शिक्षा के प्रसार, और स्व-रोजगार आदि पर जोर दिये जाने की है। जरूरत उन कारणों को तलाशने और उन्हें दूर करने की है जिनके चलते मुस्लिम अन्य समुदायों की तुलना में पिछड़ गए। इस काम में मुस्लिम धार्मिक और सामाजिक नेताओं का सहयोग मिलना चाहिए। यह कड़वा सच है कि कुछ स्वार्थी तत्व आम गरीब, अशिक्षित और पिछड़े मुसलमानों का मार्गदर्शन करने की बजाय उन्हें बरगलाते हैं। धार्मिक शिक्षाओं की अपने-अपने अंदाज में व्याख्यायें कर दी जाती हैं। अलग पहचान दिखाने के नाम पर कोशिश उन्हेंं मुख्य धारा से अलग रखने की होती है। जब तक आम मुसलमान को भ्रमित किया जाता रहेगा वह मुख्य धारा से जुड़ाव कैसे महसूस कर पाएगा? कैसे वह अन्य समुदायों के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की चुनौती का जवाब दे सकेगा? पिछले दिनों दारूल उलूम देवबंद के नए चान्सलर ने तक आरक्षण की बैसाखी की बजाए मुस्लिमों की शिक्षा को जरूरी बताया था। इस देश के साथ यह दुर्भाग्य जुड़ गया है कि यहां के अकर्मण्य राजनेताओं ने जातिवाद और छद्म धर्मनिरपेक्षता को समानता के नाम पर हथियार के रूप में उपयोग शुरू कर दिया है। उनके खेल ने अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के लिए शुरू की गई आरक्षण व्यवस्था के मूल उद्देश्य को ही तार-तार कर दिया। आज आबादी के अनुपात में सीना ठोंक कर आरक्षण मांगा जाता है। समझ में नहीं आता कि आरक्षण का यह खेल कब तक चलेगा। आरक्षण देश को कहां ले जाएगा?

Thursday, February 24, 2011

साजिशों की शिकार बी.एस.एन.एल

---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
एक रिपोर्ट के अनुसार भारत संचार निगम लिमिटेड यानी बी.एस.एन.एल को हर माह ४०० करोड़ का नुकसान उठाना पड़ रहा है। यही स्थिति रही तो इस वर्ष के अंत तक बी.एस.एन.एल दिवालिया हो जाएगी। लोगों को यह जानने की उत्सुकता अवश्य होगी कि मात्र छह सालों में ऐसा क्या हो गया जो बी.एस.एन.एल इतने बड़े आर्थिक संकट की ओर बढऩे लगी है। सन् २००४ में जब पहली बार केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार आई थी उस समय बी.एस.एन.एल के नाम पर ३० हजार करोड़ की नकदी थी। २००९-१० में बी.एस.एन.एल के राजस्व में १० फीसद कमी आई। इसके अलावा इस कंपनी को ३जी स्पेक्ट्रम की फीस के तौर पर १८५०० करोड़ रूपये चुकाने पड़े हैं।

