Saturday, February 25, 2012

रेलवे को गंदगी से खतरा

(अनिल बिहारी श्रीवास्तव) ट्रेनों के निचले दर्जों में शौचालय सुविधा नहीं होने से यात्रियों को होने वाली असुविधाओं की ओर तत्कालीन रेल अधिकारियों को दो जुलाई १९०९ को पत्र लिखते समय बाबू अखिल चंद्र सेन ने शायद कल्पना नहीं की होगी कि उनकी शिकायत को गंभीरता से लेते हुए रेलवे तत्काल कदम उठाएगा लेकिन ट्रेनों के डिब्बों में शुरू की गई शौचालय की व्यवस्था कालान्तर में भारतीय रेलवे के लिए एक समस्या बन जाएगी। बाबू अखिल चंद्र सेन ने अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर रेलवे के ट्रांसपोरटेशन सुपरिटेंडेंट, साहिबगंज को पत्र लिखकर यात्रियों को होने वाली असुविधा की ओर उनका ध्यान आकृष्ट किया था। रेलवे ने कदम उठाये। भारत में ट्रेनों का संचालन शुरू होने के ५५ बरस बाद निचले दर्जे के डिब्बों में भी शौचालय बनाये जाने लगे। आज वही शौचालय रेलवे के लिए सिरदर्द साबित होने लगे हैं। रेलवे सुरक्षा की समीक्षा कर रही विशेष समिति का कहना है कि किसी यात्री द्वारा जितनी बार किसी ट्रेन के शौचालय का उपयोग किया जाता है, उतनी ही बार वह भारतीय रेलवे को और अधिक खतरनाक बना देता है। अनिल काकोडकर समिति का मानना है कि ट्रेनों के शौचालय से गिरने वाले मल-मूत्र से देश की एक लाख १० हजार किमी लंबी रेल लाइन का काफी बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो रहा है। इस मल-मूत्र से रेल पटरियों की आयु कम हो जाती है तथा विशाल नेटवर्वâ संचालन काफी महंगा पड़ता है। समिति ने कहा कि ट्रेनों के उन सभी ४३ हजार कोचों से ऐसे शौचालयों को तत्काल बदलना जरूरी है जिनमें मल-मूत्र और जल सीधे पटरियों पर गिरता है। ऐसा नहीं करने पर भारतीय रेलवे को पटरियां खराब होने की समस्या से इसी तरह जूझते रहना पड़ेगा। अनिल काकोड़कर समिति ने एक बड़ी गंभीर समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। मुश्किल यह है कि उसकी सिफारिशों पर तत्काल कदम उठाये जाने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। भारत में हर दिन आठ हजार ट्रेनें पटरियों पर दौड़ती हैं। इनमें से १६०० एक्सप्रेस और मेल ट्रेनें हैं। उपनगरीय यात्री गाड़ियों की संख्या चार हजार के आसपास बताई जाती है। एक मोटे अनुमान के अनुसार तीन करोड़ यात्री हर दिन ट्रेनों में सफर करते हैं। ट्रेन के डिब्बों की जो दशा हमारे यहां दिखाई देती है संभवतः वैसी स्थिति अविकसित देशों तक