Friday, November 25, 2016
नोटबंदी से केजरीवाल क्यों बेहाल?
-अनिल बिहारी श्रीवास्तव
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा है यदि प्रधानमंत्री यह साबित कर दें कि 500 और 1000 हजार रुपए के नोट बंद कराने से कालाधन खत्म हुआ है तो वह उनकी प्रशंसा में ताली बजाएंगे और उनके नाम का जाप करने लगेंगे। नोटबंदी की घोषणा के बाद से ही केजरीवाल और उनकी पार्टी के लोग इसके विरोध में हर घण्टे एक नया बयान दे रहे हैं। केजरीवाल ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर सीधे निशाना साध रखा है। उनका आरोप है कि नोटबंदी के पीछे आठ लाख करोड़ का घोटाला है। केजरीवाल की मांग हेै कि नोटबंदी का फैसला वापस लिया जाए। उन्हें तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का समर्थन मिल रहा है। ममता बनर्जी दो बार दिल्ली आ चुकीं हैं। हालांकि नोटबंदी पर लगभग सभी विपक्षी दल किसी न किसी रूप में विरोध कर रहे हैं। इनमें से कुछ को शिकायत नोटबंदी के तरीके को लेकर है। कुछ का कहना है कि सरकार ने पूरी तैयारी के बिना ही अपना फैसला लागू कर दिया जिससे आम आदमी, किसान और मजदूरों को काफी दिक्कत हो रही है। विपक्षी दलों के बीच नोटबंदी फैसले के विरूद्ध एकता दिखाने की कोशिश भी की जा रही है। दूसरी ओर इस बात पर भी लोगों का ध्यान गया है कि विपक्षी नेताओं में मोदी विरोध के नाम पर प्रचार लूटने की होड़ लगी है।
इन दिनों केजरीवाल कुछ अधिक मुखर हो गए हैं। उधर, निष्पक्ष विश£ेषकों को मानना है कि केजरीवाल द्वारा लगाए जा रहे आरोपों का विशेष असर दिखाई नहीं दे रहा। यह धारणा बन रही है कि केजरीवाल सिर्फ मोदी विरोधी अपनी सोच के चलते नोटबंदी के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं। सोशल मीडिया में केजरीवाल और उनकी मण्डली की सक्रियता से साबित हो रहा है कि सारा काम बंद कर पूरी टीम बयान झाडऩे और टिप्पणियां करने में मस्त है। पिछले दो दिनों से ट्वीटर पर आम आदमी पार्टी की हर पोस्ट में दो नारे लिखे दिखते हैं- नोट नहीं पीएम बदलो और अब भाजपा को वोट नहीं। यहां गौर करने लायक तथ्य यह है कि नोटबंदी के विरूद्ध केजरीवाल के अभियान को उनके उन पुराने साथियों समर्थन नहीं मिल पा रहा जिनके बूते केजरीवाल ने अपनी पहचान बनाई थी। इनमें प्रमुख नाम समाजसेवी अन्ना हजारे, योगगुरू बाबा रामदेव, फिल्म अभिनेता अनुपम खेर के हैं। भ्रष्टाचार के विरूद्ध आन्दोलन के दिनों के दर्जनोंं सहयोगी अब केजरीवाल का साथ छोड़ कर जा चुके हैं। उनमें से कुछ को केजरीवाल की कार्यप्रणाली का विरोध करने पर आम आदमी पार्टी से बाहर कर दिया गया।
नोटबंदी पर समाजसेवी अन्ना हजारे ने केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के फैसले की प्रशंसा करते हुए आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल किए जा रहे विरोध की हवा निकाल दी। अन्ना ने कहा, जो जैसा चश्मा पहनता है उसे वैसा ही दिखता है। सरकार के इस फैसले पर कौन क्या कह रहा है हमें नहीं देखना। हमारा मानना है कि हमें समाज और देश की भलाई को देखना चाहिए। अन्ना ने कहा कि हम तो लंबे समय से मांग ही कर रहे थे कि 500 और 1000 के नोट बंद किए जाएं। मोदी सरकार ने हमारी मांग के अनुरूप कदम उठाया है।
बाबा रामदेव सरकार के पक्ष में पूरी तरह डटे हैं। पिछले दिनों उन्होंने यह तक कहा कि कालाधन, नकली मुद्रा, आतंकवाद और नक्सली समस्या से निबटने के लिए सरकार द्वारा लिए गए नोटबंदी के फैसले का विरोध एक तरह से राष्ट्रद्रोह जैसी हरकत है। बाबा रामदेव ने सन 2011 मेंं कालेधन की विदेश से वापसी और भ्रष्टाचार नियंत्रक कानून की मांग लेकर आंदोलन चलाया था। इसके अंतर्गत अपने हजारों अनुयायियों के साथ उन्होंने दिल्ली में सामूहिक अनशन किया था।
लोकप्रिय फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने भी नोटबंदी के फेैसले को पूरा समर्थन दिया है। अनुपम खेर के विरूद्ध केजरीवाल किस मुंह से जुबान चला सकते हेैं। अन्ना हजारे के आन्दोलन इंडिया अगेंस्ट करप्शन के समय केजरीवाल को कितने लोग जानते थे? बताया जाता है कि उस समय मनीष सिसोैदिया ने अनुपम खेर्र को फोन कर उनसे दिल्ली आने का अनुरोध किया था ताकि लोगों के सामने एक ऐसा चेहरा आन्दोलन का समर्थक बताया जा सके जिसे सभी जानते हों और जो लोकप्रिय हो। सिसौदिया के अनुरोध पर खेर और प्रीतिश नंदी अन्ना के उस आन्दोलन के समर्थन में दिल्ली गए थे। खेर आज आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि जो लोग कभी भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ आन्दोलन कर रहे थे उनमें से कुछ लोग आज नोटबंदी का विरोध कर रहे हैं। खेर ने केजरीवाल का नाम नहीं लिया लेकिन इशारों ही इशारों में कहा कि आपका काम दिल्ली में ह,ै उसे करें। राष्ट्रीय मुद्दों पर क्यों सिर खपा रहे हैं।
नोटबंदी को लेकर भले ही विपक्षी राजनीतिक दल एक साथ खड़े नजर आ रहे हों लेकिन उनकी आपसी खुन्नस साफ महसूस की जा सकती है। कांगे्रस और वामपंथी दलों को लग रहा है कि ममता बनर्जी द्वारा किए जा रहे विरोध के पीछे कारण सिर्फ राजनीतिक लाभ उठाने की मंशा है। ममता साबित करना चाहतीं हैं कि वह मोदी विरोधी खेमे की सबसे ताकतवर नेता हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी राजनीति में कमजोर पड़ती अपनी स्थिति को मजबूत करने की जुगत भिड़ा रहे हैं। शिवसेना ने नोटबंदी
के तरीक के विरोध में ममता बनर्जी के साथ चल कर अपनी खीझ उजागर कर दी।
अरविन्द केजरीवाल द्वारा लगाए जा रहे आरोपों को विपक्षी दलों से कोई विशेष समर्थन नहीं मिल रहा है। सच्चाई यह है कि अधिकांश विपक्षी नेताओं को केजरीवाल की नीयत पर ही संदेह है। किसी ने टिप्पणी की कि जो व्यक्ति अपने गुरू का साथ छोड़ बैठा वह किसी दूसरे का कितना सगा हो सकता है। राजनीतिक और कुछ अज्ञात कारणों से नोटबंदी को लेकर मोदी और केन्द्र सरकार का वे भले विरोध कर रहे हों परन्तु केजरीवाल को हीरो बनने को मौका कम से कम विपक्षी दल नहीं देने वाले। केजरीवाल के संदर्भ में दूसरी बात यह है कि उनके आए दिन के अनर्गल प्रलापों के कारण आम आदमी पार्टी की छवि प्रभावित हुई। सभी विपक्षी राजनीतिक दल केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं और उनके अतीत से परिचित हैं। वे जानते हैं कि मोदी का विरोध करने में केजरीवाल के साथ खड़े होने का अर्थ अपनी राजनीतिक आत्महत्या का प्रयास जैसी बात हो जाएगी।
भाजपा के सूत्र केजरीवाल के इस सुझाव को हास्यास्पद मानते हैं कि नोटबंदी आदेश फिलहाल वापस लिया जाए और दो माह बाद पूरी तैयारी से कालेधन के खिलाफ अभियान शुरू हो जिसमें नए सिरे से नोटबंदी भी शामिल हो। कहा जा रहा है कि केजरीवाल की मांग मानने का अर्थ कालेधन को सफेद होने का मौका देना होगा। इससे आतंकवादियों, नक्सलियों और उग्रवादियों के साथ-साथ नकली नोटों के सौदागरों को तैयारी करने का अवसर मिल जाएगा। लोग जानना चाहते हैं कि केजरीवाल मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई एक बड़ी लड़ाई में पलीता लगाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? नोटबंदी ने केजरीवाल का हाल क्यों बेहाल सा कर दिया है?
Monday, November 14, 2016
अब लुटेरों का काला चि_ा खोलने की तैयारी
(अनिल बिहारी श्रीवास्तव)
500 और 1000 हजार के पुराने नोटों पर लागू प्रतिबंध को लेकर कुछ राजनीतिक दल और क्षेत्रीय क्षत्रप जिस तरह की बयानबाजी और विरोध कर रहे हैं उसका जवाब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जापान यात्रा से लौटने के बाद एक विशाल सभा में दे दिया। उन्होंने नोटबंदी वापस लेने और छूट समय सीमा को कुछ बढ़ाने जैसी मांगों को सिरे से खारिज कर दिया है। मोदी ने साफ कर दिया है कि कालेधन के खिलाफ उनका अभियान जारी रहेगा। उनके पास अभी कई परियोजनाएं हैं जिन्हें भविष्य में लागू किया जाएगा। इसके लिए वह कोई भी नतीजे भुगतने को तैयार हैं। प्रधानमंत्री ने माना कि लोगों को हो रही असुविधा का उन्हें अहसास है। उन्होंने देशवासियों से सिर्फ पचास दिनों का समय मांगा है ताकि कालेधन के खिलाफ उनकी लड़ाई सफल हो सके।
मोदी का भाषण लोगों के दिलों को छू देने वाला रहा। वह इस समय हो रही बेसिर-पैर की या आधारहीन आरोपों से लैस बयानबाजी नहीं थी। उसमें सरकार के अगुआ का आत्मविश्वास, अपने फैसले की सफलता को लेकर आश्वस्त होना और जनविश्वास मिलने को भरोसा साफ दिखाई दिया। यह सही है कि नोटबंदी के तुरन्त बाद प्रधानमंत्री के थाईलैंड और जापान यात्रा पर चले जाने के बाद यहां कुछ विपक्षी नेताओं द्वारा की गई बयानबाजी और मीडिया के एक वर्ग द्वारा किए जा रहे कवरेज के पीछे छिपी मंशा ने आम लोगों के छोटे से हिस्से को विचलित सा कर दिया था लेकिन प्रधानमंत्री की स्वदेश वापसी और उनके वक्तव्य से निश्चित रूप से आश्ंाकाओं और अनिश्चितता के बादल छंट सकेंगे। नोटबंदी के फैसले को शुरूआत में ही व्यापक समर्थन मिलता दिखने लगा था। वास्तव में यह फैसला कुछ खास लोगों के लिए भौंचक कर देने वाला रहा लेकिन नोटबंदी के विरूद्ध जिस तरह से सबसे पहले कांगे्रस की ओर से विरोध हुआ वह चौंकाने वाला था। इसके बाद बहुजन समाज पार्टी की अगुआ मायावती, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने नोटबंदी के विरूद्ध बयान दिए। तर्क दिया जा रहा था कि फैसले से आम लोगों विशेषकर किसानों, मजदूरों, गरीबों और महिलाओं को काफी असुविधा हो रही है। मुलायम सिंह यादव की यह मांग कतई भी व्यावहारिक नहीं कही जा सकती कि नोटबंदी लागू करने से लोगों को समय दिया जाना था। केन्द्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली ने सटीक कटाक्ष किया है। उन्होंने कहा कि समय देकर क्या कालाधन रखने वालों को अपनी व्यवस्था कर लेने का मौका दिया जाता। जेटली कि बात सही है। आखिर बड़े फैसले अचानक ही लिए और लागू किए जाते हैं। उधर, मायावती आधारहीन तर्कों से लैस आरोप सरकार पर लगा रहीं थीं। उन्हें केन्द्रीय मंत्री उमा भारती की ओर से तीखे कटाक्ष का सामना करना पड़ा। उमाभारती के इस बयान पर गौर किया जाना चाहिए कि बहन मायावती को नोटों की मालाओं को छिपाने में परेशानी हो रही है इसलिए वह आदरणीय प्रधानमंत्री के फैसले की आलोचना कर रहीं हैं।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी फै सले के दूसरे दिन ही इसके विरूद्ध मैदान में कूद पड़ीं। वह एक ही राग गा रहीं हैं कि इससे गरीबों को परेशानी हो रही है। ममता बनर्जी नोटबंदी को वापस लेने की मांग तो कर रहीं हैं परन्तु उनके पास इस बात का जवाब नहीं मिल रहा कि कालेधन और नकली मुद्रा जैसी समस्या से कैसे निबटा जाए। ममता बनर्जी के विरोध से समझ आ रहा है कि इसके पीछे कारण विशुद्ध राजनीतिक है। वह स्वयं को गरीबों और आम आदमी का हमदर्द साबित कर अपनी मोदी विरोधी इमेज को चमकाने का प्रयास कर रहीं हैं। गौरतलब है कि ममता को इस काम में उनके गठबंधन के सहयोगी दलों का ही समर्थन नहीं मिला है। यहां तक कि उनके मित्र और बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने नोटबंदी के फैसले का समर्थन कर दिया। जहां तक अरविन्द केजरीवाल का सवाल है तो उनक ी आये दिन कि बयानबाजी से लोगों के कान पक से गए हैं। केन्द्र सरकार के लगभग हर फैसले का विरोध और हर दूसरे दिन मोदी को कोसने के कारण केजरीवाल को गम्भीरता से लिया जाना कम होता जा रहा है। नोटबंदी के विरूद्ध कांगे्रस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का पॉश्चर प्रभावहीन माना जा रहा है। पैसे निकालने के लिए राहुल का एटीएम के सामने लाइन में लगना सियासी नाटक ही माना गया। मोदी की इस टिप्पणी को लोगों ने चटकारे लेकर पढ़ा और सुना कि जिन पर घोटालों के गम्भीर आरोप लग चुके हैं वह आज 4000 रुपए निकालने के लिए एटीएम के बाहर लाइन में लगे हैं।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने नोटबंदी को विरोध करने वालों को आड़े हाथों लेते हुए सवाल उठाया है कि कालेधन के खिलाफ सरकार के इस फैसले से इन विपक्षी नेताओं को क्या समस्या है? आखिर यही विपक्ष कालेधन के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग करता रहा है। जेटली भी कमोवेश ऐसी ही टिप्पणी कर चुके हैं। जेटली ने जानना चाहा कि गरीबों, किसानों, मजदूरों और महिलाओं को समस्या के नाम पर विरोध कर कुछ राजनीतिक दल अपने किस-किस प्रकार के हित साधने की कोशिश कर रहे हैं। भारत में कालेधन और नकली मुद्रा ने हमारी अर्थ व्यवस्था के लिए गम्भीर खतरा खड़ा करना शुरू कर दिया था। इस धन का उपयोग आतंकवाद, मादक पदार्थों का गैरकानूरी व्यापार में भी हो रहा था। सरकार के फैसले से दो फायदे होने कि आशा की जा रही है। एक- नकली मुद्रा के फैलाव पर प्रभावी रोक लग सकेगी। दो- अर्थ व्यवस्था मजबूत होगी। रियल एस्टेट सहित कई अन्य क्षेत्रों में दाम गिरने की आशा व्यक्त की जा रही है। इससे देश में कैशलेस व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाने के लिए माहोैल बनेगा। उल्लेखनीय है कि आम आदमी तमाम परेशानियों के बाद भी यह स्वीकार कर रहा है कि नोटबंदी के अच्छे नतीजे आएंगे।
नोटबंदी लागू होने के बाद आशंका से भरा जो माहौल देश के विभिन्न भागों में दिखाई दिया उसके लिए सरकार को कुछ हद तक ही दोष दिया जा सकता है। इसके लिए विपक्षी नेताओं की बयानबाजी और कतिपय मीडिया समूहों द्वारा किया गया कवरेज भी जिम्मेदार है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारिता के दायित्वों के नाम फैसले का विरोध जैसा लक्ष्य साध कर कतिपय टीवी चैनलों ने कवरेज किए। ऐसे टीवी कवरेज देख कर अति साधारण समझ रखने वाला तक समझ रहा था कि इरादा सरकार की बखिया उधेडऩे का चल रहा है। सबसे तेज होने का दावा करने वाला एक टीवी चैनल तो मोदी के राष्ट्र के नाम प्रसारण के खत्म होने के आधा घण्टा बाद ही नोटबंदी फैसले के विरूद्ध टीका-टिप्पणी करने लगा था। चर्चा शुरू कर दी गई थी। चर्चा में भाग लेने वाले एक अतिथि ने नोटबंदी का स्वागत करते हुए प्रधानमंत्री की प्रशंसा करनी चाही तो उन्हें यह कह कर रोक दिया गया कि हमारी चर्चा का विषय किसी की स्तुति नहीं है। दूसरी ओर इलेक्ट्रानिक मीडिया में एक अन्य वर्ग था जो नोटबंदी से आमजन को हो रही परेशानी सामने लाने के साथ-साथ इस फैसले के फायदे बताते जा रहा था।
बहरहाल, मोदी के ताजा भाषण से अनिश्चितता और भ्रम का माहौल अवश्य सुधरेगा। मोदी ने जिस तरह के आक्रामक तेवर दिखाए और देशवासियों से सहयोग के लिए भावुक अपील की है उसका असर दिखना ही चाहिए। उन्होंने कालेधन वालों और भ्रष्ट तत्वों के विरूद्ध अपनी अन्य परियोजनाओं की बात कर अवश्य ही कई लोगों की नींद उड़ा दी होगी। प्रधानमंत्री ने यह तक कहा है कि पिछले 70 सालों से देश को लूटने वालों का काला चिट्ठा भी वह खोल सकते हैं इस काम के लिए अगर एक लाख लोगों को नौकरी देनी पड़ी तो वह ऐसा करने से झिझकेंगे नहीं। एक बात तो तय है कि मोदी सरकार ने कई लोगों का चैन छीन लिया है।
Thursday, November 10, 2016
बड़े और कड़े फैसले अचानक ही लिए जाते हैं
(अनिल बिहारी श्रीवास्तव)
500 और 1000 के नोट अचानक बंद किए जाने की घोषणा के साथ ही प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया था। जो लोग अर्थ शास्त्र पर अधिकार रखते हैं और जिन्हें काले धन के खतरों की समझ है वे तो बोल ही रहे थे लेकिन इसके साथ उन लोगों ने भी प्रतिक्रिया व्यक्त की जिन्हें अर्थतंत्र की विशेष समझ नहीं है, जिन्होंने काले धन के बारे में सिर्फ सुना है और उसके दुष्प्रभाव को कभी प्रत्यक्ष तौर महसूस नहीं किया। प्रधानमंत्री के कदम का मोटे तौर पर स्वागत ही किया गया है। राजनीतिक कारणों से कुछ दलों और नेताओं ने दबी जुबान से समर्थन किया तो किसी ने स्वागत के साथ फैसले से जुड़ी खामियों गिना दीं। यहां दो प्रतिक्रियाओं का उल्लेख करना जरूरी लग रहा है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उन्हें आम आदमी की परवाह नहीं है। इस तरह फैसला लिए जाने से किसानों, छोटे दुकानदारों और गृहणियों के लिए अत्यंत अस्त-व्यस्त करने वाली स्थिति पैदा हो गई है। असली अपराधी रियल एस्टेट या विदेशों में छुपाकर रखे गए अपने कालेधन से चिपककर बैठे हैं। बहुत बढिय़ा श्रीमान मोदी!