हालांकि प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने वादा किया है कि इस कंपनी को डूबने नहीं दिया जाएगा लेकिन प्रश्न यह है कि सरकार की ओर से मिलने वाली किसी भी आर्थिक-बैसाखी के सहारे बी.एस.एन.एल कितने कदम और चल पाएगी? तीन लाख से अधिक कर्मचारियों वाली बी.एस.एन.एल को देश की सबसे बड़ी और पुरानी दूर संचार कंपनी कहा जा सकता है। कंपनी का नया रूप ग्रहण करने से पूर्व यह दूरसंचार विभाग की इकाई के रूप में काम कर रही थी। दूरसंचार सेवाओं में निजी कंपनियों को प्रवेश की अनुमति देकर सरकार ने निश्चित रूप से देश में एक क्रांति सी ला दी। अफसोस इस बात पर है कि जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा के इस दौर में बी.एस.एन.एल को अपनों के विश्वासघात, प्रतिस्पर्धियों के व्यावसायिक प्रपंच और सरकार की अदूरदर्शिता की मार खानी पड़ी। बी.एस.एन.एल के हाथों को नियमों की रस्सियों से बांध कर निजी कंपनियों से मुकाबला करने के लिए छोड़ दिया गया। निजी कंपनियों ने पहले उसके लैण्डलाइन आधार में सेंध मारी। इसके बाद शुरू हुआ मोबाइल सेवा में मुकाबला। प्रमोद महाजन, रामविलास पासवान, दयानिधि मारन से लेकर ए.राजा तक जितने भी दूरसंचार मंत्री हुए उनके फैसले बी.एस.एन.एल के हित में नहीं रहे। प्रमोद महाजन के कार्यकाल में बी.एस.एन.एल को मोबाइल सेवा शुरू करने की अनुमति विलम्ब से मिली। नतीजा यह हुआ कि निजी आपरेटर बाजार पर कब्जा जमाने में कामयाब हो गए। इसके बाद उपकरण के टेंडर आदि में राजनीतिक अड़ंगेबाजी देखी गई। बी.एस.एन.एल की मोबाइल सेवा शुरू होने में इतना अधिक विलम्ब करवा दिया गया कि उपभोक्ताओं में इसके प्रति आकर्षण ही खत्म हो गया। फिर निजी कंपनियों की तरह बी.एस.एन.एल पेशेवर अंदाज नहीं अपना पाई। लैण्ड लाइन, मोबाइल और ब्रॉड बैण्ड सेवाओं में उसकी योजनाएं प्रतिस्पर्धी नहीं रहीं। सत्ताधारी राजनेताओं की खुराफातों से कमजोर हुई बी.एस.एन.एल में विभीषण पैदा हो गए। कुछ माह पूर्व भोपाल में एक उदाहरण सामने आया। बताया जाता है कि एक व्यक्ति ने ब्रॉड बैण्ड सेवा के लिए बी.एस.एन.एल द्वारा लगाई गई केनापी में जानकारी चाही। वह वहां से वापस अपने घर नहीं पहुंचा और एक निजी कंपनी के लोग आ धमके। वे काफी कम दर पर ब्रॉड बैंड सेवा उपलब्ध कराने का वादा कर रहे थे। ऐसे आरोप सुनने में आते रहे हैं कि कुछ बड़े अधिकारी भारी वेतन के लालच में बी.एस.एन.एल छोडक़र निजी कंपनियों में चले गए। उन्होंने भी बी.एस.एन.एल के हितों पर गहरी चोट की है।

हाल के वर्षों में बी.एस.एन.एल के विनिवेश की चर्चा चली थी। यह आरोप लगाने में संकोच नहीं हो रहा कि साजिश के तहत बी.एस.एन.एल को बीमार बनाया जा रहा है ताकि इसके विनिवेश में अधिक विरोध का सामना न करना पड़ा। २जी स्पेक्ट्रम और एस बैंड आवंटन में हुए भ्रष्टाचार के पर्दाफाश के बाद बी.एस.एन.एल के विरूद्ध चौतरफा साजिशों की आशंका से कैसे इंकार किया जा सकता है। ऐसा लगता, पिछले डेढ़ दशक में बी.एस.एन.एल को जिस तरह नुकसान पहुंचाया गया उसमें हुए भ्रष्टाचार की राशि लाखों करोड़ों रूपयों में होगी।