में नहीं देखी गई होगी। यात्रियों द्वारा पैâलाये जाने वाले कचरे के अलावा काकरोच और चूहे यात्री-कोचों में आम बात है। शौचालय सडांध मारते मिलते हैं। इस स्थिति के लिए सिर्पâ रेलवे प्रशासन को नहीं कोसा जा सकता। बल्कि कड़वा सच यह है कि हमारे नब्बे फीसदी यात्रियों में नागरिक-बोध का अभाव है। वे बेधड़क खाने-पीने की चीजें डिब्बे में गिराते हैं। कोच के प्रत्येक शौचालय के बाहर एक अनुरोध-सूचना चस्पा पाई जाती है, ‘‘ कृपया स्टेशन पर ट्रेन खड़ी होने पर शौचालय का उपयोग न करें।’’ कितने लोग इस अनुरोध को स्वीकार करते हैं। बड़े-बड़े स्टेशनों पर पटरियों के बीच मैला, बदबू बिखरा देखा जा सकता है। चलती ट्रेन में शौचालय का उपयोग करने के बाद अनेक महानुभाव फ्लश का उपयोग तक नहीं करते। अतः शौचालय की गंदगी से पटरियों की दुर्दशा का अनुमान लगाना संभव है। काकोड़कर कमेटी की रिपोर्ट ने एक नई बात सामने ला दी है। बात गंदगी अकेले की नहीं है, यहां चुनौती इस गंदगी से पटरियों को बचाने की है। लेकिन प्रश्न यह है कि पटरियों को खतरा सिर्पâ ट्र्रेन के शौचालय से गिरने वाली गंदगी से है? बड़े नगरों और महानगरों के करीब से सुबह गुजरने वाली ट्र्रेनों के यात्रियों से उनका अनुभव जानना चाहिए। उबकाई ला देने वाली बदबू का कारण किसी ने जानने की कोशिश की है? दरअसल, वहां छोटी बस्तियों और झुग्गी क्षेत्रों में शौचालय सुविधा नहीं होने से लोग रेल पटरियों का उपयोग खुले शौचालय के रूप में करते हैं। भारतीय रेलवे ट्र्रेनों के डिब्बों के शौचालय से मल-मूत्र को पटरियों पर गिरने से रोकने के लिए वर्षों से प्रयोग कर रही है। कोई खामी रहित प्रणाली विकसित ही नहीं हो पा रही है। स्टेशन पर खड़ी गाड़ी में शौचालय का उपयोग रोकने के लिए तकनीक विकसित करने की कोशिश की जा रही है। यह तय है कि शौचालयों में सुधार किए बगैर गंदगी से मुक्ति और पटरियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। एक रास्ता फिर भी समझ में आता है कि कोच से मल-मूत्र सीधे गिरने से रोका जाए। डिजाइन इंजीनियरों को शौचालय की आउटलेट की दिशा बदलने पर विचार करना चाहिए। ट्रेन के शौचालय का दुरुपयोग रोकने के उपाय पर स्वयं रेलवे को विचार करना होगा। विशेषज्ञ समिति ने गंदगी को रेल सुरक्षा के लिए ठीक नहीं माना है। इस बात को पहले से ही सभी महसूस करते रहे हैं। बहरहाल, रेलवे कुछ पहल करे और कुछ बदलाव यात्रियों की सोच में आने पर रास्ता निकलने की उम्मीद दिखाई देती है।