गौरतलब है कि राहुल की प्रतिक्रिया से पहले कांगे्रस के कुछ बड़े नेता संतुलित अंदाज में मोदी के फैसले का स्वागत कर चुके थे। बहरहाल, दूसरी प्रतिक्रिया का उल्लेख करना जरूरी है। यह एक नितांत अल्प शिक्षित कड़ी मेहनत कर अपने परिवार को चलाने वाली महिला लक्ष्मी(परिवर्तित नाम) की है। यह महिला घरों में खाना बनाने का काम करती है। सुबह सात बजे से रात नौ बजे तक उसे खटते देखा जा सकता है। 9 नवम्बर की सुबह कहती सुनी गई- मोदी(जी) ने बढिय़ा काम किया है। उन्होंने काली कमाई वालों को जोरदार तमाचा मारा है। प्रधानमंत्री के फैसले के चलते लक्ष्मी को हुई चिन्ता सिर्फ इस बात की है कि उसकी झुग्गी में रखे पांच-पांच सौ के दो नोटों को बदलने बैंक तक जाना पड़ेगा परन्तु वह खुश है।
दोनों ही प्रतिक्रियाओं में कितना अंतर है। दोनों व्यक्तियों की शिक्षा, स्तर और बौद्धिक समझ में जमीन-आसमान सा अंतर है। एक को प्रधानमंत्री के फैसले पर कथित शंकाएं हैं और दूसरे को प्रधानमंत्री पर भरोसा है। दरअसल, राहुल गांधी की प्रतिक्रिया में मैदानी वास्तविकताओं का अभाव दिखाई देता है। उसके पीछे कारण राजनीतिक हो सकता है। इस तरह के गम्भीर और चिंतन योग्य विषय पर कुछ भी कहने के पहले हवा का रुख देखना उचित होता है। कांगे्रस उपाध्यक्ष दीवार पर लिखी इबारत तक ठीक से क्यों नहीं पढ़ पा रहे हैं। अधिकांश उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों, व्यावसायियों, राजनीतिक दलों तथा राजनेताओं और आम लोगों ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है। उधर, मोदी के आलोचकों की प्रतिक्रियाएं देखने पर तर्क की बजाय उनकी खीझ अधिक सामने आती है। यह खीझ सिर्फ राजनीति से जुड़े लोगों तक सीमित नहीं थी। इसकी झलक मीडिया के एक वर्ग में तक में देखी गई जो मोदी का राष्ट्र के नाम सम्बोधन खत्म होते ही नाक-भौंह सिकोडऩे लगा था। फैलाए गए भ्रम का प्रभाव था कि पेट्रोल पम्पों और एटीएम में लोगो की ऐसी लाइनें लगीं कि दूसरे दिन शाम तक कम नहीं हो सकीं।
वित्तमंत्री अरूण जेटली की इस बात से कौन सहमत नहीं होगा कि सरकार के इस फैसले से कालेधन के कारोबारियों पर प्रभावी लगाम कस सकेगी। इससे आतंकवाद, मादक पदार्थों के कारोबार, कालाधन और भ्रष्टाचार में लिप्त तत्वों पर सीधी चोट पड़ी है। साथ ही दो नंबर में धन के लेने-देने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगने के साथ बैंकिं ग क्षमता में वृद्धि होगी। कुछ लोगों को शिकायत है कि सरकार ने 500 और 1000 के नोट बंद करने से पहले पर्याप्त समय नहीं दिया। वे आम आदमी की कथित मुश्किलों को गिना, ट्वीट कर और कुछ टीवी चैनलों पर नकारात्मक बहसों में भागीदारी कर माहौल बिगाडऩे की कोशिश करते दिखाई दिए। यह कारस्तानी कल रात से ही शुरू कर दी गई थी। क्या ऐसी हरकतों से सरकार के फैसले पर कोई फर्क पडऩे वाला है? मोदी सरकार ने गोपनीयता के साथ पूरी तैयारी कर रखी थी। ताजा खबर यह है कि बैंकों ने नई करंसी और छोटे नोट पहुंचाए जा चुके हैं। एकाध दिन में सब कुछ सामान्य हो जाएगा। अर्थ व्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव डालने वाले इस फैसले की सफलता की पूरी आशा है। आखिर ऐसे कड़े फै सले इसी तरह अचानक लिए जाते हैं। ढिंढोरा पीट कर काम किया जाता तब काला धन रखने वालों को बच निकलने का मौका नहीं मिल जाता?
Friday, September 30, 2016
Pakistan Hamara Dushman
खुल कर बोलें, पाकिस्तान हमारा दुश्मन है
(अनिल बिहारी श्रीवास्तव)
70 साल होने को आए हैं हम यह बात खुल कर क्यों नहीं स्वीकार कर लेते कि पाकिस्तान हमारा दुश्मन है। इन सात दशकों के दौरान भारत ने 70 बार से अधिक कोशिश की होगी कि पाकिस्तान के साथ संबंध सामान्य हो जाएं लेकिन हमारा यह बेशर्म, अडिय़ल, छिछोरा और असभ्य पड़ौसी अपनी फितरत से बाज नहीं आ रहा। उसका व्यवहार हमारे प्रति दुश्मन जैसा रहा है। दूसरी ओर हमारे यहां शुतुरमुर्ग प्रवृति के लोग हमेशा सच से मुंह छिपाते रहे। वे कभी हमारी संस्कृति, संस्कार और खान-पान का नाम लेकर या फिर पुरानी बातों का हवाला देकर दोनों देशों के बीच अच्छे रिश्तों की वकालत करते रहे हैं। ऐसे लोगों से सिर्फ यह कहना है, कभी पाकिस्तानी फोैजियों, पूर्व फौजियों, सरकार चलाने वालों, राजनेताओं से लेकर आम लोगों तक उन बयानों, टिप्पणियों और प्रतिक्रियाओं पर नजर डालिए। पाकिस्तानियों की हर बात, हर शब्द में भारत और भारतीयों के प्रति ईष्र्या, कुढऩ और अपमानजनक भाव साफ दिखाई देता है। अफसोस होता है कि आज तक हम पाकिस्तानियों के दिमाग में भरी गंदगी को नहीं देख सके। कश्मीर घाटी में आतंकवादी बुरहान वानी को सुरक्षा बलों द्वारा मार गिराये जाने के बाद पाकिस्तानियों का भौंड़ा विलाप कई देशों के लिए हैरान कर देने वाली बात रही। उरी में सेना की 12 ब्रिगेड हेड क्वार्टर पर आतंकवादी हमले से साबित हुआ है कि हमारा पड़ौसी एक आतंकवादी और नाकाम मुल्क है। वह कभी नहीं बदलेगा और न सुधरेगा। हमारी प्रगति, कामयाबी और ताकत से पाकिस्तानियों को ईष्र्या होती हेै। इन सच्चाइयों को जानते और समझते हुए भी हम सीना ठोंक क्यों नहीं कहते कि हां हम सभी भारतीय नागरिक पाकिस्तान को अपना शत्रु मानते हैं।
रविवार, 18 सितम्बर 2016 को उरी में हुए आतंकवादी हमले ने 26/11 के मुम्बई हमले और इसी साल पठानकोट में वायुसेना अड्डे पर हुए हमलों की याद ताजा कर दी। उरी हमले को लेकर समूचे भारत में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। लोग चाहते हैं कि हमला करने और करवाने वालों के विरूद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। मोदी सरकार ने कहा है कि पाकिस्तान के विरूद्ध चौतरफा कार्रवाई होगी। सरकार के आश्वासन पर भरोसा कर लोग शांत भाव से कार्रवाई का इंतजार कर रहेे हैं। इस बीच पाकिस्तान द्वारा भारत के विरूद्ध परमाणु हमले की घमकी भी दी गई। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल धमकी मात्र है। पाकिस्तान जानता है कि ऐसा दुस्साहस उसके अस्तित्व को संकट में डाल देगा। शायद दुनिया के नक् शे से पाकिस्तान का नाम ही मिट जाए। फिर भी भारत को सतर्क रहना होगा क्योंकि एक असभ्य और गंवार पड़ौसी को समझना काफी कठिन होता है।
मुंबई में आतंकी हमला हिला देने वाला था। केन्द्र की तत्कालीन संप्रग सरकार पर समूचे देश से भारी दबाव था। सरकार ने कुछ कदम उठाये थे। लेकिन अंदर-बाहर के दबावों के कारण पुन: संबंध बहाल कर लिए गए। मुंबई हमले के दोषी आज भी पाकिस्तान में छुट्टे सांडों के भांति घूमते हैं। भारत में लोगों ने मान लिया होगा कि उस तरह का हमला अब पाकिस्तान की ओर से नहीं होगा। यह गलतफहमी जल्द दूर हो गई। इसी साल की शुरूआत में पठानकोट में एयरफोर्स अड्डे पर आतंकी हमला किया गया। अब उरी में ब्रिगेड हेडक्वार्टर को निशाना बनाया गया। इस बात पर कौन भरोसा करेगा कि पाकिस्तान सरकार, सेना अथवा आईएसआई को इन हमलों की जानकारी नहीं रही होगी। पाकिस्तान सरकार और सेना के इशारे पर ही ये हमले किए गए हैं। इसे पाकिस्तानियेां की नपुंसकता कहना ही सही होगा। सैन्य हमला कर भारत के साथ युद्ध करने के बजाय वे आतंकवादियों का भारत के विरूद्ध उपयोग करते हैं। हमारे नागरिक और जवान उनके षडयंत्रों का शिकार होते आ रहे हैं। भारत मेें उठ रही यह मांग उचित है कि पाकिस्तान के साथ हर तरह के संबंध खत्म कर देने चाहिए। उसकी विध्वंसकारी हरकतों का जवाब जैसे को तैसा की नीति से देना चाहिए।
उरी हमले के बाद लोगों में भारी आक्रोश है। कई तरह की बातें सुनने में आईं। मसलन, पाकिस्तान के विरूद्ध सीधी फौजी कार्रवाई हो, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में स्थित आतंकवादी शिविरों पर हमला किया जाए, पाकिस्तान के साथ 1960 में पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा किया गया नदी जल समझौता रद्द कर दें, पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करवाने के लिए समूचे विश्व में अभियान चलाया जाए क्योंकि अधिकांश देश आतंकवाद से त्रस्त हैं और पाकिस्तान को दुनिया भर में आतंकवाद का सप्लायर माना जाने लगा है और पाकिस्तान को आर्थिक रूप से कमजोर कर देने के लिए हर संभव कदम उठाए जाने जरूरी है। उरी हमले के तुरंत बाद भारत के पक्ष में यह बात हुई है कि अमेरिकी कांग्रेस में एक विधेयक पेश किया गया जिसमें मांग की गई है कि पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित किया जाए। यदि यह विघेयक पारित हो जाता है तब पाकिस्तान की हालत पतली होते देर नहीं लगेगी। वैसे इस तथ्य को अवश्य ध्यान में रखा होगा कि लगभग सवा दो दशक पूर्व भी अमेरिका में पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने की मांग उठी थी। तत्कालीन अमेंरिकी प्रशासन इस पर सहमत नहीं था लेकिन आज हालात भिन्न हैं। अत: भारत को प्रयास करते रहना होगा।
दुनिया मान चुकी है कि पाकिस्तान एक नाकाम देश है। धर्म के आधार पर पाकिस्तान की स्थापना हुई थी। धार्मिक कट्टरपन और अन्य समुदायों के प्रति नफरत के बीज पाकिस्तान के जन्म के समय ही पड़ गए थे। वहां पिछले सात दशकों के दौरान बच्चों के मस्तिष्क में दूसरों विशेषकर भारत के प्रति नफरत और घृणा को जहर भरा जाता रहा। पाकिस्तान के शासकों ने अपनी नाकामियों को छिपाने और राजनेताओं ने अपनी रोटियां सेंकने के लिए कट्टरपन को बढ़ावा दिया। लोगों में भारत के प्रति ईष्र्यां भडक़ाई गई। यह जानते हुए भी कि कश्मीर पर उनके दावे का कोई वैधानिक आधार नहीं है पाकिस्तानी शासक अपने यहां लोगों को कश्मीर के सपने दिखाते रहे। पाकिस्तानी राजनेता, शासक और सेना भी जानती है कि कश्मीर के एक हिस्से पर उन्होंने अवैध कब्जा कर रखा है। वे यह भली-भांति समझते हैं कि कश्मीर को पाकिस्तान कभी भी भारत से नहीं छुड़ा पाएगा। इसके बावजूद कश्मीर की आड़ में भारत में उनकी तमाम खुरापात की एक अलग वजह समझ में आ रही है। दरअसल भारत में आजादी के बाद हुए विकास, मजबूत हुई अर्थ व्यवस्था से सारे के सारे पाकिस्तानी कुढ़ते हैं। हमारी ओर से चूक यह होती रही कि हम छह-साढ़े छह दशकों के दौरान यह उम्मीद लगाए रहे कि एक न एक दिन इस दुष्ट पड़ौसी का दिल अवश्य बदलेगा। इस अटल सत्य की अनदेखी कैसे हो गई कि कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं हो सकती। भारत बार-बार पाकिस्तान के साथ संबंध सामान्य बनाने की कोशिशें करता रहा। इसके पीछे कभी बाहरी दबाव था तो कभी परिस्थितियों के चलते ऐसा किया जाता रहा। हमारे यहां कुछ दिग्भ्रमित विद्वानों ने भी कई बार सत्ताधीशों को बरगला कर पाकिस्तान के साथ संबंध बहाल कराने का प्रयास किया। पाकिस्तान के रोम-रोम में खुरापात, नफरत और जलन है। इसे हमारी तकदीर ही कहें कि दुनिया के अधिकांश देश पाकिस्तान को अच्छी तरह पहचान गए हैं। इसलिए जब वह भारत के विरूद्ध कु छ बोलता है तो इसे आमतोैर पर बकवास माना जाता है। आज अमेरिका,ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन सहित दर्जनों देश आतंकवाद से जूझ रहे हैं। वे जानते हैं भारत भी उनकी तरह आतंकवाद से ग्रस्त हेै।
पाकिस्तान के कुकर्म पूरी तरह सामने आने के बाद जो सवाल उठे हैं उनमें एक बड़ा सवाल यह है कि भारत को अपनी सुरक्षा के लिए क्या करना चाहिए? भारत के लोगों और सुरक्षा बलों के जवानों को आतंकवादियों किए जाने वाले कायराना हमलों से कैसे बचाया जाए? अब तक सामने आती रही अपनी इस कमजोरी को स्वीकार करना होगा कि अब तक के आतंकी हमलों के बाद हमारे यहां सरकार से लेकर आम आदमी तक गुस्सा तो काफी उमड़ता रहा परन्तु वह ठण्डा भी जल्द होता रहा। इसी बात ने पाकिस्तान और उसके द्वारा भेजे जाने वाले आतंकवादियों के हौसलों को बढ़ा दिया। वे बार-बार दुस्साहस करते चले गए। चंूकि पाकिस्तान ने कारगिल के बाद से कोई प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई नहीं की है अत: उस पर सीधे फौजी हमला बोलने पर जोर नही दिया जाता रहा परन्तु और भी कई ऐसे रास्ते हैं जिनसे उसके कान मरोड़े जा सकते हैं। 1947,1965 और 1971 के युद्धों से पाकिस्तान ने सबक लिया है कि वह भारत के साथ सीधी फौजी कार्रवाई में उलझ कर घाटे रहा है। इसी लिए उसने आतंकवाद का भारत के विरूद्ध उपयोग करना शुरू कर दिया। यह काम वह 1965 से करता आ रहा है।
उरी हमले के बाद विशेषज्ञ मानने लगे हैं कि पाकिस्तान के विरूद्ध पूरे धैर्यपूर्वक लगातार और लम्बी कार्रवाई करनी होगी। उससे अनेंक मोर्चों पर लडऩा होगा। पाकिस्तान पर राजनीतिक और कूटनीतिक प्रहार किए जाएं और यहां सेना और सुरक्षा बलों को आतंकवादियों का मुंह तोडऩे के लिए खुली छूट दी जानी चाहिए। इन सबके साथ उसके आर्थिक चोट पहुंचाने का कोई अवसर नहीं छोडऩा होगा। इन विकल्पों को अपनाते हुए दया, उदारता और संस्कार जैसी बातों ताले में बंद रखना होगा। साफ बात यह है कि जब वो हमें दुश्मन मानते हैं तो हम उन्हें अपना दुश्मन क्यों नहीं मानें?