Wednesday, February 23, 2011

वन्य जीवों का दुश्मन वन मंत्री

---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
कल्पना के बाहर की बात है । देश के एक राज्य में ऐसे वन मंत्री महोदय हैं जिनका कहना है कि जंगलों में हाथी, गेंडे, तेंदुये, हिरण और जंगली भैंसों की बढ़ती आबादी पर अंकुश लगाया जाए। उनका सुझाव कम विचित्र नहीं है। मंत्री जी फरमाते हैं, ‘‘इन अतिरिक्त पशुओं को उन शौकीन लोगों के लिए नीलाम कर देना चाहिए जो इन्हें पालना चाहते हों या फिर इन्हें विदेशी चिडिय़ाघरों में भेज दिया जाए। ’’ वन मंत्री महोदय का मानना है कि उपर्युक्त दो काम नहीं किये जा सकते हैं तो इन वन्य जीवों की नसबंदी करके छोड़ दिया जाए ताकि उनकी आबादी न बढ़े। यह दो कौंड़ी का सुझाव पश्चिम बंगाल के वन मंत्री अनंत रे ने दिया है। उनकी विकृत सोच पर राज्य के वन विभाग के चापलूस अधिकारी मुग्ध हैं। तैयारी केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को पत्र भेजने की है ताकि इस मूर्खतापूर्ण पहल को केंद्र की मंजूरी मिल सके। हैरानी इस बात को लेकर है कि अनंत रे जैसे अज्ञानी और उलट दिमाग व्यक्ति को पश्चिम बंगाल के वन विभाग की जिम्मेदारी किसके सुझाव पर सौंपी गई? अनंत रे ने प्रेस के समक्ष अक्ल का नमूना पेश करते हुए साबित कर दिया है कि उन्हें वन और वन्य जीवों के महत्व का रत्तीभर ज्ञान नहीं है। वह वन्य जीव संरक्षण कानून तक के बारे में नहीं जानते। उन्हें तेजी से घट रही वन्य जीवों की संख्या, उसको लेकर दुनिया भर में व्यक्त की जा रही चिंता और वन्य जीवों की रक्षा के लिए किये जा रहे विश्वव्यापी प्रयासों की जानकारी नहीं है। वन मंत्री का यह तर्क कौन स्वीकार कर पाएगा कि वन्य जीवों की आबादी बढऩे से वे कई बार जंगलों से लगी इंसानी बस्तियों और गांवों में आ जाते हैं तथा लोगों को घायल कर देते हैं। रे को याद दिलाना जरुरी है कि हाल ही में हिमाचल प्रदेश में किसानों के संगठन के दबाव में सरकार ने बंदरों को गोली मारने की छूट दे दी थी। इस आदेश की सर्वत्र आलोचना हुई। राज्य सरकार को रक्षात्मक मुद्रा में आना पड़ा। लेकिन अनंत रे अपने आप में एक मात्र उदाहरण नहीं हैं। ऐसे निर्मोही, दुष्ट और क्रूर सोच वाले लोग आये दिन देखने-सुनने को मिलते हैं। पिछले दो-ढाई दशक में सैकड़ों तेंदुओं को लोगों ने घेर कर इसलिए मार डाला क्योंकि उन्होंने इंसानी बस्तियों में घुसने की गलती की थी। कितने लोग इस विषय पर विचार करते हैं कि हाथी, गेंडे और तेंदुये जैसे वन्य जीव अपने प्राकृतिक आवास से बाहर क्यों आ जाते हैं? वन्य जीव विशेषज्ञों का मत है कि बढ़ती मनुष्य आबादी के कारण शहर फैल रहे हैं। खेतों पर कांक्रीटी जंगल खड़े होने लगे। खेती के लिए जमीन और लकड़ी की लालच के चलते सुनियोजित ढंग से वनों का सफाया किया जा रहा। वन सिमट रहे हैं। जहां घने वन थे वहां पेड़ कम हो गए। जब छाया, पानी और भोजन नहीं मिलेगा तो भूखे-प्यासे वन्य जीव क्या करेंगे? वे बचे-खुचे जंगलों से बाहर निकलने का दुस्साहस करते हैं। वहां मौत उनके इंतजार में खड़ी मिलती है। पीट-पीट कर मार डाला जाता है। यह तथ्य कोई स्वीकार नहीं करता कि जब पेड़-पौधे और अन्य जीव ही इस धरती पर नहीं होंगे, ऐसी स्थिति में मनुष्य जीवन कितने दिन चलेगा? पश्चिम बंगाल के वन मंत्री अनंत रे पर वनों और वन्य जीवों की रक्षा का जिम्मेदारी है। यह विचित्र व्यक्ति वन्य जीवों की नसबंदी का सुझाव दे रहा है। ऐसे व्यक्ति को वन मंत्री पद पर रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। रे को तत्काल चलता किया जाना चाहिए।

Saturday, February 19, 2011

एक धोती, एक कुर्ता, एक पैजामा, एक रूमाल....!