Wednesday, April 20, 2011

बिनायक सेन, अब सुधर जाना

----अनिल बिहारी श्रीवास्तव
राष्ट्र द्रोह और नक्सलियों को राज्य के विरुद्ध लड़ाई के लिए नेटवर्क बनाने में मदद करने के आरोप में छत्तीसगढ़ की निचली अदालत से उम्रकैद की सजा पा चुके कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता, ६१ वर्षीय डॉ. बिनायक सेन ने अब राहत महसूस की होगी। देश की सर्वोच्च अदालत ने सेन को जमानत दे दी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एच.एस. बेदी और जस्टिस सी.के. प्रसाद की बेंच ने सेन को जमानत देने की वजह नहीं बताई तथा जमानत की शर्तें तय करने का काम निचली अदालत पर छोड़ दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सेन अब जेल के बाहर आ सकेंगे लेकिन निचली अदालत के फैसले के विरुद्ध आगे की कानूनी लड़ाई उन्हें लडऩी होगी। अत: सेन या उनके हमदर्दो को यह समझ में आ जाना चाहिए कि जमानत मिलना बेगुनाह साबित होना नहीं है। बिनायक सेन पर यह आरोप है कि उन्होंने एक तरह से माओवादियों के कूरियर की तरह भूमिका अदा की थी। वह एक अभियुक्त पीयूष गुहा से ३० बार जेल में मिले थे तथा उनके पास से माओवादी पर्चे और दस्तावेज मिले थे। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सेन की जमानत मंजूर करते हुए जो टिप्पणी की है वह निश्चित रूप से दूरगामी प्रभाव वाली साबित होगी। बेंच ने कहा कि सेन के पास नक्सली गतिविधियों से जुड़े दस्तावेज मिले थे लेकिन इससे आप कैसे देशद्रोह का आरोप लगा सकते हैं। अदालत ने कहा कि ‘‘ जिस तरह महात्मा गांधी की आत्मकथा रखने से कोई गांधीवादी नहीं बन जाता, उसी प्रकार नक्सली साहित्य रखने से भी कोई नक्सली नहीं बन सकता। भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है। वह (सेन) नक्सलियों के हमदर्द हो सकते हैं, इससे दोषी नहीं बन जाते।’’
सेन को जमानत विशुद्ध कानूनी तर्कों के चलते मिली है। नि:संदेह महात्मा गांधी की जीवनी लेकर घूमने वाले को गांधीवादी और नक्सली साहित्य रखने वाले को नक्सली नहीं कहा जा सकता है लेकिन यहां विचारधारा और उसका प्रभाव तथा व्यक्ति विशेष की रुचि पर भी ध्यान दिये जाने की जरूरत है । किसी साहित्य को कोई भी व्यक्ति उसी स्थिति में अपने पास रखता है जब उसके प्रति उसमें झुकाव हो। बिना झुकाव अथवा रुचि के साहित्य का बोझ भला कोई क्यों उठाएगा? गांधी जी की आत्मकथा गांधीवाद से प्रभावित ही अपने पास रखना चाहेगा ताकि गांधी दर्शन से सीखकर अपने देश और समाज के लिए कुछ किया जा सके। ज्ञान बढ़ाने के लिए नक्सली साहित्य को कितने लोग ढोते हैं? भले लोग किसी विचारधारा से कितने भी सहमत क्यों न हों लेकिन यदि उनमें कानून के शासन और संविधान के प्रति आस्था एवं सम्मान हो तो वे उसके विवादास्पद साहित्य से दूर ही रहेंगे। इस देश में ऐसे हजारों उदाहरण सामने आ चुके हैं जब कथित अश्लील साहित्य रखने अथवा नीली फिल्मों की सीडी लिये लोगों को पुलिस ने दबोच लिया। वे अव्वल दर्जे के व्याभिचारी मान लिये गये। आये दिन अखबारों में कॉल गल्र्स पकड़ी जाने की खबरें आती हैं। बताया जाता है कि कैसे कोई पुलिस वाला ग्राहक बनकर पहुंचा और कथित कॉल गल्र्स को पकड़ लिया गया। वहां तो बात सिर्फ देह की कीमत तक ले पाती है। धन लेकर देह समर्पण कहां सम्पन्न होता है। फिर उन लड़कियों को जेलों में क्यों डाल दिया जाता है। कुल मिलाकर स्थिति बड़ी जटिल है। यदि राष्ट्रद्रोह पर उतारु किसी प्रतिबंधित संगठन के प्रति हमदर्दी को अपराध नहीं मानेंगे तब ऐसे प्रतिबंध का अर्थ क्या रह जाएगा? प्रतिबंध का अप्रत्यक्ष उद्देश्य ही आम लोगों को ऐसे व्यक्तियों और संगठनों से दूर रखना होता है। प्रतिबंधित संगठन से हमदर्दी को अपराध नहीं मानने पर पुलिस और सुरक्षा बलों का काम जटिल हो जाता है। बहरहाल, मिस्टर बिनायक सेन के हमदर्द अब खुश होंगे। संभव है कि बताशे बांटे जा रहे हों। क्योंकि बस्तर के जंगलों में मिठाई कहां मिलेगी। बिनायक सेन को सिर्फ इतना परामर्श देना है, ‘‘अब तो सुधर जाओ’’