कहां होती रही चूक
कश्मीर घाटी के पृथकतावादी तत्व हों या वहां सक्रिय आतंकवादियों की बात करें अथवा उत्तर-पूर्व के उग्रवादियों को लें इन सब के मामले कोई पक्की रणनीति का अभाव साफ महसूस होता रहा है। यही बात कुछ राज्यों में मौजूद नक्सलवादियों के संदर्भ में की जा सकती है। इन्हें पनपने और फैलने से पहले ही कुचलने की जरूरत रही है। किसी बड़ी वारदात के बातें तो खूब की जातीं रहीं लेकिन विध्वंसकारी तत्वों को सख्ती से कुचलने के ठोस उपाय नहीं हो पाए। कभी राजनीति आड़े आ गई और कभी अनावश्यक उदारता। उग्रवादी, आतंकवादी, पृथकतावादी और विध्वंसकारी गतिविधियों में लिप्त लोगों को देश का दुश्मन मानने में संकोच क्यों होता रहा। ऐसे तत्वों को बेरहमी से कुचलने की छूट सुरक्षा बलों को दिए बगैर आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकती। इस तरह के मामलों में अमेरिका, इजरायल और रूस से कुछ सीखने की जरूरत है। अपने शत्रुओं पर कार्रवाई में ये तीनों राष्ट्र जरा भी विलम्ब नहीं करते। रूस ने चेचेन पृथकतावादियों और आतंकवादियों को पूरी दृढ़ता के साथ कुचला। राष्ट्र और अपने लोगों की सुरक्षा के मामले में उसने कभी समझौता नहीं किया। स्वयंभू मानव अधिकारवादियों के विलाप की ओर ध्यान नहीं दिया। उधर, वल्र्ड टे्रेड सेंटर पर हमले के बाद कया कोई आतंकवादी संगठन अमेरिका में दुस्साहस कर पाया? 9/11 के उस हमले के बाद अमेरिका ने डेढ़ माह के अंदर पैट्रियाट एक्ट बनाया। सुरक्षा एजेंसियों को छानबीन की आजादी मिली। एफबीआई को और अधिक शक्ति शाली बनाया गया। आतंकी मामलों में अदालती आदेश की जरूरत समाप्त कर दी गई। हमारे सुरक्षाबल, पुलिस और गुप्तचर एक तरह से दांत के शेर की तरह बना दिए गए हैं। वो आतंकवादियों से कैसे जूझें। टाडा और पोटा के विरूद्ध बोटों के सौदागरों ने राजनीति शुरू कर इन कानूरों का मकसद ही पूरा नहीं होने दिया।
आतंक से निबटने की चुनौतियां
अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, कनाडा और फ्रांस जैसे देशेंा में आतंकवाद से निबटने के लिए गुप्तचर और सुरक्षा एजेंसियों को खुली छूट है। भारत में ऐसा नहीं है। यहां भ्रष्टाचार, राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, घुसपैठ, छद्म धर्म निरपेक्षता, तुष्टिकरण, वोट बैेंक की राजनीति, हमारी उदार राष्ट्र के रूप में छवि और लोगों की मानसिकता ने समस्या खड़ी कर रखी है। दिल्ली के बटाला हाउस एन्काउंटर को याद करें। एक जांबाज पुलिस अधिकारी शहीद हो गया था। लेकिन कांगे्रस नेता दिग्विजय सिंह ने उस मुठभेड़ को फर्जी बता कर न केवल पुलिस अधिकारी की शहादत का अपमान किया बल्कि आतंकवादियों से आए दिन जूझने वाले सुरक्षा बलों के जवानों के मनोबल को प्रभावित किया होगा।
जीरो टॉलरेन्स
आतंकवाद और अन्य विध्वंसकारी गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश के लिए जीरो टॉलरेन्स की नीति जरूरी हो गई है। आतंकवादियों और उग्रवादियों से अपने तरीक से निबटने की छूट सुरक्षा बलों को मिलनी चाहिए। ऐसी ही व्यवस्था रूस में बताई जाती है। वहां चेचेन उग्रवादियों को जीरो टॉलरेन्स की नीति से कुचला जा सका। जिस व्यक्ति से राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा महसूस हो या जिसके हाथों निर्दोष लोगों के मारे जाने की आश्ंाका हो उसे किसी भी कारण से कैसे छोड़ा जा सकता है। भारत में आतंकवाद और उग्रवाद से लड़ रहे सुरक्षा कर्मियों को कानूनी संरक्षण पर विशेष जोर देना होगा।
Thursday, October 11, 2012
पंजाब में शांति के विरूद्ध साजिश तो नहीं?
बुधवार को अकाल तख्त में पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल अरूण श्रीधर वैद्य के हत्यारों का सम्मान करके किस तरह का संदेश देने की कोशिश की गई है? जनरल वैद्य के हत्यारों, हरजिन्दर सिंह जिन्दा और सुखदेव सुक्खा का सम्मान किए जाने की घटना वाकई चिन्ता का विषय है। दरबार साहिब के मैनेजर ने जिन्दा और सुक्खा की बरसी पर आयोजित अखण्ड पाठ के समापन के पश्चात उनके परिजन का सम्मान किया। जिन्दा के भाई भूपिन्दर सिंह और सुक्खा की मां सुरजीत कौर को सिरोपा भेंट किए गए। खास बात यह है कि इस अवसर पर शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी के सचिव दलमेघ सिंह, दल खालसा के प्रवक्ता कंवरपाल सिंह और दमदमी टकसाल के प्रवक्ता भाई मोखम सिंह मौजूद थे। 10 अगस्त 1986 को जनरल वैद्य की हत्या के लिए दोषी पाए गए जिन्दा और सुक्खा को 9 अक्टूबर 1992 को फांसी दे दी गई थी। जिन्दा और सुक्खा की बीसवीं बरसी पर उनका सम्मान किए जाने की इस घटना को शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी के उस फैसले से जोड़ कर देखने की जरूरत महसूस होने लगी है जिसमें आपरेशन ब्लू स्टार के दौरान मारे गए लोगों की याद में स्मारक बनाने का प्रस्ताव है। इन घटनाओं पर पंजाब में सत्ताधारी शिरोमणि अकाली दल -बादल की चुप्पी आश्चर्य का विषय है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने अवश्य चिन्ता व्यक्त की है। इस आशंका को निराधार नहीं कहा जा सकता कि पंजाब में कुछ कट्टरपंथी ताकतें पुराने जख्मों को कुरेदने की कोशिश कर रहीं हैं। उनकी बढ़ती सक्रियता राज्य के अल्पसंख्यकों में भय पैदा कर सकती है।
पिछले दिनों रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल के एस बरार ने यह आरोप लगाया था कि पंजाब में अकाली दल की सरकार के कार्यकाल में कट्टरपंथी और पृथकतावादी शक्तियां पुन: सक्रिय होने लगीं हैं। उन्होंने यह टिप्पणी लंदन में स्वयं पर हुए आतंकवादी हमले के बाद की थी। जनरल बरार ने आपरेशन ब्लू स्टार में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। 77 वर्षीय इस फौजी ने जोर देकर कहा है कि ब्लू स्टार में मारे गए लोग आतंकवादी थे, उन्हें शहीद नहीं माना जा सकता। दरअसल, जनरल बरार पर लंदन में किया गया हमला इस बात का प्रमाण हैं कि भारत हो या विकसित देश दोनों ही जगह मौजूद आतंकवादी और उनके हमदर्द पूरी तरह ठण्डे नहीं पड़े हैं। वे पंजाब को उसी बुरे दौर में पुन: धकेलने की कोशिश कर रहे हैं । संभवत: कांग्रेस और भाजपा भी इसी बात को महसूस करने लगीं हैं। आतंकवाद के उस काले दौर में पंजाब में मारे गए लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे लिए जाते हैं। एक जानकारी के अनुसार 1981 से लेकर 1993 के बीच आतेकवादी हिंसा में 11694 लोग मारे गए थे। यह तथ्य हैं कि सिख धर्म की रक्षा और सिखों के साथ हुए कथित अन्याय के विरोध के नाम पर किए गए खून-खराबे में मारे गए इन लोगों में 7139 सिख थे। जाहिर है कि पंजाब में आतंकवाद के उस दौर में आतंकवादियों ने सिखों को ही अधिक नुकसान पहुंचाया था।
लोगों का याद होगा कि उस बुरे दौर में आतंकवादी समूचे पंथ की ओर से बोलने का दावा करते थे। जिन सिखों ने आतंकवाद का विरोध किया या आतंकवादियों द्वारा पंथ के नाम पर बोलने के अधिकार पर सवाल उठाया, उन्हें आतंकवादियों ने अपना दुश्मन मान लिया था। पंजाब लगभग दो दशक से शांत है लेकिन लग रहा है कि पृथकतावादी और कट्टरपंथी ताकतें अंदर ही अंदर अपना काम कर रहीं हैं। उस दूसरी और तीसरी पीढी़ को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है जो मैदानी सच्चाई को नहीं जानती है। ब्रिटेन, कनाडा और जर्मनी से फेसबुक में पेज लोड किए जा रहे हैं। विदेशों से संचालित वेबसाट्स में खालिस्तानी सामग्री, मैप और गाने भरे हैं। एक वेब साइट उन सिखों के समर्थन के नाम पर चंदा उगाहती है जो आतंकवाद संबंधी आरोपों के कारण भारतीय जेलों में हैं। कुल मिलाकर स्थिति को सामान्य नहीं माना जा सकता है। पूरी तरह नजर रखने और सतर्कता बरतने की जरूरत हैं। जनरल बरार ने जो आशंका व्यक्त की है उसे जिन्दा और सुक्खा का सम्मान किए जाने की घटना से बल मिला है। सवाल यह है कि पंजाब की बादल सरकार इस गंभीर विषय पर स्वयं कितनी गंभीर है।
-----अनिल बिहारी श्रीवास्तव
Tuesday, October 9, 2012
मान का सम्मान नहीं करने वालों को मानद रैंक क्यों?