संदर्भ : विदेश मंत्री की लापरवाही

---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
वाह, यह भी खूब रही। एक तो अव्वल दर्जे की लापरवाही उस पर तुर्रा देखिये। गलती मानने की बजाय विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा कह रहे हैं कि ‘‘ संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में उनके सम्बोधन के समय हुई गड़बड़ी कोई बड़ी बात नहीं है।’’ कृष्णा का तर्क है कि ‘‘ सुरक्षा परिषद की उस बैठक के दौरान उनके सामने बहुत से कागज पड़े थे। इसलिए गलती से गलत सम्बोधन उनके हाथ में आ गया।’’ पिछले शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में कृष्णा लगभग तीन मिनट तक पुर्तगाल के विदेश मंत्री का भाषण पढ़ते रहे। वह शायद रुकते भी नहीं अगर समय रहते उन्हें इस गलती का अहसास संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के राजदूत हरदीप सिंह पुरी ने नहीं करवाया होता। नि:संदेह गलती किसी भी इंसान से हो सकती है। लेकिन यह मामला लापरवाही का था। उस पर कृष्णा की ढिठाई देखिये गलती मानने और खेद व्यक्त करने की बजाय उस चूक को साधारण बात निरुपित कर रहे हैं। यह क्यों न कहें कि जो हुआ उसकी वजह विषय के प्रति कृष्णा का अ-गंभीर रुख था या यह आरोप लगायें कि उस महत्वपूर्ण बैठक के समय वह एब्सेंट माइंड थे। इस घटना से बरसों पहले, जब रेडियो सीलोन बेहद लोकप्रिय था, रेडियो पर प्रसारित एक कार्यक्रम में मशहूर कलाकार आईएस जौहर का सुनाया गया चुटकुला याद आ गया।
जौहर सुना रहे थे। एक कवि मंच पर आये, कुर्ते की जेब से एक डायरी निकाली और कविता पाठ करने लगे- ‘‘ एक धोती, एक कुर्ता, एक पैजामा, एक रूमाल...! ’’ कवि महोदय उक्त पंक्ति को चार-पांच बार दोहरा गये। दर्शकों में से किसी ने आवाज लगाई, ‘‘ आगे तो बोलिये!’’ कवि एक क्षण के लिए रुके फिर हाथ जोडक़र क्षमा मांगते हुए जवाब दिया, ‘‘ माफ कीजिए, पत्नी ने धोखे से कुर्ते की जेब में मेरी कविताओं की डायरी के स्थान पर धोबी के हिसाब की डायरी रख दी।’’ जौहर द्वारा सुनाया गया वह चुटकुला कृष्णा जैसे लोगों को देखते हुए आज भी सामयिक लगता है। यह घटना उन सभी लोगों के लिए एक सबक होना चाहिए जो लिखे-लिखाये भाषणों को किसी मंच पर अथवा फोरम में पढऩे से पहले उन पर एक नजर डालना भी जरूरी नहीं समझते। निश्चित रूप से कुछ विशेष आयोजनों में लिखित भाषण ही पढऩे का चलन है। बड़े-बड़े दिग्गज वक्ता भी तथ्यों के गलत प्रस्तुतीकरण और लय टूटने का जोखिम उठाने की बजाय लिखित भाषण पढऩे पर ही जोर देते हैं। कुछ लोग सिर्फ लिखित भाषण ही पढ़ते हैं। दरअसल, भाषण देना और भाषण पढऩा दोनों अलग-अलग कलायें हैं। कुछ लोग लिखे हुए भाषण को इतने बेहतरीन अंदाज में पढ़ते हैं कि श्रोता मंत्रमुग्ध से नजर आते हैं। कुछ की आवाज लिखे हुए भाषण को पढ़ते-पढ़ते कांपने लगती, जुबान लटपटा जाती है। जो लोग भाषण देते हैं, अर्थात बिना लिखित भाषण के बोलते हैं उनके शब्द उनके दिल की आवाज माने जाते। उसमें