Monday, April 18, 2011

काले परिधान में साफ लोगों की जरूरत

----अनिल बिहारी श्रीवास्तव
भारत के प्रधान न्यायाधीश एस.एच.कापाडिय़ा ने कहा है कि ‘‘न्यायपालिका में काले परिधान में साफ लोगों की जरूरत है। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सत्यनिष्ठा बनी रहेगी।’’ जस्टिस कापाडिय़ा की उक्त टिप्पणी में भ्रष्टाचार के आरोपों के माहौल में न्यायपालिका की छवि को लेकर उनकी चिंता प्रतिबिम्बित हो रही है। जस्टिस कापाडिय़ा को कहना पड़ा है कि जजों को आत्ममंथन बनाये रखना चाहिए और वकीलों, राजनेताओं, मंत्रियों और राजनीतिक दलों से सम्पर्क से बचें। उन्होंने यह भी सलाह दी कि उच्चस्तरीय जजों को अपने से निचली अदालत के प्रशासनिक कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। जस्टिस कापाडिय़ा की उक्त टिप्पणी का निचोड़ यही समझ में आ रहा है कि न्यायपालिका की पवित्रता बनाये रखने पर जोर दिया गया। संभवत: यही कारण है कि प्रधान न्यायाधीश ने जजों को राजनीतिक संरक्षण नहीं देने पर जोर दिया है। निष्पक्ष विश्लेषकों का यह निष्कर्ष काफी सही लग रहा है कि जस्टिस पीडी दिनाकरन और जस्टिस सौमित्र सेन से जुड़े भ्रष्टाचार के मुद्दों की पृष्ठभूमि में प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण बन गई है। साफ बात यह है कि राजनेताओं तक यह संदेश पहुंच चुका होगा कि न्यायपालिका को भ्रष्टाचार से मुक्त रखने के लिए सहयोग करेंगे। इससे देश और समाज के साथ-साथ सियासी बिरादरी का ही भला होना है।
दो-तीन दिन पूर्व गांधीवादी और सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने खुला आरोप लगाया था कि भ्रष्ट राजनेताओं ने आम लोगों के एक बड़े भाग को भी भ्रष्ट बना दिया है। अन्ना की टिप्पणी को वाकयुद्ध का एक हमला मानने की बजाय चिंतन इस बात पर किया जाए कि राजनेताओं ने अपने निहित स्वार्थों के लिए समाज के किस-किस हिस्से तक भ्रष्टाचार के कैंसर के वायरस को पहुंचाया है? इस संक्रमण से अगर अधिकांश विभाग और वर्ग प्रभावित हैं तब न्यायपालिका को भला कैसे सुरक्षित या अनछुआ माना जा सकता है? ऐसा माना जाता रहा है कि न्यायपालिका के निचले स्तर पर तुलनात्मक रूप से अधिक भ्रष्टाचार है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा द्वारा गत २६ नवंबर को की गई टिप्पणी को याद करें। न्यायाधीश द्वय ने कहा था कि ‘‘इस हाईकोर्ट के अधिकांश जज भ्रष्ट हैं और वकीलों से सांठ गांठ रखते हैं।’’ ऐतिहासिक फैसलों का समृद्ध इतिहास रखने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी आईना दिखाने जैसी है। बड़े दु:ख के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि हाईकोर्टों के कई जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले हैं। समस्या यह है कि उच्च न्यायपालिका के किसी न्यायाधीश को महाभियोग से ही हटाया जा सकता है। यह भी न्यायिक जांच के बाद संभव है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस वी.रामास्वामी का मामला याद करें। जांच में उन्हें दोषी पाया गया था। १९९२ में संसद में महाभियोग प्रस्ताव गिर गया। जाहिर है कि राजनीतिक बिरादरी में मौजूदा जस्टिस रामास्वामी के हमदर्दो ने वफादारी निभा दी। कर्नाटक के चीफ जस्टिस पी.डी. दिनाकरन को याद करें। गंभीर आरोपों के बाद भी वह अदालत में मामलों की सुनवाई करते और प्रशासनिक फैसले लेते रहे। गंगटोक स्थानांतरण आदेश का पालन उन्होंने विलंब से किया। इस हठी और अडिय़ल व्यवहार के पीछे के कारण राजनीतिक संरक्षण ही रहा है।
न्याय पालिका को भ्रष्टाचार से मुक्त रखने के लिए जरूरी है कि नैतिक पतन, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के मामलों का निबटारा फास्ट ट्रैक कोर्ट से करवाया जाए। उच्च न्यायपालिका के भ्रष्ट जज को हटाने के लिए महाभियोग प्रक्रिया तेज हो। किसी न्यायाधीश के विरुद्ध कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति की ओर से मंजूरी की समय-सीमा तय की जाए। दरअसल, जजों की नियुक्ति से लेकर सेवानिवृत्ति तक के सभी फैसले लेने का अधिकार न्यायपालिका के हाथों में रहना चाहिए। कोई राजनेता न्यायाधीशों को किसी भी प्रकार से प्रलोभन देने की स्थिति में ही न रहे। इसके अलावा आचार संहिता के कड़ाई से पालन को सुनिश्चित करके न्यायपालिका को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है।