खिलाडिय़ों और ग्लैमर वल्र्ड से जुड़े लोगों को मानद रैंक देने से कम से कम वायु सेना ने तौबा कर ली है। यदि वायुसेना के एक शीर्ष अधिकारी के हवाले से आई खबर पर विश्वास करें तब साफ हो जाएगा कि ऐसी हस्तियों को मानद रैंक देने का कोई मतलब नहीं होता जो इसका महत्व नहीं जानतीं तथा उनका सम्मान करने से सेना को कोई लाभ तक नहीं मिलता। मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को वायुसेना ने लगभग दो वर्ष पहले ग्रुप कैप्टेन का मानद रैंक प्रदान किया था। इसी तरह क्रिकेट कप्तान महेंद्रसिंह धोनी को लेफ्टिनेंट कर्नल का मानद रैंक दिया गया था। सेना के सूत्रों के अनुसार दोनों ने मानद रैंक प्राप्त करने के बाद एक बार भी पलटकर नहीं झांका। पिछले दो वर्षों के दौरान उनके इस उदासीन व्यवहार से ऐसा प्रतीत हुआ मानों सेना द्वारा प्रदत्त मानद रैंक स्वीकार करके उन्होंने सेना पर ही अहसान किया हो। उल्लेखनीय है कि खिलाडिय़ों और ग्लैमर वल्र्ड के लोगों को सेना मानद रैंक से सम्मानित करती रही है। पूर्व क्रिकेट कप्तान कपिल देव को सन 2008 में टेरिटोरियल आर्मी में लेफ्टिनेंट कर्नल के रैंक से सम्मानित किया जा चुका है। टेरिटोरियल आर्मी के विज्ञापनों और होर्डिंग्स में कपिलदेव की तस्वीर छपती रही है। टेरिटोरियल आर्मी के कार्यक्रमों में कपिलदेव शामिल होते रहे हैं। दक्षिण भारत के फिल्मी सुपर स्टार मोहनलाल और शूटर अभिनव बिन्द्रा को भी सेना ने मानद रैंक प्रदान किए हैं। सेना द्वारा मानद रैंक से सम्मानित हस्तियों में और भी नाम हैं। ऐसे लोगों को मानद रैंक देने के पीछे मकसद युवाओं को सेना की ओर आकर्षित करना रहता है। वे युवा पीढ़ी के लिए पे्ररणा के स्रोत की तरह होते हैं। सेना के इस प्रयोग की सफलता के आंकड़े जुटाना लगभग असंभव काम होगा। यह जानकारी भला कैसे एकत्र की जा सकती है कि सेना में शामिल युवकों में से कितनों ने इन हस्तियों से प्रेरणा ली थी। वायुसेना के उस अधिकारी ने जिस अंदाज में धोनी और तेंदुलकर के उदासीन रवैये के प्रति अप्रसन्नता व्यक्त की है उसके बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सम्मान किस का होना चाहिए? सीधी सी बात है जो सम्मान का मान रखे उसी का सम्मान किया जाए।
धोनी और तेंदुलकर ने पूरी ठसक के साथ क्रमश: थल सेना और वायुसेना की वर्दी पहन कर रैंक प्राप्त किए थे। उस कार्यक्रम की तस्वीरें आज भी लोगों का याद होंगी। आज वायुसेना के अधिकारी बता रहे कि रैंक लेने के बाद से धेानी और तेंदुलकर ने पलट कर नहीं देखा। खिलाडिय़ों का ऐसा रवैया वाकई निराशाजनक और खीझ पैदा करने वाला है। सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल और ग्रुप कैप्टेन के पदों का अपना खासा महत्व है। इनकी अपनी गरिमा है। सेना के किसी भी अंग के लोग ही बता सकते हैं कि संबंधित ओहदा पाने के लिए उन्होंने कितना परिश्रम और त्याग किया है। आप कितने भी बड़े तीस मार खां हो सकते है लेकिन अनुशासित बलों का हिस्सा बनना आसान नही होगा। अनुशासित बलों में शामिल होने के लिए एक कड़ी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। वहां कड़े अनुशासन का पालन करना होता है। धोनी और तेंदुलकर की अपनीं व्यस्तताएं होंगी। खेल और विज्ञापनों से कमाई की जुगत में लगीं इन दोनों क्रिकेट हस्तियों के पास समय कहां है जो वे कुछ और सोचें। हां, उनसे यह अवश्य पूछा जा सकता है कि जनाब,आपके पास समय नही था तो मानद रैंक प्रस्ताव को स्वीकार क्यों किया था? हमारे यहां कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने किसी मानद पद को स्वीकार तो कर लिया किन्तु उससे जुड़ी जिम्मेदारियों और दायित्वों के निर्वाह के प्रति वे गम्भीर नहीं दिखे। पिछले चार दशक के दौरान अनेक फिल्मी हस्तियों को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया जा चुका है। यह शोध का विषय हो सकता है कि इनमें से कितने लोगों ने राज्यसभा की कार्रवाई में भाग लेकर स्वयं को एक जिम्मेदार सदस्य या नागरिक साबित किया? गायिका लता मंगेशकर के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने राज्यसभा की किसी बैठक में हिस्सा नहीं लिया था। साफ बात है कि रूचि नहीं है तो इस तरह के प्रस्ताव स्वीकार ही नहीं करने चाहिए। भाजपा लहर में चुनाव जीत कर फिल्म अभिनेता धर्मेन्द्र भी लोकसभा में जा पहुंचे थे। फिल्मी पर्दे पर सैंकड़ों बार गरजते रहे धर्मेन्द्र की लोकसभा में आवाज सुनने के लिए लोग तरस गए। बहरहाल, यहां मुद्दा सेना के पदों की गरिमा बनाए रखने का है। तेंदुलकर और धोनी के उदाहरणों के चलते खिलाडिय़ों और ग्लैमर वल्र्ड के लोगों को मानद रैंक नहीं देने का फैसला सही है। वायुसेना अधिकारी की टिप्पणी पर धोनी और तेंदुलकर के पास सफाई में कहने के लिए कुछ है?
जीजाजी घोटाला: सच सामने आए
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा ने अरविन्द केजरीवाल और प्रशांत भूषण द्वारा लगाए गए आरोपों को खारिज तो किया है लेकिन आरोपों की न्यायिक जांच संबंधी मुद्दे पर उनका मौन आश्चर्यजनक है। वाड्रा का कहना है कि केजरीवाल और प्रशंात भूषण ने सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए गलत, अवमाननापूर्ण और आधारहीन आरोप लगा कर उनका और उनके परिवार का नाम बदनाम करने की कोशिश की है। एक दिन पूर्व ही वाड्रा ने कहा था कि सभी तरह की नकारात्मकता से निबट सकते हैं। इस बीच डी एल एफ ने भी केजरीवाल और भूषण के आरोपों को खारिज किया था। केजरीवाल और भूषण का कहना है कि डी एल एफ ने वाड्रा को सरकार से फायदों के एवज में बिना गारंटी के धन दिया था। डी एल एफ ने जोर दिया हेै कि उसका वाड्रा के साथ एक उद्यमी के रूप में पारदर्शी सौदा हुआ था। डी एल एफ के बयान और वाड्रा द्वारा किए गए पलटवार से केजरीवाल और भूषण का रत्तीभर प्रभावित नहीं दिखना तथ्यों को लेकर उनके आत्म विश्वास को दर्शा रहा है। केजरीवाल ने डी एल एफ के बयान को आधा सच निरूपित कर दिया है। उनका यह कहना गलत नहीं है कि वाड्रा को उठाए गए सवालों के जवाब देना चाहिए। इस बीच केजरीवाल और भूषण के लिए मनोबल बढ़ाने वाला घटनाक्रम यह हुआ कि वाड्रा पर लगाए गए आरोपों को भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के विरूद्ध एक मुद्दे के रूप में भुनाने की कोशिश शुरू कर दी । उधर, सामाजिक कार्यकर्ता ने तक केजरीवाल को समर्थन कर दिया है। अन्ना का कहना है कि वाड्रा पर लगाए गए आरोपों की न्यायिक जांच होनी चाहिए।
केजरीवाल और भूषण द्वारा वाड्रा की घेराबन्दी की कोशिश ने कांग्रेस के विरोधी दलों को एक बार फिर सक्रिय कर दिया है। यह मुद्दा आने वाले दिनों में कांग्रेस के बड़ा सिरदर्द साबित हो तो आश्चर्य नहीं होगा। कांग्रेस की अगुआई वाली संप्रग सरकार के लिए दूसरा कार्यकाल वैसे भी कांटों भरी राह पर चलने जैसा साबित होता रहा है। उस पर घोटालो और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं। इन में से किसी भी आरोप का जवाब दमदारी से देने में कांग्रेस और उसकी मनमोहन सरकार कहां कामयाब हो पाई? ईमानदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवि भ्रष्टाचारियों के बीच फंसे बेबस इंसान जैसी नजर आने लगी है। अबतक राजनीतिक विरोधी ही कांग्रेस और कांग्रेसियों की खिचाई करते रहे हैं परंतु वाड्रा पर केजरीवाल कंपनी का सीधा हमला 10 जनपथ भक्तों के होश उड़ा दिने के लिए पर्याप्त है। यही कारण है कि वाड्रा पर आरोप लगते ही एक वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री वाड्रा के बचाव की मुद्रा में आ गए। कांग्रेस के बड़बोले प्रवक्ता मनीष तिवारी ने भी केजरीवाल और भूषण के आरोपों को असत्य करार दिया है। सरकार और कांग्रेस दोनों ही वाड्रा की ओर से युद्ध के लिए तत्पर हैं? जबकि आरोप वाड्रा पर लगें है इसलिए उनका सामना करने की जिम्मेदारी भी वाड्रा पर है। वाड्रा सीना ठोंक कर क्यों नहीं कहते कि वह किसी भी प्रकार की जांच के लिए तैयार हैं। फिर उनके समक्ष कानूनी विकल्प भी है। अगर केजरीवाल के आरोप असत्य हैं तब वाड्रा उन पर मुकदमा ठोंकें । वाड्रा के बचाव में सरकार के लोगों के बयान और कांग्रेसियों की मोर्चाबंदी देशवासियों के मन उठ रहे सवालों का उत्तर नहीं दे पा रही है। इस बात में क्या गलत होगा यदि पिछले पांच वर्षों में राबर्ट वाड्रा द्वारा अर्जित सम्पत्ति की जांच की जाती है। वाड्रा की हैसियत आम आदमी जैसी नही है। वह सत्ताधारी पार्टी की अध्यक्ष के दामाद हैं। उनकी स्थिति नाजुक है। वाड्रा की किसी भी चूक या गलती के साबित होने की स्थिति में इसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ सकता है।
केजरीवाल और प्रशांत भूषण को कच्चा खिलाड़ी मानने की गलती भी नहीं की जानी चाहिए। नियम और कानूनों की उन्हें खासी जानकारी है। वाड्रा के विरूद्ध मोर्चा खोलने से पहले तथ्यों को लेकर वे अवश्य आश्वस्त हुए होंगे। केजरीवाल ने डी एल एफ के बयान को आधा सच बताया है, जाहिर है कि उनके पास कुछ और जानकारी है। कहते है,धुआं उठा हो तो आग अवश्य होगी। वाड्रा पर लगे आरोपों का जवाब सिर्फ तथ्यपूर्ण उत्तर से ही संभव है। लोगों के मन में वाड्रा को लेकर पैदा हुए संदेह का शीघ्र निवारण जरूरी है अन्यथा इसको विश्वास में बदलने में कितनी देर लगेगी?
Saturday, April 14, 2012
माओवादियों की चित और पटनाइक की पट
तेजी से मजबूत हो रहे इस विश्वास पर अब किसी भी पल १०० फीसदी पुष्टि की मुहर लग सकती है कि राष्ट्रीय राजनीति में दखल का सपना देखने वाले उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनाइक एक राज्य को चलाने की भी क्षमता एवं योग्यता नहीं रखते हैं। खासकर, कानून एवं व्यवस्था के संदर्भ में तो यही कहा जा सकता है । खबर है कि इतावली नागरिक बोसुस्को पाओलो और विधायक हिकाका की माओवादियों के चंगुल से मुक्ति के लिए नवीन पटनाइक घुटना टेकने और दण्डवत प्रणाम की मुद्रा में आने की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं। उनकी अगुआई वाली सरकार उन ३० लोगों को मुक्त करना चाहती है जिनकी सूची माओवादी अपहरणकर्ताओं ने दी है। नवीन पटनाइक सरकार की इस घुटना टेक राजनीति से उन पुलिस कर्मियों के मनोबल पर उन्हें प्रतिवूâल प्रभाव पड़ने की आशंका हो चली है जो सीमित साधनों और प्रतिवूâल परिस्थितियों के बीच माओवादियों से जूझ रहे हैं। नवीन पटनाइक सरकार की मंशा की भनक लगने पर वेंâद्रीय गृह मंत्रालय ने भी आगाह किया है कि इससे अपहरणकर्ताओं के हौसले बढ़ेंगे। इस बीच एक नई बात यह हुई कि उड़ीसा की एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने २००३ के एक गोलीबारी मामले की आरोपी सुभाश्री को सबूत के अभाव में बरी कर दिया। हालांकि यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि सुभाश्री के जेल से बाहर निकालने की राह के आसान होने में नवीन पटनाइक सरकार की कितनी भूमिका रही है। लेकिन उड़ीसा में सुभाश्री को लेकर जितने मुंह उतनी बातें सुनने में आ रही है। गौरतलब है कि माओवादी नेता सब्यसाची पांडा ने ही दो इतालवी नागरिकों और विधायक हिकाका के अपहरण में मुख्य भूमिका अदा की है। एक इतालवी नागरिक को पहले ही मुक्त किया जा चुका है। पाओलो और हिकाका की मुक्ति के लिए जिन ३० माओवादियों और उनके हमदर्दो की रिहाई की मांग की गई है उनमें सुभाश्री का भी नाम है। सुभाश्री सब्यसाची पांडा की पत्नी है। माओवादियों के सामने नवीन पटनाइक सरकार की घुटनाटेक मुद्रा पर उड़ीसा के पुलिस कर्मी हतप्रभ हैं। उड़ीसा पुलिस संघ ने कहा है कि सरकार का रवैया ऐसा ही चला तब माओवादी गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस कर्मी काम बंद कर सकते हैं। मुख्यमंत्री नवीन पटनाइक की अगुआई वाली सरकार का यह पैâसला उड़ीसा के साथ-साथ देश के लिए भी घातक हो सकता है। नक्सलियों की लगभग सभी मांगें स्वीकार कर ली गई हैं। उड़ीसा में नक्सल विरोधी अभियान रोक दिये गये हैं। बहरहाल, यह बात साफ हो गई है कि फरवरी २०११ में उड़ीसा के पिछड़े जिले मल्कानगिरी के कलेक्टर आर.विनीत कृष्णा तथा उनके साथ एक इंजीनियर पवित्र मोहन मांझी का माओवादी नक्सलियों द्वारा अपहरण किये जाने की घटना से नवीन पटनाइक और उनकी सरकार ने धेले भर सबक नहीं सीखा था। तब भी अपहरणकर्ताओं की सभी मांगें उड़ीसा सरकार ने स्वीकार कर ली थीं। फरवरी २०११ की वह घटना और अपहरण के ताजा मामले दोनों से ही भारतीय सत्ता का दब्बूपन और इच्छाशक्ति का अभाव उजागर हुआ है।