अध्ययन, अनुभव, बौद्धिक चातुर्य और बात संभालने की समझ होती है। जुबान जरा सी फिसली तो संभलने में देर नहीं लगती। लेकिन विशेष अवसर पर सरस्वती की कृपापात्र ऐसे दिग्गजों को तक लिखित भाषण पढ़ते देखा गया है। भाषण देने वालों की एक तीसरी Ÿोणी भी देखी जाने लगी है। इसमें मूल रूप से कुछ राजनेताओं और कुछेक श्रमिक नेताओं को रखा जा सकता है। ‘‘ जुबानी-अर्श’’ से पीडि़त इस तीसरी Ÿोणी के लोगों को सिर्फ जुबान फटकारना आता है। इसके अच्छे-बुरे प्रभावों से ये बे-परवाह होते हैं।
हमारे विदेश मंत्री से हुई चूक पर विचार करने पर समझ में यह आ रहा है कि अपने लिखित भाषण को पढऩे से पहले उस पर एक नजर डालने की जहमत तक उन्होंने नहीं उठाई थी। कृष्णा का यह तर्क अपना सिर धुन लेने के लिए काफी है कि टेबल में बहुत से कागज पड़े थे इसलिए गलती से वह पुर्तगाल के विदेश मंत्री का भाषण उठा बैठे। सवाल यह है कि ऐसी गलती या लापरवाही हुई कैसे? सुरक्षा परिषद जैसे महत्वपूर्ण मंचों पर ऐसी चूक से समूचे राष्ट्र के सम्मान को ठेस पहुंच सकती है। कृष्णा के लिए घटना बड़ी बात नहीं होगी परंतु उन्हें याद रखना चाहिए कि सुरक्षा परिषद में वह भारत के विदेश मंत्री और सवा अरब भारतीयों के प्रतिनिधि के रूप में मौजूद थे। ऐसी ‘‘ छोटी-छोटी बातें’’ हमारे विषय में कैसी छवि दुनिया में फैलाती होंगी? यही कि भारतीय इतने लापरवाह होते हैं? भविष्य में ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति की आशंका की स्थिति में कृष्णा से यह अपेक्षा की जाती है कि वह कागजों का अंबार लगाने की बजाय काम के कागज ही साथ में रखा करें।
वैसे, भारतीय राजनीति में कृष्णा एक मात्र उदाहरण नहीं हैं। लैंस लगाकर देखें और कई कृष्णा निकल आएंगे। अब वह जमाना कहां रहा जब देश में एक से बढक़र एक नेता थे। वे बोलते थे तो लगता था मस्तिष्क में गणपति और कंठ में सरस्वती विराजमान हैं। घण्टों तक धाराप्रवाह भाषण देने की क्षमता थी उन महान नेताओं में। गहरा अध्ययन, अनुभव और पक्का होमवर्क साफ समझ में आता था। रैली और सभाओं की छोडिय़े, संसद और विधानसभाओं तक में उन महान नेताओं का वाकचातुर्य देख लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते थे। विधायिका में बहस का स्तर उच्च था। वहां कही जाने वाली बातों में गहराई थी। आज स्थिति उलट है। नेताओं के पास न तो पढऩे-समझने के लिए समय है और न उनमें इसके प्रति रुचि है। उस पर ज्ञानी और समझदार होने का भ्रम अलग एक मुसीबत है। बिना तैयारी के जुबान फटकार दी जाती है। सदन में चर्चा का स्तर गिरने की एक प्रमुख वजह यह भी है। कृष्णा से हुई चूक बिना तैयारी के युद्ध में कूद पढऩे जैसी स्थिति दर्शाती है। यह एक सबक है। घर में कुछ भी कहलें परंतु विश्व मंच पर यह सब नहीं चल सकता। कृष्णा का उदाहरण एक सबक है जो सियासी रंगरुटों को गहन प्रशिक्षण की जरूरत बता रहा है। ताकि, भविष्य में गलती से गलत कागज पकड़ में आ जाए तो भी उनका दिमाग स्थिति को संभालने में सक्षम हो।