ठेका नहीं लिया है पाक खिलाडिय़ों को पालने का

----अनिल बिहारी श्रीवास्तव
पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी शाहिद आफरीदी ने इंडियन क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) से अपील की है कि इंडियन प्रीमियर लीग में शामिल किये जाने के समय पाकिस्तान क्रिकेट खिलाडिय़ों के साथ अछूतों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। कराची में आफरीदी ने सफाई दी कि वह अपनी बात नहीं कर रहे हैं। वह चाहते हैं कि पाकिस्तानी युवा क्रिकेट खिलाडिय़ों को आईपीएल जैसे प्लेटफार्म पर खेलने का अवसर मिले। उल्लेखनीय है कि आईपीएल के पहले संस्करण (२००८) में ११ पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को खेलने का मौका मिला था। हैदराबाद टीम से उस आईपीएल में शामिल हुए शाहिद आफरीदी सबसे महंगे पाकिस्तानी खिलाड़ी थे जिसने पौने सात लाख डालर की मोटी रकम कमाई थी। मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद उत्पन्न सुरक्षा चिंताओं के चलते २००९ और २०१० के आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ी नहीं खेल पाए। आईपीएल के आज से शुरू हो रहे चौथे संस्करण में भी पाकिस्तानी खिलाड़ी नहीं हैं। यह तो आंकड़ों की बात हुई लेकिन आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाडिय़ों की रुचि के पीछे एक जुझारू और फटाफट क्रिकेट मुकाबले में खेलकर बल्ले और गेंद पर हाथ साफ करने और नाम कमाने की भावना के पीछे असल आकर्षण इस टूर्नामेंट से खिलाडिय़ों पर होने वाली नोटों की बारिश है। यह एक ऐसा अवसर होता है जब अच्छा खिलाड़ी नोटों की गठरी बांधकर घर लौटता है। वह आर्थिक चिंताओं से कई वर्षों तक मुक्त रह सकता है। इस देश में भी कुछ लोग आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को मौका देने की वकालत कर चुके हैं। उनका सिर्फ यही राग सुनाई देता है कि इससे दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य होने में मदद मिलेगी। लेकिन इतिहास गवाह है विभाजन के छह दशकों के दौरान भारत ने कम-से-कम ६०० बार पाकिस्तान से संबंध सामान्य बनाने की कोशिश की होगी। भारत ने पाकिस्तानियों के तमाम छल-कपट को नजरअंदाज किया है। पाकिस्तान के विषवमन की ओर कभी ध्यान नहीं दिया लेकिन बदले में भारत को मिला क्या? ईष्र्या, नफरत, साजिशें और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जहर की बौछार? अपनी दकियानूस सोच, कट्टरवाद, आतंकवाद को संरक्षण के कारण पाकिस्तान पिछड़ा है। वह कर्ज में डूबा है, मगर उसकी अकड़ कायम है। इस सबके बावजूद पाकिस्तानी कलाकारों को यहां काम दिया जाता है। गंभीर रूप से बीमार पाकिस्तानियों का यहां मुफ्त या रियायती दर पर इलाज होता है। कम-से-कम आधा दर्जन पाकिस्तानी शिशुओं और बच्चों के दिल यहां दुरुस्त किये गये। राजनीति और कूटनीति का फेर ऐसा है कि भारत, पाकिस्तानी कारस्तानियों को जानते हुए भी अक्सर चुप रहा। अधिकांश पाकिस्तानियों के दिमाग में भारत और भारतीय के प्रति कितनी नफरत और जहर भरा है इसका प्रमाण विश्वकप क्रिकेट के सेमीफाइनल में भारत के हाथों पराजय के बाद पाकिस्तान लौटे उनके कप्तान शाहिद आफरीदी के बयान से मिल गया। आफरीदी ने भारतीयों को छोटे दिल वाला बताया था। उसके अनुसार भारतीयों के साथ रहा ही नहीं जा सकता है। वहीं आफरीदी आज भारतीय क्रिकेट बोर्ड से कह रहा है कि आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को शामिल किया जाए। क्यों? क्या भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने ठेका लिया है पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को पालने का? हैरानी हो रही है कि शाहिद आफरीदी के बयान पर? क्या कोई इंसान इतना भी मक्कार हो सकता है? साफ शब्दों में कहें, पाकिस्तानियों को यहां खेलने देने की इजाजत का अर्थ सांप को दूध पिलाने की तरह होगा। यहां से दौलत, शोहरत कमाओ और अपने देश लौटकर हमें कोसो। अरे भई! आप आईपीएल में क्यों खेलना चाहते हैं। अपना खुद का पीपीएल शुरू कर लो। आश्वस्त करते हैं हमारा कोई खिलाड़ी उसमें खेलने देने के लिए आप के समक्ष नहीं गिड़गिड़ाएगा।