यह बात बार-बार सामने आती है कि नक्सलियों से निपटने और इस तरह की घटनाओं का सामना करने के लिए सरकार चलाने वालों के पास कोई ठोस और दूरगामी परिणामों वाली रणनीति नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे अधिकांश राजनेता सत्ता के मोह में नाना प्रकार के तिकड़मों और जोड़-तोड़ से ऊंचा मुकाम भले पा जाते हों लेकिन उनमें राजनीतिक कौशल तथा प्रशासनिक चतुराई का नितांत अभाव है। क्या कलेक्टर के अपहरण की घटना की गहराई से जांच कराने की जहमत नवीन पटनायक ने उठाई थी? उस घटना से जुड़ी चूक के लिए जिम्मेदार लोगों को दंडित किया गया था? अब बात इतावली नागरिक पाओलो की करें। वह पिछले बीस वर्षों में पुरी में डेरा डाले हुआ था। एक एडवेंचर टूरिज्म वंâपनी से जुड़े पाओलो को कथित रूप से मना किया गया था कि वह आदिवासियों की आपत्ति जनक तस्वीरे न खींचा करे। एक खबर यह भी मिली है कि पाओलो अनेक पर्यटकों को उड़ीसा के जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में ले जाता था। नवीन पटनायक सरकार ने क्या यह जानने की कोशिश की कि जंगल चप्पे-चप्पे से वाफिक पाओलों का संपर्वâ आदिवासियों और माओवादियों से रहा है या नही। कुल मिलाकर जितने रहस्यमय अपहरण के उपर्युक्त दो मामले हैं, उसकी तुलना में कहीं अधिक गुस्सा नवीन पटनायक सरकार की अकर्मण्यता पर आ रहा है। समय ने नवीन पटनाइक को जवाब दिया है। उल्लेखनीय हैं कि राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केन्द्र के खिलाफ मुहिम की शुरूआत इसी मुख्यमंत्री ने की थी। आज यही व्यक्ति नक्सली माओवादियों के सामने कमजोर और कायर सा नजर आ रहा है। यह आरोप लगाने में क्यों संकोच करें कि पटनाइक ने ही कुछ मुख्यमंत्रियों को बरगला कर राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी उक्त केन्द्र निर्धारित समय पर शुरू नही होने दिया। ताजा घटनाक्रमों के लिए उड़ीसा का यह अक्षम मुख्यमंत्री भी काफी हद तक जिम्मेदार है।
Monday, April 2, 2012
पंजाब सरकार को सही फटकार
(अनिल बिहारी श्रीवास्तव)
‘‘एक व्यक्ति (बलवंत सिंह राजोआणा) हत्या का दोषी है। दिन-दहाड़े एक मुख्यमंत्री की हत्या हुई थी लेकिन आतंकी कार्रवाई के दोषी पाए गये व्यक्ति को राजनीतिक समर्थन मिल रहा है। वे (पंजाब सरकार) उन्हें छोड़ वैâसे सकते हैं? ‘‘यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस जी.एस. सिंघवी और एस.जे.मुखोपाध्याय की बेंच ने गत दिवस की थी। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के दोषी राजोआणा को अदालत से राहत नहीं मिली है। उसे सुनाई गई फांसी की सजा के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि ‘‘चार दिनों में जो हुआ। (पंजाब में घटनाएं) वह सब कुछ साफ करने वाला है। यह सब नौटंकी है। अगर समय रहते सही कदम उठाये गये होते तो सरकारी खजाने को करोड़ों का नुकसान नहीं होता।’’ राजोआणा के मामले और उसके समर्थन में पंजाब में चार दिनों तक मचाये गये हंगामे पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद राज्य की शिरोमणि अकाली दल और भाजपा गठबंधन सरकार के पास बोलने को क्या है? एक हत्यारे के समर्थन में राज्य में बना दिये गये उन्मादी माहौल पर प्रकाश सिंह बादल सरकार की दुम दबी मुद्रा तथा राजोआणा को माफी देने के लिए बादल द्वारा की गई मांग दोनों ही आश्चर्य का विषय रही है। सरकार और सरकार चलाने वालों की यह नैतिक जिम्मेदारी होती है कि वे कानून का उल्लंघन करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा सुनिश्चित कराएं। लेकिन पंजाब में हालात कुछ उलट ही दिखे। बादल सरकार में सहयोगी और राष्ट्रभक्ति का ढिंढोरा पीटने वाली भारतीय जनता पार्टी ने राजोआणा के मामले में रहस्यमयी चुप्पी साध रखी थी। कांग्रेस मांग कर रही है कि राजोआणा की फांसी की सजा उम्रवैâद में बदल दी जाए। राज्य के तीन बड़े राजनीतिक दलों का ऐसा व्यवहार जहां गर्मख्याली संगठनों के हौसले बढ़ाने वाला लगा वहीं यह उन आतंकियों के लिए हौसले बढ़ाने वाला हो सकता है जो राज्य में आतंकवाद को सख्ती से कुचले जाने के बाद से सुसुप्तावस्था में पड़े हैं। दरअसल, तमिलनाडु में राजीव गांधी के हत्यारे श्रीलंकाई तमिलों, पंजाब में राजोआणा का मामला तथा संसद पर हमले के दोषी अफजल गुुरु के मुद्दे ने कई सवालों को खड़ा कर दिया है। एक खतरनाक प्रवृत्ति के हत्यारों को हीरो बनाकर वोटबैंक की राजनीति करने की बढ़ी है। चुनौती यह है कि इस पर रोक वैâसे लगाई जाए? देखा यह भी गया है कि दया याचिकाओं के निबटारे का तरीका भी बहुत लंबा और कुछ हद तक दोषपूर्ण है। पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से पूछा था कि ‘‘दया याचिकाओं के निबटारे में द्वैधता क्यों हैं?’’ बरसों-बरस दया याचिकाएं राष्ट्रपति के समक्ष विचारार्थ लंबित रहती हैं। प्रक्रिया के नाम पर टरकाऊ उत्तर दिये जाते हैं। इससे पीड़ित को न्याय मिलने में विलंब होता है तथा राजोआणा जैसे हत्यारों के पक्ष में निहित स्वार्थ सहानुभूति का माहौल बनाने में कामयाब हो जाते हैं। एक बुरी बात यह देखने में आने लगी है कि अब कई राजनीतिक दल भी वोट की घटिया राजनीति के चलते हत्यारों और अपराधियों के समर्थन में सहानुभूति प्रकट करने में झिझक महसूस नहीं करते। लेकिन ऐसा उन्हीं मामलों में अधिक देखा गया है जहां जनता के एक वर्ग में उन्माद भड़काना आसान होता है। याद करें, धनंजय चटर्जी को। एक नाबालिग लड़की का बलात्कार और उसकी हत्या के दोष में धनंजय को फांसी दे दी गई थी। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक दलों ने इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया। वे जानते थे कि उन्हें ऐसे हत्यारे के लिए समर्थन नहीं मिलेगा। अनुभव रहा है कि पश्चिम बंगाल में अपराधियों को आमतौर पर संरक्षण और सहयोग नहीं मिलता है। इस राज्य में कानून तोड़ने वालों को आम लोगों द्वारा खदेड़े जाने के सैकड़ों उदाहरण भरे हैं। वहां धर्म, संप्रदाय, क्षेत्रीयता, भाषा और जातीयता का प्रभाव कानून की राह में कम ही आता दिखा है। लेकिन पंजाब और तमिलनाडु में जो देखा गया वह चिंता बढ़ाने वाला है। अब लग रहा है कि कुछ कदम तत्काल उठाये जाने की जरूरत है। जैसे-आपराधिक मामलों के निबटारे को गति दी जाए और दो-तीन सालों में हर मामले का निबटना सुनिश्चित हो। ऊपरी अदालतों में अपीलों के निबटारे की समय-सीमा होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम पैâसले के बाद दया याचिका का अधिकतम छह माह में निबटारा होना चाहिए। इन प्रयासों से न्याय व्यवस्था पर आमजन का विश्वास और अधिक मजबूत होगा तथा हत्यारों एवं अपराधियों को हीरो बनाने का अवसर किसी को नहीं मिल सकेगा।
Friday, March 23, 2012
श्री श्री ने दिखाया आईना
(अनिल बिहारी श्रीवास्तव)
आध्यात्मिक गुरू तथा आर्ट आफ लिविंग के प्रमुख श्री श्री रविशंकर की एक टिप्पणी पर केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल की प्रतिक्रिया अवांछनीय की श्रेणी में रखने योग्य है। सरकारी स्वूâलों के संबंध में श्री श्री रविशंकर के विचारों का कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ने विरोध किया है। भाजपा के शाहनवाज हुसैन श्री श्री रविशंकर के विचारों से असहमत दिखे। उन्होंने बयान की निंदा की है। लेकिन कांग्रेस नेता और केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल फट से पड़े। सिब्बल ने कहा, ‘‘श्री श्री ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है। वंâई मंत्री और राष्ट्र्रपति तक सरकारी स्वूâलों से पढ़कर निकले हैं।’’ आध्यात्मिक गुरू के बयान पर प्रतिक्रिया के स्तर से ही साबित हो जाता है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों के लोगों ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि श्री श्री ने यह बात किस संदर्भ में की तथा सरकारी स्वूâलों से उनका अभिप्राय क्या था? तथ्यों को जाने बगैर विरोध में जुबान फटकारना सियारों के झुण्ड द्वारा मचाए जाने वाले शोर से कम थोड़े ही होता है। खबर है कि अंबाबाड़ी के आदर्श विद्या मंदिर स्वूâल में आयोजित कार्यक्रम में श्री श्री ने कहा, ‘‘ प्राइवेट स्वूâलों में सरकारी स्वूâलों से अधिक अनुशासन है। सरकारी स्वूâलों में पढ़े बच्चों में संस्कार नही होते हैं। इसी वजह से वे हिंसा और नक्सलवाद की तरफ बढ़ रहे हैं। सरकार को सरकारी स्वूâल बंद कर देना चाहिए। प्राइवेट स्वूâलों को नक्सल प्रभावित इलाकों में जाकर शिक्षा देने का काम करना चाहिए।’’ निष्पक्ष राय यह है कि श्री श्री के उपर्युक्त बयान को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है। उसमें थोड़ी सच्चाई अवश्य है। नवोदय विद्यालय एवं केन्द्रीय विद्यालय तथा सरकारी उपक्रमों द्वारा संचालित स्वूâलों से हटकर विचार करने में हमें इस तथ्य को स्वीकार करने पर विवश होना पड़ेगा कि अधिकांश राज्यों में सरकारी स्वूâलों की हालत बहुत खराब हैं। बच्चों को अच्छे संस्कार देने की बात छोड़िये, वहां पढ़ाई तक सही और पूरी नहीं होती है। कहीं शिक्षकों का अभाव है, कहीं आरक्षण और जुगाड़ के रास्ते ऐसे लोग मास्साब बन बैठे जिन्होंने खुद की पढ़ाई घिसट-घिसट कर पूरी की होगी। ज्ञान-दान के माहात्म के चलते वे शिक्षक नहीं बने। सुरक्षित सरकारी नौकरी और अच्छे वेतन के मोह ने कई अयोग्य लोगों को शिक्षक बनवा रखा है। इस देश के गांवों और कस्बों में लाखों ऐसे स्वूâल मिल जाएंगे। जिनका न तो अपना ठीकठाक भवन है और न ही ज्ञान की वर्षा करने वाले गुरूजन है।
श्री श्री रविशंकर ने आँखें खोल देने वाली बात की है। उनके अनुसार व्यक्तित्व के निर्माण में २५ प्रतिशत योगदान ईश्वर कृपा का होता है। २५ प्रतिशत परिवार का, २५ प्रतिशत स्वूâल का तथा २५ प्रतिशत योगदान मित्रों का होता है। परिवार और शिक्षण संस्था का माहौल ही बच्चे के आधे व्यक्तित्व का निर्माण कर देता है। यहां अच्छे संस्कार मिलने पर बच्चा मित्र भी अच्छे बनाता है। इन तीन परिस्थितियों में अनुवूâलता रहने पर ईश्वर कृपा सुनिश्चित होती है। ऐसा बच्चा बड़े होने पर कुसंस्कारी, भ्रष्ट, अनुशासनहीन और राष्ट्रद्रोही हो ही नहीं सकता। इस कड़वे सच को स्वीकार करना होगा कि प्रायवेट स्वूâलों और सरकारी स्वूâलों के बीच शिक्षण स्तर तथा माहौल में जमीन आसमान सा अंतर है। परिवार अथवा स्वूâल का जैसा माहौल होगा बच्चा बड़ा होकर वैसा ही परिणाम देगा। श्री श्री रविशंकर की टिप्पणी का विरोध करने वालों, विशेषकर कपिल सिब्बल, को किसी भी एक जिले में सरकारी स्वूâल और प्रायवेट स्वूâल की स्थितियों, उनके शिक्षा स्तर, अन्य गतिविधियों का तुलनात्मक अध्ययन करवाना चाहिए। यह पता लगाया जाए कि संबंधित जिले से पढ़कर ऊपर उठे कितने लोगों ने राजनीति, प्रशासन, समाजसेवा, चिकित्सा और पत्रकारिता जैसे पेशों में अपनी क्षमताओं का लोहा मनवाया और उन्होंने किन स्वूâलों से उन्होंने अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की थी। इसके अलावा सरकारी स्वूâलों से निकल कर अपराध की दुनिया, अंडर वल्र्ड में छा जाने वाले लोगों के आँकड़े एकत्र करने चाहिए। दूध का दूध और पानी का पानी होते कितनी देर लगेगी? आज के युवकों में बढ़ती अनुशासनहीनता तथा उदण्डता के लिए निश्चित रूप से उनका परिवार और शिक्षण संस्थाएं और आसपास का सामाजिक माहौल जिम्मेदार हैं। एक भ्रष्ट, आपराधिक मानसिकता वाले और संस्कारहीन व्यक्ति की संतान में अच्छे संस्कारों की आशा वैâसे की जा सकती है? बच्चे कच्ची माटी की तरह होते है। सरकारी स्वूâल के किसी भले शिक्षक के साथ गुरू-शिष्य रिश्ते की पवित्र डोर बंध गई तो सब भला हो जाता है अन्यथा जो होता है उसे सभी जानते, देखते और समझते हंैं। संस्कार की पहली पाठशाला परिवार हैं। व्यक्तित्व विकास की पहली सीढ़ी परिवार होते हैं। अतः जरूरत अच्छे स्वूâलों अकेले की नहीं हैं। आवश्यकता चरित्र के मामले में २४ वैâरेट सोने जैसे खरे अभिभावकों की भी होती है। इस देश को कुछ बातों के लिए निजी स्कलों का आभारी होना चाहिए। निजी स्वूâल भले ही मोटी फीस वसूलते हैं परतु शिक्षा और अनुशासन के मामले में वे अधिकांश सरकारी स्वूâल से बेहतर ही मिलते रहे हैं। स्तरहीन शिक्षा के कलंक से बचने की वो भरसक कोशिश करते हैं। गत वर्ष कर्नाटक के रायचूर जिले में द्वितीय प्री यूनिवर्सिटी परीक्षा में शामिल हुए ९३४२ विद्यार्थियों में से ६९.९१ प्रतिशत पेâल हो गए थे। इनमें से अधिकांश विद्यार्थी ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे। विशेषज्ञों ने कहा था कि ग्रामीण इलाकों में शिक्षा के घटिया स्तर के कारण ऐसा परिणाम आया। कर्नाटक के उस परिणाम को हांडी के चॉवल की तरह लें। ऐसे नाकाम छात्रों में से कुछ छात्र यदि गैर कानूनी काम करने वालों के जाल में पँâस जाएं तो आश्चर्य नही होगा। उन्हें न अच्छी शिक्षा मिली और न अच्छे संस्कार मिले होंगे। श्री श्री के कथन की पुष्टि रायचूर का उपर्युक्त उदाहरण करता हैं। बेहतर होगा कि सिब्बल स्वयं अपनी मानसिक स्थिति की फिक्र करें। आखिर बच्चों को अच्छा ज्ञान दिलवाना उन्हीं की जिम्मेदारी है।
Saturday, February 25, 2012
रेलवे को गंदगी से खतरा
(अनिल बिहारी श्रीवास्तव)
ट्रेनों के निचले दर्जों में शौचालय सुविधा नहीं होने से यात्रियों को होने वाली असुविधाओं की ओर तत्कालीन रेल अधिकारियों को दो जुलाई १९०९ को पत्र लिखते समय बाबू अखिल चंद्र सेन ने शायद कल्पना नहीं की होगी कि उनकी शिकायत को गंभीरता से लेते हुए रेलवे तत्काल कदम उठाएगा लेकिन ट्रेनों के डिब्बों में शुरू की गई शौचालय की व्यवस्था कालान्तर में भारतीय रेलवे के लिए एक समस्या बन जाएगी। बाबू अखिल चंद्र सेन ने अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर रेलवे के ट्रांसपोरटेशन सुपरिटेंडेंट, साहिबगंज को पत्र लिखकर यात्रियों को होने वाली असुविधा की ओर उनका ध्यान आकृष्ट किया था। रेलवे ने कदम उठाये। भारत में ट्रेनों का संचालन शुरू होने के ५५ बरस बाद निचले दर्जे के डिब्बों में भी शौचालय बनाये जाने लगे। आज वही शौचालय रेलवे के लिए सिरदर्द साबित होने लगे हैं। रेलवे सुरक्षा की समीक्षा कर रही विशेष समिति का कहना है कि किसी यात्री द्वारा जितनी बार किसी ट्रेन के शौचालय का उपयोग किया जाता है, उतनी ही बार वह भारतीय रेलवे को और अधिक खतरनाक बना देता है। अनिल काकोडकर समिति का मानना है कि ट्रेनों के शौचालय से गिरने वाले मल-मूत्र से देश की एक लाख १० हजार किमी लंबी रेल लाइन का काफी बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो रहा है। इस मल-मूत्र से रेल पटरियों की आयु कम हो जाती है तथा विशाल नेटवर्वâ संचालन काफी महंगा पड़ता है। समिति ने कहा कि ट्रेनों के उन सभी ४३ हजार कोचों से ऐसे शौचालयों को तत्काल बदलना जरूरी है जिनमें मल-मूत्र और जल सीधे पटरियों पर गिरता है। ऐसा नहीं करने पर भारतीय रेलवे को पटरियां खराब होने की समस्या से इसी तरह जूझते रहना पड़ेगा।