Friday, February 18, 2011

राहत फतेह अली और गुलफाम हसन

--अनिल बिहारी श्रीवास्तव
विदेशी मुद्रा की तस्करी के आरोप में भारत में गिरफ्तार किये गये पाकिस्तानी गजल गायक राहत फतेह अली खान को पाकिस्तान की ओर से आए दबाव के चलते रिहा कर दिया गया। इस मामले से अनेक सवाल अवश्य उठ खड़े हुए। पहली बात यह है कि क्या इस देश में आम लोगों और खास लोगों के लिए अलग-अलग प्रावधान हैं। आशंका यह भी निराधार नहीं है कि सब चलता है की अपनी मानसिकता के चलते भारत सरकार इस पाकिस्तानी कलाकार को धीरे से चलता कर दे। खबर है कि राजस्व गुप्तचर निदेशालय ने राहत फतेह अली खान और उनके दो साथियों के पासपोर्ट जब्त कर लिये हैं। उन्हें आगे की पूछताछ के लिए १७ फरवरी को पुन: बुलाया गया है। इस बीच उस इवेंट मैनेजमेंट कंपनी की जांच की जा रही है जिसके न्यौते पर राहत यहां आए थे। राहत फतेह अली खान और उनके ट्रुप के सदस्यों को एक लाख २४ हजार डालर जैसी काफी बड़ी लेकिन अघोषित रकम ले जाते हुए रविवार की शाम राजस्व गुप्तचर निदेशालय ने नई दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पकड़ा था। यह कार्रवाई पुख्ता सूचना के आधार पर की गई थी। नियम यह है कि विदेशी मूल का कोई नागरिक ५००० अमेरिकी डालर से अधिक की नगद राशि और ५००० डालर किसी अन्य माध्यम के तौर पर नहीं रख सकता है। यदि इससे अधिक राशि है तब उसकी सूचना कस्टम डिपार्टमेंट को देनी चाहिए। साफ बात है कि राहत फतेह अली खान ने इस देश के कानून का उल्लंघन किया है।
राहत फतेह अली खान की गिरफ्तारी पर पाकिस्तान सरकार की सक्रियता स्वाभाविक थी। लेकिन इस गिरफ्तारी के विरोध में पाकिस्तानियों का सडक़ों पर उतर आना उनकी कुण्ठा और भारत के प्रति अविश्वास का प्रमाण है। राहत के बचाव में पाकिस्तानी अभिनेत्री वीना मलिक, रेशमा और मीरा के बयान दुनियादारी के प्रति उनकी ना समझी का प्रमाण है। यह कहना निरी मूर्खता ही है कि राहत ने जान बूझकर गलत काम नहीं किया है। ऐसे बचाव के बयानों से क्या अर्थ निकालें? दुनिया भर में कार्यक्रम और सैकड़ों बार विदेश यात्राएं कर चुके राहत इतना भी नहीं जानते कि विदेशियों के लिए किस देश के क्या कुछ खास नियम-कानून हैं। भारतीय फिल्म इश्किया मैं ‘‘दिल तो बच्चा है जी’’ गाकर फिल्म फेयर अवार्ड जीतने वाले इस गजल गायक को बच्चा मान कर माफ नहीं किया जा सकता।
राहत फतेह अली खान को विदेशी मुद्रा ले जाते पकड़े जाने पर काफी तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। किसी ने कहा है, राहत की गिरफ्तारी से १९९९ में आई फिल्म सरफरोश की याद आ गई। फिल्म में पाकिस्तानी गजल गायक गुलफाम हसन की भूमिका नसीरुद्दीन शाह ने अदा की है। फिल्म में गुलफाम हसन भारतीयों के बीच अपनी लोकप्रियता का दुरुपयोग करते हुए यहां आतंकवाद फैलाने का काम करता था। वह बाद में पकड़ा और मारा जाता है। हम नहीं कह रहे हैं कि राहत फतेह अली खान और सरफरोश के पात्र गुलफाम हसन के बीच कोई समानता है। लेकिन एक बात तो है गुलफाम हसन पाकिस्तानी था वह यहां के कानून का उल्लंघन कर रहा था। राहत भी पाकिस्तानी है उन पर भी कानून का उल्लंघन करने का आरोप लगा है। राहत के मामले में लीपा-पोती नहीं होना चाहिए। उन्होंने कानून तोड़ा है और उन पर कड़ी कार्रवाई जरूरी है। अभी कुछ माह पूर्व किसी अखबार में गजल गायक जगजीत सिंह और पाश्र्वगायक अभिजीत के बयान पढ़े थे। उन्होंने भारत में मौजूद पाकिस्तानी कलाकारों के हमदर्दों से सवाल किया था कि इस धरती में उन्हें कलाकार नहीं मिलते जो पाकिस्तानी कलाकारों के पीछे भागते हैं? बात सही है ये पाकिस्तानी कलाकार यहां आते, खूब कमाते और धन बटोरकर चलते बनते। दौलत और शोहरत यहां कमाते हैं और मौका आने पर जहर उगलने से तक पीछे नहीं रहते। मगर करें तो करें क्या? अपना सिक्का ही खोटा है। यह तय मानें की भारत सरकार राहत को रोके नहीं रख पाएगी। हां, उन लोगों को पहचान कर कानूनी कार्यवाही अवश्य की जाए तो देश का धन उलीच कर पाकिस्तानियों की जेब में डालते हैं।