Friday, April 8, 2011

समस्या फर्जी गरीबों से निबटने की

---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
संसद की एक स्थायी समिति ने गरीबों की गणना में भारी धांधली को उजागर किया है। समिति के अनुसार गरीबी की रेखा के ऊपर (एपीएल) के ८६ प्रतिशत लोगों को गरीबी की रेखा के नीचे (बीपीएल) में शामिल कर लिया गया है। ग्रामीण इलाकों में भी स्थिति बुरी है जहां १७ प्रतिशत धनाढ्य लोगों को बीपीएल कार्ड दिये गए हैं। इस विषय पर आगे बढऩे से पहले २००८-०९ के आर्थिक सर्वेक्षण को याद करना जरूरी है जिसके अनुसार देश में ८०.५ प्रतिशत आबादी ऐसे लोगों की है जो बीस रुपये प्रतिदिन पर गुजारा करते हैं। लेकिन देश में बेहद गरीबों की संख्या को लेकर आंकड़ों पर विवाद रहा है। अर्जुन सेनगुप्ता की अगुआई वाले आयोग ने कहा था कि ७७ प्रतिशत आबादी ऐसे लोगों की है जो बीस रुपये रोज पर गुजारा कर रहे हैं। इस तरह के दावों का तकनीकी आधार क्या था? इन्हें स्वीकार करने का मन नहीं हुआ लेकिन योजना आयोग द्वारा पी.तेंदुलकर की अध्यक्षता में गठित समिति ने पाया कि गरीबी की रेखा में जीवनयापन करने वालों की आबादी ३७ प्रतिशत है। यदि बीपीएल निर्धारण के मापदण्ड को देखें तब यह ३७ प्रतिशत वाला आंकड़ा भी हजम नहीं होता है। गरीबी रेखा का निर्धारण १९७८ में आय और खाद्य जरूरत को देखते हुए तय किया गया था। तब ग्रामीण क्षेत्रों में ६१.८० रुपये प्रतिमाह प्रतिव्यक्ति और शहरी क्षेत्र में ७१.३० रुपये प्रति व्यवित, प्रतिमाह को गरीबी की रेखा माना गया। योजना आयोग प्रत्येक वर्ष मुद्रास्फीति के आधार पर इसकी गणना करता है। वर्ष २००५-०६ में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ३६८ रुपये प्रति व्यक्ति, प्रतिमाह और शहरी क्षेत्रों के लिए ५६० रुपये प्रति व्यक्ति, प्रतिमाह को गरीबी की रेखा माना गया। इतनी आय से सिर्फ पेट की आग जैसे-तैसे शांत की जा सकती है। स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी अन्य जरूरतों की पूर्ति इतनी कम राशि से नहीं हो सकती। जाहिर है कि इतनी आय पर किसी तरह जी रहे लोगों को सरकार समाज की ओर से सहारा मिलना जरूरी है। दूसरे शब्दों में कहें कि निश्चित रूप से देश के बेहद गरीब लोगों को कुछ मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सहारा देना एक जिम्मेदारी भरी सोच है। लेकिन बीपीएल कार्डधारियों को रियायती दर पर खाद्यान्न, कुछ राज्यों में एक बत्ती विद्युत कनेक्शन जैसी सुविधाएं शुरू किये जाने के साथ ही इनकी संख्या बढऩे लगी। अधिकांश राज्यों में बीपीएल कार्डधारियों की संख्या बढऩे से यह संदेह मजबूत हुआ कि अपात्र लोग कतिपय शासकीय कर्मचारियों, पार्षदों, राजनेताओं और दलालों के सहयोग तथा संरक्षण से गरीबी की रेखा के नीचे जीने वालों की सूची में अपना नाम दर्ज करवाने में कामयाब हो गये हैं। ऐसी हरकत जहां अव्वल दर्जे की छिछोरी मानसिकता को दर्शाती है वहीं इसके कारण वास्तविक गरीबों का हक छिनने की आशंकाएं मजबूत होती हैं। बीपीएल आबादी में की गई गड़बड़ी का प्रमाण स्वयं संसद की समिति ने दिया है जो इस सूची में ८६ प्रतिशत लोग एपीएल के होने का दावा कर रही है। मध्यप्रदेश में एक जिला कलेक्टर ने बीपीएल सूची में फजी गरीबों की घुसपैठ को रोकने के लिए सराहनीय काम किया। उन्होंने बीपीएल सूची वाले परिवारों के मकान के बाहर उनका बीपीएल क्रमांक दर्ज करवाने के निर्देश दिये। बड़ा उत्साहजनक परिणाम सामने आया। कई लोग स्वेच्छा से आगे आए और बीपीएल सूची से अपने नाम हटवा लिये। प्रश्न यह है कि इतनी नैतिकता और साहस कितने परिवार दिखा पाएंगे? बीपीएल कार्डधारी परिवार के मकान के सामने विवरण दर्ज करना एक सही उपाय है। कोई गरीब है और सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाएं भोग रहा है, फिर उसे इस सत्य को स्वीकार करने में शर्म नहीं महसूस होनी चाहिए। उधर, सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि बीपीएल परिवार तय करते समय पुख्ता जांच हो। जान बूझकर या अनजाने में तथ्यों को छुपा या दबाकर बीपीएल सूची में आने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। आखिर बीपीएल परिवारों को मदद करदाताओं से वसूली गई रकम से ही की जाती है। ऐसे धन का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।