अनिल काकोड़कर समिति ने एक बड़ी गंभीर समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। मुश्किल यह है कि उसकी सिफारिशों पर तत्काल कदम उठाये जाने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। भारत में हर दिन आठ हजार ट्रेनें पटरियों पर दौड़ती हैं। इनमें से १६०० एक्सप्रेस और मेल ट्रेनें हैं। उपनगरीय यात्री गाड़ियों की संख्या चार हजार के आसपास बताई जाती है। एक मोटे अनुमान के अनुसार तीन करोड़ यात्री हर दिन ट्रेनों में सफर करते हैं। ट्रेन के डिब्बों की जो दशा हमारे यहां दिखाई देती है संभवतः वैसी स्थिति अविकसित देशों तक में नहीं देखी गई होगी। यात्रियों द्वारा पैâलाये जाने वाले कचरे के अलावा काकरोच और चूहे यात्री-कोचों में आम बात है। शौचालय सडांध मारते मिलते हैं। इस स्थिति के लिए सिर्पâ रेलवे प्रशासन को नहीं कोसा जा सकता। बल्कि कड़वा सच यह है कि हमारे नब्बे फीसदी यात्रियों में नागरिक-बोध का अभाव है। वे बेधड़क खाने-पीने की चीजें डिब्बे में गिराते हैं। कोच के प्रत्येक शौचालय के बाहर एक अनुरोध-सूचना चस्पा पाई जाती है, ‘‘ कृपया स्टेशन पर ट्रेन खड़ी होने पर शौचालय का उपयोग न करें।’’ कितने लोग इस अनुरोध को स्वीकार करते हैं। बड़े-बड़े स्टेशनों पर पटरियों के बीच मैला, बदबू बिखरा देखा जा सकता है। चलती ट्रेन में शौचालय का उपयोग करने के बाद अनेक महानुभाव फ्लश का उपयोग तक नहीं करते। अतः शौचालय की गंदगी से पटरियों की दुर्दशा का अनुमान लगाना संभव है। काकोड़कर कमेटी की रिपोर्ट ने एक नई बात सामने ला दी है। बात गंदगी अकेले की नहीं है, यहां चुनौती इस गंदगी से पटरियों को बचाने की है। लेकिन प्रश्न यह है कि पटरियों को खतरा सिर्पâ ट्र्रेन के शौचालय से गिरने वाली गंदगी से है? बड़े नगरों और महानगरों के करीब से सुबह गुजरने वाली ट्र्रेनों के यात्रियों से उनका अनुभव जानना चाहिए। उबकाई ला देने वाली बदबू का कारण किसी ने जानने की कोशिश की है? दरअसल, वहां छोटी बस्तियों और झुग्गी क्षेत्रों में शौचालय सुविधा नहीं होने से लोग रेल पटरियों का उपयोग खुले शौचालय के रूप में करते हैं।
भारतीय रेलवे ट्र्रेनों के डिब्बों के शौचालय से मल-मूत्र को पटरियों पर गिरने से रोकने के लिए वर्षों से प्रयोग कर रही है। कोई खामी रहित प्रणाली विकसित ही नहीं हो पा रही है। स्टेशन पर खड़ी गाड़ी में शौचालय का उपयोग रोकने के लिए तकनीक विकसित करने की कोशिश की जा रही है। यह तय है कि शौचालयों में सुधार किए बगैर गंदगी से मुक्ति और पटरियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। एक रास्ता फिर भी समझ में आता है कि कोच से मल-मूत्र सीधे गिरने से रोका जाए। डिजाइन इंजीनियरों को शौचालय की आउटलेट की दिशा बदलने पर विचार करना चाहिए। ट्रेन के शौचालय का दुरुपयोग रोकने के उपाय पर स्वयं रेलवे को विचार करना होगा। विशेषज्ञ समिति ने गंदगी को रेल सुरक्षा के लिए ठीक नहीं माना है। इस बात को पहले से ही सभी महसूस करते रहे हैं। बहरहाल, रेलवे कुछ पहल करे और कुछ बदलाव यात्रियों की सोच में आने पर रास्ता निकलने की उम्मीद दिखाई देती है।
Wednesday, April 20, 2011
बिनायक सेन, अब सुधर जाना
----अनिल बिहारी श्रीवास्तव
राष्ट्र द्रोह और नक्सलियों को राज्य के विरुद्ध लड़ाई के लिए नेटवर्क बनाने में मदद करने के आरोप में छत्तीसगढ़ की निचली अदालत से उम्रकैद की सजा पा चुके कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता, ६१ वर्षीय डॉ. बिनायक सेन ने अब राहत महसूस की होगी। देश की सर्वोच्च अदालत ने सेन को जमानत दे दी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एच.एस. बेदी और जस्टिस सी.के. प्रसाद की बेंच ने सेन को जमानत देने की वजह नहीं बताई तथा जमानत की शर्तें तय करने का काम निचली अदालत पर छोड़ दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सेन अब जेल के बाहर आ सकेंगे लेकिन निचली अदालत के फैसले के विरुद्ध आगे की कानूनी लड़ाई उन्हें लडऩी होगी। अत: सेन या उनके हमदर्दो को यह समझ में आ जाना चाहिए कि जमानत मिलना बेगुनाह साबित होना नहीं है। बिनायक सेन पर यह आरोप है कि उन्होंने एक तरह से माओवादियों के कूरियर की तरह भूमिका अदा की थी। वह एक अभियुक्त पीयूष गुहा से ३० बार जेल में मिले थे तथा उनके पास से माओवादी पर्चे और दस्तावेज मिले थे। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सेन की जमानत मंजूर करते हुए जो टिप्पणी की है वह निश्चित रूप से दूरगामी प्रभाव वाली साबित होगी। बेंच ने कहा कि सेन के पास नक्सली गतिविधियों से जुड़े दस्तावेज मिले थे लेकिन इससे आप कैसे देशद्रोह का आरोप लगा सकते हैं। अदालत ने कहा कि ‘‘ जिस तरह महात्मा गांधी की आत्मकथा रखने से कोई गांधीवादी नहीं बन जाता, उसी प्रकार नक्सली साहित्य रखने से भी कोई नक्सली नहीं बन सकता। भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है। वह (सेन) नक्सलियों के हमदर्द हो सकते हैं, इससे दोषी नहीं बन जाते।’’
सेन को जमानत विशुद्ध कानूनी तर्कों के चलते मिली है। नि:संदेह महात्मा गांधी की जीवनी लेकर घूमने वाले को गांधीवादी और नक्सली साहित्य रखने वाले को नक्सली नहीं कहा जा सकता है लेकिन यहां विचारधारा और उसका प्रभाव तथा व्यक्ति विशेष की रुचि पर भी ध्यान दिये जाने की जरूरत है । किसी साहित्य को कोई भी व्यक्ति उसी स्थिति में अपने पास रखता है जब उसके प्रति उसमें झुकाव हो। बिना झुकाव अथवा रुचि के साहित्य का बोझ भला कोई क्यों उठाएगा? गांधी जी की आत्मकथा गांधीवाद से प्रभावित ही अपने पास रखना चाहेगा ताकि गांधी दर्शन से सीखकर अपने देश और समाज के लिए कुछ किया जा सके। ज्ञान बढ़ाने के लिए नक्सली साहित्य को कितने लोग ढोते हैं? भले लोग किसी विचारधारा से कितने भी सहमत क्यों न हों लेकिन यदि उनमें कानून के शासन और संविधान के प्रति आस्था एवं सम्मान हो तो वे उसके विवादास्पद साहित्य से दूर ही रहेंगे। इस देश में ऐसे हजारों उदाहरण सामने आ चुके हैं जब कथित अश्लील साहित्य रखने अथवा नीली फिल्मों की सीडी लिये लोगों को पुलिस ने दबोच लिया। वे अव्वल दर्जे के व्याभिचारी मान लिये गये। आये दिन अखबारों में कॉल गल्र्स पकड़ी जाने की खबरें आती हैं। बताया जाता है कि कैसे कोई पुलिस वाला ग्राहक बनकर पहुंचा और कथित कॉल गल्र्स को पकड़ लिया गया। वहां तो बात सिर्फ देह की कीमत तक ले पाती है। धन लेकर देह समर्पण कहां सम्पन्न होता है। फिर उन लड़कियों को जेलों में क्यों डाल दिया जाता है। कुल मिलाकर स्थिति बड़ी जटिल है। यदि राष्ट्रद्रोह पर उतारु किसी प्रतिबंधित संगठन के प्रति हमदर्दी को अपराध नहीं मानेंगे तब ऐसे प्रतिबंध का अर्थ क्या रह जाएगा? प्रतिबंध का अप्रत्यक्ष उद्देश्य ही आम लोगों को ऐसे व्यक्तियों और संगठनों से दूर रखना होता है। प्रतिबंधित संगठन से हमदर्दी को अपराध नहीं मानने पर पुलिस और सुरक्षा बलों का काम जटिल हो जाता है। बहरहाल, मिस्टर बिनायक सेन के हमदर्द अब खुश होंगे। संभव है कि बताशे बांटे जा रहे हों। क्योंकि बस्तर के जंगलों में मिठाई कहां मिलेगी। बिनायक सेन को सिर्फ इतना परामर्श देना है, ‘‘अब तो सुधर जाओ’’
राष्ट्र द्रोह और नक्सलियों को राज्य के विरुद्ध लड़ाई के लिए नेटवर्क बनाने में मदद करने के आरोप में छत्तीसगढ़ की निचली अदालत से उम्रकैद की सजा पा चुके कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता, ६१ वर्षीय डॉ. बिनायक सेन ने अब राहत महसूस की होगी। देश की सर्वोच्च अदालत ने सेन को जमानत दे दी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एच.एस. बेदी और जस्टिस सी.के. प्रसाद की बेंच ने सेन को जमानत देने की वजह नहीं बताई तथा जमानत की शर्तें तय करने का काम निचली अदालत पर छोड़ दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सेन अब जेल के बाहर आ सकेंगे लेकिन निचली अदालत के फैसले के विरुद्ध आगे की कानूनी लड़ाई उन्हें लडऩी होगी। अत: सेन या उनके हमदर्दो को यह समझ में आ जाना चाहिए कि जमानत मिलना बेगुनाह साबित होना नहीं है। बिनायक सेन पर यह आरोप है कि उन्होंने एक तरह से माओवादियों के कूरियर की तरह भूमिका अदा की थी। वह एक अभियुक्त पीयूष गुहा से ३० बार जेल में मिले थे तथा उनके पास से माओवादी पर्चे और दस्तावेज मिले थे। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सेन की जमानत मंजूर करते हुए जो टिप्पणी की है वह निश्चित रूप से दूरगामी प्रभाव वाली साबित होगी। बेंच ने कहा कि सेन के पास नक्सली गतिविधियों से जुड़े दस्तावेज मिले थे लेकिन इससे आप कैसे देशद्रोह का आरोप लगा सकते हैं। अदालत ने कहा कि ‘‘ जिस तरह महात्मा गांधी की आत्मकथा रखने से कोई गांधीवादी नहीं बन जाता, उसी प्रकार नक्सली साहित्य रखने से भी कोई नक्सली नहीं बन सकता। भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है। वह (सेन) नक्सलियों के हमदर्द हो सकते हैं, इससे दोषी नहीं बन जाते।’’
सेन को जमानत विशुद्ध कानूनी तर्कों के चलते मिली है। नि:संदेह महात्मा गांधी की जीवनी लेकर घूमने वाले को गांधीवादी और नक्सली साहित्य रखने वाले को नक्सली नहीं कहा जा सकता है लेकिन यहां विचारधारा और उसका प्रभाव तथा व्यक्ति विशेष की रुचि पर भी ध्यान दिये जाने की जरूरत है । किसी साहित्य को कोई भी व्यक्ति उसी स्थिति में अपने पास रखता है जब उसके प्रति उसमें झुकाव हो। बिना झुकाव अथवा रुचि के साहित्य का बोझ भला कोई क्यों उठाएगा? गांधी जी की आत्मकथा गांधीवाद से प्रभावित ही अपने पास रखना चाहेगा ताकि गांधी दर्शन से सीखकर अपने देश और समाज के लिए कुछ किया जा सके। ज्ञान बढ़ाने के लिए नक्सली साहित्य को कितने लोग ढोते हैं? भले लोग किसी विचारधारा से कितने भी सहमत क्यों न हों लेकिन यदि उनमें कानून के शासन और संविधान के प्रति आस्था एवं सम्मान हो तो वे उसके विवादास्पद साहित्य से दूर ही रहेंगे। इस देश में ऐसे हजारों उदाहरण सामने आ चुके हैं जब कथित अश्लील साहित्य रखने अथवा नीली फिल्मों की सीडी लिये लोगों को पुलिस ने दबोच लिया। वे अव्वल दर्जे के व्याभिचारी मान लिये गये। आये दिन अखबारों में कॉल गल्र्स पकड़ी जाने की खबरें आती हैं। बताया जाता है कि कैसे कोई पुलिस वाला ग्राहक बनकर पहुंचा और कथित कॉल गल्र्स को पकड़ लिया गया। वहां तो बात सिर्फ देह की कीमत तक ले पाती है। धन लेकर देह समर्पण कहां सम्पन्न होता है। फिर उन लड़कियों को जेलों में क्यों डाल दिया जाता है। कुल मिलाकर स्थिति बड़ी जटिल है। यदि राष्ट्रद्रोह पर उतारु किसी प्रतिबंधित संगठन के प्रति हमदर्दी को अपराध नहीं मानेंगे तब ऐसे प्रतिबंध का अर्थ क्या रह जाएगा? प्रतिबंध का अप्रत्यक्ष उद्देश्य ही आम लोगों को ऐसे व्यक्तियों और संगठनों से दूर रखना होता है। प्रतिबंधित संगठन से हमदर्दी को अपराध नहीं मानने पर पुलिस और सुरक्षा बलों का काम जटिल हो जाता है। बहरहाल, मिस्टर बिनायक सेन के हमदर्द अब खुश होंगे। संभव है कि बताशे बांटे जा रहे हों। क्योंकि बस्तर के जंगलों में मिठाई कहां मिलेगी। बिनायक सेन को सिर्फ इतना परामर्श देना है, ‘‘अब तो सुधर जाओ’’
Monday, April 18, 2011
काले परिधान में साफ लोगों की जरूरत
----अनिल बिहारी श्रीवास्तव
भारत के प्रधान न्यायाधीश एस.एच.कापाडिय़ा ने कहा है कि ‘‘न्यायपालिका में काले परिधान में साफ लोगों की जरूरत है। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सत्यनिष्ठा बनी रहेगी।’’ जस्टिस कापाडिय़ा की उक्त टिप्पणी में भ्रष्टाचार के आरोपों के माहौल में न्यायपालिका की छवि को लेकर उनकी चिंता प्रतिबिम्बित हो रही है। जस्टिस कापाडिय़ा को कहना पड़ा है कि जजों को आत्ममंथन बनाये रखना चाहिए और वकीलों, राजनेताओं, मंत्रियों और राजनीतिक दलों से सम्पर्क से बचें। उन्होंने यह भी सलाह दी कि उच्चस्तरीय जजों को अपने से निचली अदालत के प्रशासनिक कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। जस्टिस कापाडिय़ा की उक्त टिप्पणी का निचोड़ यही समझ में आ रहा है कि न्यायपालिका की पवित्रता बनाये रखने पर जोर दिया गया। संभवत: यही कारण है कि प्रधान न्यायाधीश ने जजों को राजनीतिक संरक्षण नहीं देने पर जोर दिया है। निष्पक्ष विश्लेषकों का यह निष्कर्ष काफी सही लग रहा है कि जस्टिस पीडी दिनाकरन और जस्टिस सौमित्र सेन से जुड़े भ्रष्टाचार के मुद्दों की पृष्ठभूमि में प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण बन गई है। साफ बात यह है कि राजनेताओं तक यह संदेश पहुंच चुका होगा कि न्यायपालिका को भ्रष्टाचार से मुक्त रखने के लिए सहयोग करेंगे। इससे देश और समाज के साथ-साथ सियासी बिरादरी का ही भला होना है।