Tuesday, March 22, 2011

जिसकी लाठी उसकी भैंस

----अनिल बिहारी श्रीवास्तव
आल इंडिया जाट आरक्षण समिति के आह्वान पर आंदोलनरत जाट समुदाय ने उत्तर प्रदेश में रेल लाइन और हाईवे से अवरोध हटा लिये हैं। जाटों के नेताओं ने कहा है कि केंद्र सरकार की नौकरियों में जाटो के लिए आरक्षण के बारे में जल्द निर्णय नहीं लिया गया तो वे नये सिरे से व्यापक आंदोलन शुरू करेंगे। खबर है कि हरियाणा में आंदोलनकारी जाट अभी भी अपने कदम पीछे हटाने को तैयार नहीं है। जाट आंदोलनकारियों ने गत ५ मार्च से रेल लाइन और हाइवे पर अवरोध पैदा कर आवागमन ठप्प सा कर दिया था। उनके आंदोलन से अकेले रेल्वे को एक अरब रूपये की चोट पड़ी है। आम आदमी को अलग परेशानी हुई। बीमार लोग इलाज के लिए दिल्ली नहीं जा पा रहे थे, कितने ही बेरोजगार समय पर इंटरव्यू के लिए नहीं पहुंच पाए। एक अनुमान के अनुसार हर दिन लखनऊ से ही १३-१४ हजार लोग देश की राजधानी जाते और कमोवेश इतनी ही बड़ी संख्या में वहां से लौटते हैं। कल्पना की जा सकती है कि रेल और सडक़ परिवहन ठप्प किए जाने से आम आदमी को कितनी पेरशानी हुई होगी। राजस्थान में गुर्जर आंदोलनों के समय इसी तरह का नजारा देखने को मिला था। गुर्जरों का आंदोलन भी आरक्षण के लिए रहा हैं। आरक्षण संबंधी गुर्जरों और जाटों की मांग के पक्ष-विपक्ष में सैंकड़ों तक दिये जा सकते है। मुद्दा यह है कि कोई भी समुदाय या सम्प्रदाय अथवा जाति के लोग अपनी मांग मनवाने के लिए आम आदमी का जीवन क्यों मुश्किल कर देते हैं? राष्ट्र की सम्पत्ति को क्यों नुकसान पहुंचाया जाता है? सबसे बड़ी बात यह है कि वोट बैंक खोने के डर से जहां सरकार चलाने वाले लोग नपुंसकों की तरह देखते हैं वहीं अवसरवादी राजनेता ऐसे आन्दोलन को अपने-अपने ढंग से हवा देते हैं। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन के दौरान लोगों को हुई परेशानी और सार्वजनिक सम्पत्ति के नुकसान के बावजूद तत्कालीन वसुन्धरा राजे सरकार और केंद्र हाथ पर हाथ बांधे ताकते रहे। उस समय भी न्यायपालिका को आगे आकर जवाब-तलब करना पड़ा। इस बार जाट आंदोलन से लोगों को हो रही परेशानी पर भी मायावती सरकार खर्राटे मार कर सो रही थी। हाईकोर्ट द्वारा रेल लाइन से आंदोलनकारियों को हटाये जाने का आदेश देने पर राज्य सरकार जागी। मुख्यमंत्री मायावती ने जाट आंदोलनकारियों के ट्रैक से हटने का Ÿोय लेने में पलभर की देर नहीं की। मायावती तो जाट समुदाय की मांग को पहले ही समर्थन दे चुकी हैं। मजाल है कि कोई उनसे पूछ सके कि आंदोलन के कारण आम लोगों ने १५ दिनों तक जो कष्ट भोगा उस समय आप कहां थीं? किसी की मांग कितनी न्यायोचित या वाजिब हैं, एक अलग प्रश्न है लेकिन लोकतंत्र में मिली आंदोलन की सुविधा का जैसा दुरूपयोग भारत में दिखाई देने लगा है वैसा दुनिया में और कहां देखा गया है? आप किसी भी जाति, समुदाय अथवा सम्प्रदाय के हों लेकिन यदि किसी भी प्रकार से अपने लोगों की भावनाएं उभारने का माद्दा है तब सिकन्दर बनते देर नहीं लगेगी। ट्रेनों का आवागमन रोक देना, ट्रेनों और अन्य परिवहन साधनों को निशाना बनाना, खाद्यान्न अथवा दूध आदि की आपूर्ति रोकने की धमकी देना, सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाना, आखिर यह सब क्या है? उस पर तुर्रा यह कि आपके विरूद्ध बल प्रयोग नहीं होना चाहिए। कानून के शासन के बावजूद ऐसी मनमानी क्या जंगल राज या जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावतों को सच साबित नही कर देती हैं? वोट बैंक की राजनीति से उठकर सभी को गंभीर रूप लेती इस प्रवृत्ति को रोकने पर विचार करना होगा। टीवी चैनलों गाल बजाने और अखबारों में कलम दौड़ाने वालों को भी निडर होकर सकारात्मक सुझाव देने होंगे।

Friday, March 18, 2011

उपदेश मत दीजिये!

---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एस. एच. कपाडिय़ा ने कहा है, ‘‘न्यायाधीशों को अपना काम करते समय समाज को उपदेश नहीं देना चाहिए। उन्हें विधायिका की बुद्धिमत्ता का आकलन नहीं करना चाहिए।’’ जस्टिस कपाडिय़ा ने आगे कहा, ‘‘समस्या यह है कि हम अपने मूल्यों, अपनी पसंद-नापसंद समाज पर थोप देते हैं।’’ वह संवैधानिक नैतिकता विषय पर न्यायमूर्ति पीडी देसाई स्मृति व्याख्यान दे रहे थे। प्रधान न्यायाधीश ने न्यायाधीशों को उपदेश नही देने की सलाह दी है। इसका सीधा अर्थ यह है कि मामले से जुड़े सिद्धान्तों के अलावा किसी विषय पर नही बोला जाना चाहिए। जस्टिस कपाडिय़ा की उक्त टिप्पणी उनके दीर्घ अनुभव पर आधारित हैं। उन्होंने वह बात कही है जिसके विषय मे लम्बे समय से लोग सोचते रहे हैं लेकिन विषय न्यायपालिका से जुड़ा होने के कारण खुलकर बोलने से बचते रहे। वास्तव में लोकतंत्र मे न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका का अपना महत्व और अपनी-अपनी भूमिकाएं है’। आधुनिक लोकतंत्र में चौथे स्तम्भ के रूप में प्रेस/मीडिया को अघोषित मान्यता सी मिली हुई है। इन चारों की अपनी कार्य प्रणाली और सीमायें है। यह अपेक्षा की जाती है कि ये सभी अपनी सीमाओ में रहें तथा यह अवश्य सुनिश्चित किया जाए कि कोई किसी के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर टकराव पैदा नही कर रहा है। इसके लिए संवैधानिक प्रावधानों के साथ साथ नियम कानून हैं। लेकिन हमारे यहां कई बार विचित्र स्थिति उत्पन्न होती दिखी। मर्यादा की मेढ़ टूटने की आशंका हुई। गनीमत यह है कि लगभग चारों स्तम्भ समय रहते सजग हो गए। जस्टिस कपाडिय़ा की टिप्पणी पर विचार करते समय दो बिंदुओं पर केंद्रित हो सकते हैं। मसलन, न्यायाधीश फैसला सुनाते समय कहीं निजी धारणाओं के प्रवाह में तो नहीं आ गए और न्यायपालिका की अति सक्रियता। कुछ लोग न्यायपालिका की अति सक्रियता की बात करते हैं लेकिन भारत के संदर्भ में एक सकारात्मक बात यह है कि न्यायपालिका ने हमेशा उन्हीं विषयों पर व्यवस्था दी जहां किसी भी कारण से लोकतंत्र के अन्य स्तम्भ पीछे रह गए। यही कारण है कि ऐसी व्यवस्थाओं को आमजन का भरपूर समर्थन मिला तथा लोगों का न्यायपालिका के प्रति विश्वास और अधिक मजबूत हुआ। जब बात किसी न्यायाधीश द्वारा उपदेश शैली मे टिप्पणी की जाती है अथवा मामलो से जुड़े सिद्धांतो के अलावा किसी अन्य विषय पर कुछ कहा गया तब उसपर प्रतिक्रिया भी हुई। ऐसी प्रतिक्रियायें मर्यादा और अनुशासन की सीमाओं मे रहीं। हाल में ही कम से कम दो उदाहरण सामने आए जिनमें अदालत की किसी टिप्पणी पर खुलकर असहमति व्यक्त की गई तथा उसे वापस लेने या उसमें संशोधन के लिए उचित न्यायिक मंच का सहारा लिया गया। ऐसी ही एक टिप्पणी को स्वयं सुप्रीम कोर्ट पिछले दिनों संशोधन कर चुका है। निष्कर्ष यह है कि सभी को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए सीमाओ का ध्यान रखना चाहिए। यह बात विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से जुड़े सभी लोगो पर लागू होती है। सवाल यह है कि कोई भी विषयान्तर क्यों हो? न्यायाधीश एक सम्मानीय और प्रतिष्ठापूर्ण पद है। वहां से निकले शब्दों का ब्रह वाक्य के रूप लिया जाता है। प्रधान न्यायाधीश की यह अपेक्षा उचित है ‘‘हमें सिर्फ संवैधानिक सिद्धांतो के लिए ही काम करना चाहिए।’’ संवैधानिक व्यवस्था में किसी को अधिकार नही है कि वह दूसरों को उनके काम के बारे में बताये। लोकतंत्र की परिपक्वता और सफलता इसी पर टिकी है।