दो-तीन दिन पूर्व गांधीवादी और सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने खुला आरोप लगाया था कि भ्रष्ट राजनेताओं ने आम लोगों के एक बड़े भाग को भी भ्रष्ट बना दिया है। अन्ना की टिप्पणी को वाकयुद्ध का एक हमला मानने की बजाय चिंतन इस बात पर किया जाए कि राजनेताओं ने अपने निहित स्वार्थों के लिए समाज के किस-किस हिस्से तक भ्रष्टाचार के कैंसर के वायरस को पहुंचाया है? इस संक्रमण से अगर अधिकांश विभाग और वर्ग प्रभावित हैं तब न्यायपालिका को भला कैसे सुरक्षित या अनछुआ माना जा सकता है? ऐसा माना जाता रहा है कि न्यायपालिका के निचले स्तर पर तुलनात्मक रूप से अधिक भ्रष्टाचार है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा द्वारा गत २६ नवंबर को की गई टिप्पणी को याद करें। न्यायाधीश द्वय ने कहा था कि ‘‘इस हाईकोर्ट के अधिकांश जज भ्रष्ट हैं और वकीलों से सांठ गांठ रखते हैं।’’ ऐतिहासिक फैसलों का समृद्ध इतिहास रखने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी आईना दिखाने जैसी है। बड़े दु:ख के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि हाईकोर्टों के कई जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले हैं। समस्या यह है कि उच्च न्यायपालिका के किसी न्यायाधीश को महाभियोग से ही हटाया जा सकता है। यह भी न्यायिक जांच के बाद संभव है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस वी.रामास्वामी का मामला याद करें। जांच में उन्हें दोषी पाया गया था। १९९२ में संसद में महाभियोग प्रस्ताव गिर गया। जाहिर है कि राजनीतिक बिरादरी में मौजूदा जस्टिस रामास्वामी के हमदर्दो ने वफादारी निभा दी। कर्नाटक के चीफ जस्टिस पी.डी. दिनाकरन को याद करें। गंभीर आरोपों के बाद भी वह अदालत में मामलों की सुनवाई करते और प्रशासनिक फैसले लेते रहे। गंगटोक स्थानांतरण आदेश का पालन उन्होंने विलंब से किया। इस हठी और अडिय़ल व्यवहार के पीछे के कारण राजनीतिक संरक्षण ही रहा है।
न्याय पालिका को भ्रष्टाचार से मुक्त रखने के लिए जरूरी है कि नैतिक पतन, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के मामलों का निबटारा फास्ट ट्रैक कोर्ट से करवाया जाए। उच्च न्यायपालिका के भ्रष्ट जज को हटाने के लिए महाभियोग प्रक्रिया तेज हो। किसी न्यायाधीश के विरुद्ध कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति की ओर से मंजूरी की समय-सीमा तय की जाए। दरअसल, जजों की नियुक्ति से लेकर सेवानिवृत्ति तक के सभी फैसले लेने का अधिकार न्यायपालिका के हाथों में रहना चाहिए। कोई राजनेता न्यायाधीशों को किसी भी प्रकार से प्रलोभन देने की स्थिति में ही न रहे। इसके अलावा आचार संहिता के कड़ाई से पालन को सुनिश्चित करके न्यायपालिका को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है।
भारत के प्रधान न्यायाधीश एस.एच.कापाडिय़ा ने कहा है कि ‘‘न्यायपालिका में काले परिधान में साफ लोगों की जरूरत है। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सत्यनिष्ठा बनी रहेगी।’’ जस्टिस कापाडिय़ा की उक्त टिप्पणी में भ्रष्टाचार के आरोपों के माहौल में न्यायपालिका की छवि को लेकर उनकी चिंता प्रतिबिम्बित हो रही है। जस्टिस कापाडिय़ा को कहना पड़ा है कि जजों को आत्ममंथन बनाये रखना चाहिए और वकीलों, राजनेताओं, मंत्रियों और राजनीतिक दलों से सम्पर्क से बचें। उन्होंने यह भी सलाह दी कि उच्चस्तरीय जजों को अपने से निचली अदालत के प्रशासनिक कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। जस्टिस कापाडिय़ा की उक्त टिप्पणी का निचोड़ यही समझ में आ रहा है कि न्यायपालिका की पवित्रता बनाये रखने पर जोर दिया गया। संभवत: यही कारण है कि प्रधान न्यायाधीश ने जजों को राजनीतिक संरक्षण नहीं देने पर जोर दिया है। निष्पक्ष विश्लेषकों का यह निष्कर्ष काफी सही लग रहा है कि जस्टिस पीडी दिनाकरन और जस्टिस सौमित्र सेन से जुड़े भ्रष्टाचार के मुद्दों की पृष्ठभूमि में प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण बन गई है। साफ बात यह है कि राजनेताओं तक यह संदेश पहुंच चुका होगा कि न्यायपालिका को भ्रष्टाचार से मुक्त रखने के लिए सहयोग करेंगे। इससे देश और समाज के साथ-साथ सियासी बिरादरी का ही भला होना है।
दो-तीन दिन पूर्व गांधीवादी और सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने खुला आरोप लगाया था कि भ्रष्ट राजनेताओं ने आम लोगों के एक बड़े भाग को भी भ्रष्ट बना दिया है। अन्ना की टिप्पणी को वाकयुद्ध का एक हमला मानने की बजाय चिंतन इस बात पर किया जाए कि राजनेताओं ने अपने निहित स्वार्थों के लिए समाज के किस-किस हिस्से तक भ्रष्टाचार के कैंसर के वायरस को पहुंचाया है? इस संक्रमण से अगर अधिकांश विभाग और वर्ग प्रभावित हैं तब न्यायपालिका को भला कैसे सुरक्षित या अनछुआ माना जा सकता है? ऐसा माना जाता रहा है कि न्यायपालिका के निचले स्तर पर तुलनात्मक रूप से अधिक भ्रष्टाचार है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा द्वारा गत २६ नवंबर को की गई टिप्पणी को याद करें। न्यायाधीश द्वय ने कहा था कि ‘‘इस हाईकोर्ट के अधिकांश जज भ्रष्ट हैं और वकीलों से सांठ गांठ रखते हैं।’’ ऐतिहासिक फैसलों का समृद्ध इतिहास रखने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी आईना दिखाने जैसी है। बड़े दु:ख के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि हाईकोर्टों के कई जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले हैं। समस्या यह है कि उच्च न्यायपालिका के किसी न्यायाधीश को महाभियोग से ही हटाया जा सकता है। यह भी न्यायिक जांच के बाद संभव है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस वी.रामास्वामी का मामला याद करें। जांच में उन्हें दोषी पाया गया था। १९९२ में संसद में महाभियोग प्रस्ताव गिर गया। जाहिर है कि राजनीतिक बिरादरी में मौजूदा जस्टिस रामास्वामी के हमदर्दो ने वफादारी निभा दी। कर्नाटक के चीफ जस्टिस पी.डी. दिनाकरन को याद करें। गंभीर आरोपों के बाद भी वह अदालत में मामलों की सुनवाई करते और प्रशासनिक फैसले लेते रहे। गंगटोक स्थानांतरण आदेश का पालन उन्होंने विलंब से किया। इस हठी और अडिय़ल व्यवहार के पीछे के कारण राजनीतिक संरक्षण ही रहा है।
न्याय पालिका को भ्रष्टाचार से मुक्त रखने के लिए जरूरी है कि नैतिक पतन, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के मामलों का निबटारा फास्ट ट्रैक कोर्ट से करवाया जाए। उच्च न्यायपालिका के भ्रष्ट जज को हटाने के लिए महाभियोग प्रक्रिया तेज हो। किसी न्यायाधीश के विरुद्ध कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति की ओर से मंजूरी की समय-सीमा तय की जाए। दरअसल, जजों की नियुक्ति से लेकर सेवानिवृत्ति तक के सभी फैसले लेने का अधिकार न्यायपालिका के हाथों में रहना चाहिए। कोई राजनेता न्यायाधीशों को किसी भी प्रकार से प्रलोभन देने की स्थिति में ही न रहे। इसके अलावा आचार संहिता के कड़ाई से पालन को सुनिश्चित करके न्यायपालिका को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है।
ठेका नहीं लिया है पाक खिलाडिय़ों को पालने का
----अनिल बिहारी श्रीवास्तव
पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी शाहिद आफरीदी ने इंडियन क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) से अपील की है कि इंडियन प्रीमियर लीग में शामिल किये जाने के समय पाकिस्तान क्रिकेट खिलाडिय़ों के साथ अछूतों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। कराची में आफरीदी ने सफाई दी कि वह अपनी बात नहीं कर रहे हैं। वह चाहते हैं कि पाकिस्तानी युवा क्रिकेट खिलाडिय़ों को आईपीएल जैसे प्लेटफार्म पर खेलने का अवसर मिले। उल्लेखनीय है कि आईपीएल के पहले संस्करण (२००८) में ११ पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को खेलने का मौका मिला था। हैदराबाद टीम से उस आईपीएल में शामिल हुए शाहिद आफरीदी सबसे महंगे पाकिस्तानी खिलाड़ी थे जिसने पौने सात लाख डालर की मोटी रकम कमाई थी। मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद उत्पन्न सुरक्षा चिंताओं के चलते २००९ और २०१० के आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ी नहीं खेल पाए। आईपीएल के आज से शुरू हो रहे चौथे संस्करण में भी पाकिस्तानी खिलाड़ी नहीं हैं। यह तो आंकड़ों की बात हुई लेकिन आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाडिय़ों की रुचि के पीछे एक जुझारू और फटाफट क्रिकेट मुकाबले में खेलकर बल्ले और गेंद पर हाथ साफ करने और नाम कमाने की भावना के पीछे असल आकर्षण इस टूर्नामेंट से खिलाडिय़ों पर होने वाली नोटों की बारिश है। यह एक ऐसा अवसर होता है जब अच्छा खिलाड़ी नोटों की गठरी बांधकर घर लौटता है। वह आर्थिक चिंताओं से कई वर्षों तक मुक्त रह सकता है। इस देश में भी कुछ लोग आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को मौका देने की वकालत कर चुके हैं। उनका सिर्फ यही राग सुनाई देता है कि इससे दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य होने में मदद मिलेगी। लेकिन इतिहास गवाह है विभाजन के छह दशकों के दौरान भारत ने कम-से-कम ६०० बार पाकिस्तान से संबंध सामान्य बनाने की कोशिश की होगी। भारत ने पाकिस्तानियों के तमाम छल-कपट को नजरअंदाज किया है। पाकिस्तान के विषवमन की ओर कभी ध्यान नहीं दिया लेकिन बदले में भारत को मिला क्या? ईष्र्या, नफरत, साजिशें और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जहर की बौछार? अपनी दकियानूस सोच, कट्टरवाद, आतंकवाद को संरक्षण के कारण पाकिस्तान पिछड़ा है। वह कर्ज में डूबा है, मगर उसकी अकड़ कायम है। इस सबके बावजूद पाकिस्तानी कलाकारों को यहां काम दिया जाता है। गंभीर रूप से बीमार पाकिस्तानियों का यहां मुफ्त या रियायती दर पर इलाज होता है। कम-से-कम आधा दर्जन पाकिस्तानी शिशुओं और बच्चों के दिल यहां दुरुस्त किये गये। राजनीति और कूटनीति का फेर ऐसा है कि भारत, पाकिस्तानी कारस्तानियों को जानते हुए भी अक्सर चुप रहा। अधिकांश पाकिस्तानियों के दिमाग में भारत और भारतीय के प्रति कितनी नफरत और जहर भरा है इसका प्रमाण विश्वकप क्रिकेट के सेमीफाइनल में भारत के हाथों पराजय के बाद पाकिस्तान लौटे उनके कप्तान शाहिद आफरीदी के बयान से मिल गया। आफरीदी ने भारतीयों को छोटे दिल वाला बताया था। उसके अनुसार भारतीयों के साथ रहा ही नहीं जा सकता है। वहीं आफरीदी आज भारतीय क्रिकेट बोर्ड से कह रहा है कि आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को शामिल किया जाए। क्यों? क्या भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने ठेका लिया है पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को पालने का? हैरानी हो रही है कि शाहिद आफरीदी के बयान पर? क्या कोई इंसान इतना भी मक्कार हो सकता है? साफ शब्दों में कहें, पाकिस्तानियों को यहां खेलने देने की इजाजत का अर्थ सांप को दूध पिलाने की तरह होगा। यहां से दौलत, शोहरत कमाओ और अपने देश लौटकर हमें कोसो। अरे भई! आप आईपीएल में क्यों खेलना चाहते हैं। अपना खुद का पीपीएल शुरू कर लो। आश्वस्त करते हैं हमारा कोई खिलाड़ी उसमें खेलने देने के लिए आप के समक्ष नहीं गिड़गिड़ाएगा।
पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी शाहिद आफरीदी ने इंडियन क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) से अपील की है कि इंडियन प्रीमियर लीग में शामिल किये जाने के समय पाकिस्तान क्रिकेट खिलाडिय़ों के साथ अछूतों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। कराची में आफरीदी ने सफाई दी कि वह अपनी बात नहीं कर रहे हैं। वह चाहते हैं कि पाकिस्तानी युवा क्रिकेट खिलाडिय़ों को आईपीएल जैसे प्लेटफार्म पर खेलने का अवसर मिले। उल्लेखनीय है कि आईपीएल के पहले संस्करण (२००८) में ११ पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को खेलने का मौका मिला था। हैदराबाद टीम से उस आईपीएल में शामिल हुए शाहिद आफरीदी सबसे महंगे पाकिस्तानी खिलाड़ी थे जिसने पौने सात लाख डालर की मोटी रकम कमाई थी। मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद उत्पन्न सुरक्षा चिंताओं के चलते २००९ और २०१० के आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ी नहीं खेल पाए। आईपीएल के आज से शुरू हो रहे चौथे संस्करण में भी पाकिस्तानी खिलाड़ी नहीं हैं। यह तो आंकड़ों की बात हुई लेकिन आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाडिय़ों की रुचि के पीछे एक जुझारू और फटाफट क्रिकेट मुकाबले में खेलकर बल्ले और गेंद पर हाथ साफ करने और नाम कमाने की भावना के पीछे असल आकर्षण इस टूर्नामेंट से खिलाडिय़ों पर होने वाली नोटों की बारिश है। यह एक ऐसा अवसर होता है जब अच्छा खिलाड़ी नोटों की गठरी बांधकर घर लौटता है। वह आर्थिक चिंताओं से कई वर्षों तक मुक्त रह सकता है। इस देश में भी कुछ लोग आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को मौका देने की वकालत कर चुके हैं। उनका सिर्फ यही राग सुनाई देता है कि इससे दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य होने में मदद मिलेगी। लेकिन इतिहास गवाह है विभाजन के छह दशकों के दौरान भारत ने कम-से-कम ६०० बार पाकिस्तान से संबंध सामान्य बनाने की कोशिश की होगी। भारत ने पाकिस्तानियों के तमाम छल-कपट को नजरअंदाज किया है। पाकिस्तान के विषवमन की ओर कभी ध्यान नहीं दिया लेकिन बदले में भारत को मिला क्या? ईष्र्या, नफरत, साजिशें और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जहर की बौछार? अपनी दकियानूस सोच, कट्टरवाद, आतंकवाद को संरक्षण के कारण पाकिस्तान पिछड़ा है। वह कर्ज में डूबा है, मगर उसकी अकड़ कायम है। इस सबके बावजूद पाकिस्तानी कलाकारों को यहां काम दिया जाता है। गंभीर रूप से बीमार पाकिस्तानियों का यहां मुफ्त या रियायती दर पर इलाज होता है। कम-से-कम आधा दर्जन पाकिस्तानी शिशुओं और बच्चों के दिल यहां दुरुस्त किये गये। राजनीति और कूटनीति का फेर ऐसा है कि भारत, पाकिस्तानी कारस्तानियों को जानते हुए भी अक्सर चुप रहा। अधिकांश पाकिस्तानियों के दिमाग में भारत और भारतीय के प्रति कितनी नफरत और जहर भरा है इसका प्रमाण विश्वकप क्रिकेट के सेमीफाइनल में भारत के हाथों पराजय के बाद पाकिस्तान लौटे उनके कप्तान शाहिद आफरीदी के बयान से मिल गया। आफरीदी ने भारतीयों को छोटे दिल वाला बताया था। उसके अनुसार भारतीयों के साथ रहा ही नहीं जा सकता है। वहीं आफरीदी आज भारतीय क्रिकेट बोर्ड से कह रहा है कि आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को शामिल किया जाए। क्यों? क्या भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने ठेका लिया है पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को पालने का? हैरानी हो रही है कि शाहिद आफरीदी के बयान पर? क्या कोई इंसान इतना भी मक्कार हो सकता है? साफ शब्दों में कहें, पाकिस्तानियों को यहां खेलने देने की इजाजत का अर्थ सांप को दूध पिलाने की तरह होगा। यहां से दौलत, शोहरत कमाओ और अपने देश लौटकर हमें कोसो। अरे भई! आप आईपीएल में क्यों खेलना चाहते हैं। अपना खुद का पीपीएल शुरू कर लो। आश्वस्त करते हैं हमारा कोई खिलाड़ी उसमें खेलने देने के लिए आप के समक्ष नहीं गिड़गिड़ाएगा।
Friday, April 8, 2011
समस्या फर्जी गरीबों से निबटने की
---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
संसद की एक स्थायी समिति ने गरीबों की गणना में भारी धांधली को उजागर किया है। समिति के अनुसार गरीबी की रेखा के ऊपर (एपीएल) के ८६ प्रतिशत लोगों को गरीबी की रेखा के नीचे (बीपीएल) में शामिल कर लिया गया है। ग्रामीण इलाकों में भी स्थिति बुरी है जहां १७ प्रतिशत धनाढ्य लोगों को बीपीएल कार्ड दिये गए हैं। इस विषय पर आगे बढऩे से पहले २००८-०९ के आर्थिक सर्वेक्षण को याद करना जरूरी है जिसके अनुसार देश में ८०.५ प्रतिशत आबादी ऐसे लोगों की है जो बीस रुपये प्रतिदिन पर गुजारा करते हैं। लेकिन देश में बेहद गरीबों की संख्या को लेकर आंकड़ों पर विवाद रहा है। अर्जुन सेनगुप्ता की अगुआई वाले आयोग ने कहा था कि ७७ प्रतिशत आबादी ऐसे लोगों की है जो बीस रुपये रोज पर गुजारा कर रहे हैं। इस तरह के दावों का तकनीकी आधार क्या था? इन्हें स्वीकार करने का मन नहीं हुआ लेकिन योजना आयोग द्वारा पी.तेंदुलकर की अध्यक्षता में गठित समिति ने पाया कि गरीबी की रेखा में जीवनयापन करने वालों की आबादी ३७ प्रतिशत है। यदि बीपीएल निर्धारण के मापदण्ड को देखें तब यह ३७ प्रतिशत वाला आंकड़ा भी हजम नहीं होता है। गरीबी रेखा का निर्धारण १९७८ में आय और खाद्य जरूरत को देखते हुए तय किया गया था। तब ग्रामीण क्षेत्रों में ६१.८० रुपये प्रतिमाह प्रतिव्यक्ति और शहरी क्षेत्र में ७१.३० रुपये प्रति व्यवित, प्रतिमाह को गरीबी की रेखा माना गया। योजना आयोग प्रत्येक वर्ष मुद्रास्फीति के आधार पर इसकी गणना करता है। वर्ष २००५-०६ में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ३६८ रुपये प्रति व्यक्ति, प्रतिमाह और शहरी क्षेत्रों के लिए ५६० रुपये प्रति व्यक्ति, प्रतिमाह को गरीबी की रेखा माना गया। इतनी आय से सिर्फ पेट की आग जैसे-तैसे शांत की जा सकती है। स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी अन्य जरूरतों की पूर्ति इतनी कम राशि से नहीं हो सकती। जाहिर है कि इतनी आय पर किसी तरह जी रहे लोगों को सरकार समाज की ओर से सहारा मिलना जरूरी है। दूसरे शब्दों में कहें कि निश्चित रूप से देश के बेहद गरीब लोगों को कुछ मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सहारा देना एक जिम्मेदारी भरी सोच है। लेकिन बीपीएल कार्डधारियों को रियायती दर पर खाद्यान्न, कुछ राज्यों में एक बत्ती विद्युत कनेक्शन जैसी सुविधाएं शुरू किये जाने के साथ ही इनकी संख्या बढऩे लगी। अधिकांश राज्यों में बीपीएल कार्डधारियों की संख्या बढऩे से यह संदेह मजबूत हुआ कि अपात्र लोग कतिपय शासकीय कर्मचारियों, पार्षदों, राजनेताओं और दलालों के सहयोग तथा संरक्षण से गरीबी की रेखा के नीचे जीने वालों की सूची में अपना नाम दर्ज करवाने में कामयाब हो गये हैं। ऐसी हरकत जहां अव्वल दर्जे की छिछोरी मानसिकता को दर्शाती है वहीं इसके कारण वास्तविक गरीबों का हक छिनने की आशंकाएं मजबूत होती हैं। बीपीएल आबादी में की गई गड़बड़ी का प्रमाण स्वयं संसद की समिति ने दिया है जो इस सूची में ८६ प्रतिशत लोग एपीएल के होने का दावा कर रही है। मध्यप्रदेश में एक जिला कलेक्टर ने बीपीएल सूची में फजी गरीबों की घुसपैठ को रोकने के लिए सराहनीय काम किया। उन्होंने बीपीएल सूची वाले परिवारों के मकान के बाहर उनका बीपीएल क्रमांक दर्ज करवाने के निर्देश दिये। बड़ा उत्साहजनक परिणाम सामने आया। कई लोग स्वेच्छा से आगे आए और बीपीएल सूची से अपने नाम हटवा लिये। प्रश्न यह है कि इतनी नैतिकता और साहस कितने परिवार दिखा पाएंगे? बीपीएल कार्डधारी परिवार के मकान के सामने विवरण दर्ज करना एक सही उपाय है। कोई गरीब है और सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाएं भोग रहा है, फिर उसे इस सत्य को स्वीकार करने में शर्म नहीं महसूस होनी चाहिए। उधर, सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि बीपीएल परिवार तय करते समय पुख्ता जांच हो। जान बूझकर या अनजाने में तथ्यों को छुपा या दबाकर बीपीएल सूची में आने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। आखिर बीपीएल परिवारों को मदद करदाताओं से वसूली गई रकम से ही की जाती है। ऐसे धन का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
संसद की एक स्थायी समिति ने गरीबों की गणना में भारी धांधली को उजागर किया है। समिति के अनुसार गरीबी की रेखा के ऊपर (एपीएल) के ८६ प्रतिशत लोगों को गरीबी की रेखा के नीचे (बीपीएल) में शामिल कर लिया गया है। ग्रामीण इलाकों में भी स्थिति बुरी है जहां १७ प्रतिशत धनाढ्य लोगों को बीपीएल कार्ड दिये गए हैं। इस विषय पर आगे बढऩे से पहले २००८-०९ के आर्थिक सर्वेक्षण को याद करना जरूरी है जिसके अनुसार देश में ८०.५ प्रतिशत आबादी ऐसे लोगों की है जो बीस रुपये प्रतिदिन पर गुजारा करते हैं। लेकिन देश में बेहद गरीबों की संख्या को लेकर आंकड़ों पर विवाद रहा है। अर्जुन सेनगुप्ता की अगुआई वाले आयोग ने कहा था कि ७७ प्रतिशत आबादी ऐसे लोगों की है जो बीस रुपये रोज पर गुजारा कर रहे हैं। इस तरह के दावों का तकनीकी आधार क्या था? इन्हें स्वीकार करने का मन नहीं हुआ लेकिन योजना आयोग द्वारा पी.तेंदुलकर की अध्यक्षता में गठित समिति ने पाया कि गरीबी की रेखा में जीवनयापन करने वालों की आबादी ३७ प्रतिशत है। यदि बीपीएल निर्धारण के मापदण्ड को देखें तब यह ३७ प्रतिशत वाला आंकड़ा भी हजम नहीं होता है। गरीबी रेखा का निर्धारण १९७८ में आय और खाद्य जरूरत को देखते हुए तय किया गया था। तब ग्रामीण क्षेत्रों में ६१.८० रुपये प्रतिमाह प्रतिव्यक्ति और शहरी क्षेत्र में ७१.३० रुपये प्रति व्यवित, प्रतिमाह को गरीबी की रेखा माना गया। योजना आयोग प्रत्येक वर्ष मुद्रास्फीति के आधार पर इसकी गणना करता है। वर्ष २००५-०६ में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ३६८ रुपये प्रति व्यक्ति, प्रतिमाह और शहरी क्षेत्रों के लिए ५६० रुपये प्रति व्यक्ति, प्रतिमाह को गरीबी की रेखा माना गया। इतनी आय से सिर्फ पेट की आग जैसे-तैसे शांत की जा सकती है। स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी अन्य जरूरतों की पूर्ति इतनी कम राशि से नहीं हो सकती। जाहिर है कि इतनी आय पर किसी तरह जी रहे लोगों को सरकार समाज की ओर से सहारा मिलना जरूरी है। दूसरे शब्दों में कहें कि निश्चित रूप से देश के बेहद गरीब लोगों को कुछ मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सहारा देना एक जिम्मेदारी भरी सोच है। लेकिन बीपीएल कार्डधारियों को रियायती दर पर खाद्यान्न, कुछ राज्यों में एक बत्ती विद्युत कनेक्शन जैसी सुविधाएं शुरू किये जाने के साथ ही इनकी संख्या बढऩे लगी। अधिकांश राज्यों में बीपीएल कार्डधारियों की संख्या बढऩे से यह संदेह मजबूत हुआ कि अपात्र लोग कतिपय शासकीय कर्मचारियों, पार्षदों, राजनेताओं और दलालों के सहयोग तथा संरक्षण से गरीबी की रेखा के नीचे जीने वालों की सूची में अपना नाम दर्ज करवाने में कामयाब हो गये हैं। ऐसी हरकत जहां अव्वल दर्जे की छिछोरी मानसिकता को दर्शाती है वहीं इसके कारण वास्तविक गरीबों का हक छिनने की आशंकाएं मजबूत होती हैं। बीपीएल आबादी में की गई गड़बड़ी का प्रमाण स्वयं संसद की समिति ने दिया है जो इस सूची में ८६ प्रतिशत लोग एपीएल के होने का दावा कर रही है। मध्यप्रदेश में एक जिला कलेक्टर ने बीपीएल सूची में फजी गरीबों की घुसपैठ को रोकने के लिए सराहनीय काम किया। उन्होंने बीपीएल सूची वाले परिवारों के मकान के बाहर उनका बीपीएल क्रमांक दर्ज करवाने के निर्देश दिये। बड़ा उत्साहजनक परिणाम सामने आया। कई लोग स्वेच्छा से आगे आए और बीपीएल सूची से अपने नाम हटवा लिये। प्रश्न यह है कि इतनी नैतिकता और साहस कितने परिवार दिखा पाएंगे? बीपीएल कार्डधारी परिवार के मकान के सामने विवरण दर्ज करना एक सही उपाय है। कोई गरीब है और सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाएं भोग रहा है, फिर उसे इस सत्य को स्वीकार करने में शर्म नहीं महसूस होनी चाहिए। उधर, सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि बीपीएल परिवार तय करते समय पुख्ता जांच हो। जान बूझकर या अनजाने में तथ्यों को छुपा या दबाकर बीपीएल सूची में आने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। आखिर बीपीएल परिवारों को मदद करदाताओं से वसूली गई रकम से ही की जाती है। ऐसे धन का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
Tuesday, March 22, 2011
जिसकी लाठी उसकी भैंस
----अनिल बिहारी श्रीवास्तव
आल इंडिया जाट आरक्षण समिति के आह्वान पर आंदोलनरत जाट समुदाय ने उत्तर प्रदेश में रेल लाइन और हाईवे से अवरोध हटा लिये हैं। जाटों के नेताओं ने कहा है कि केंद्र सरकार की नौकरियों में जाटो के लिए आरक्षण के बारे में जल्द निर्णय नहीं लिया गया तो वे नये सिरे से व्यापक आंदोलन शुरू करेंगे। खबर है कि हरियाणा में आंदोलनकारी जाट अभी भी अपने कदम पीछे हटाने को तैयार नहीं है। जाट आंदोलनकारियों ने गत ५ मार्च से रेल लाइन और हाइवे पर अवरोध पैदा कर आवागमन ठप्प सा कर दिया था। उनके आंदोलन से अकेले रेल्वे को एक अरब रूपये की चोट पड़ी है। आम आदमी को अलग परेशानी हुई। बीमार लोग इलाज के लिए दिल्ली नहीं जा पा रहे थे, कितने ही बेरोजगार समय पर इंटरव्यू के लिए नहीं पहुंच पाए। एक अनुमान के अनुसार हर दिन लखनऊ से ही १३-१४ हजार लोग देश की राजधानी जाते और कमोवेश इतनी ही बड़ी संख्या में वहां से लौटते हैं। कल्पना की जा सकती है कि रेल और सडक़ परिवहन ठप्प किए जाने से आम आदमी को कितनी पेरशानी हुई होगी। राजस्थान में गुर्जर आंदोलनों के समय इसी तरह का नजारा देखने को मिला था। गुर्जरों का आंदोलन भी आरक्षण के लिए रहा हैं। आरक्षण संबंधी गुर्जरों और जाटों की मांग के पक्ष-विपक्ष में सैंकड़ों तक दिये जा सकते है। मुद्दा यह है कि कोई भी समुदाय या सम्प्रदाय अथवा जाति के लोग अपनी मांग मनवाने के लिए आम आदमी का जीवन क्यों मुश्किल कर देते हैं? राष्ट्र की सम्पत्ति को क्यों नुकसान पहुंचाया जाता है? सबसे बड़ी बात यह है कि वोट बैंक खोने के डर से जहां सरकार चलाने वाले लोग नपुंसकों की तरह देखते हैं वहीं अवसरवादी राजनेता ऐसे आन्दोलन को अपने-अपने ढंग से हवा देते हैं। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन के दौरान लोगों को हुई परेशानी और सार्वजनिक सम्पत्ति के नुकसान के बावजूद तत्कालीन वसुन्धरा राजे सरकार और केंद्र हाथ पर हाथ बांधे ताकते रहे। उस समय भी न्यायपालिका को आगे आकर जवाब-तलब करना पड़ा। इस बार जाट आंदोलन से लोगों को हो रही परेशानी पर भी मायावती सरकार खर्राटे मार कर सो रही थी। हाईकोर्ट द्वारा रेल लाइन से आंदोलनकारियों को हटाये जाने का आदेश देने पर राज्य सरकार जागी। मुख्यमंत्री मायावती ने जाट आंदोलनकारियों के ट्रैक से हटने का Ÿोय लेने में पलभर की देर नहीं की। मायावती तो जाट समुदाय की मांग को पहले ही समर्थन दे चुकी हैं। मजाल है कि कोई उनसे पूछ सके कि आंदोलन के कारण आम लोगों ने १५ दिनों तक जो कष्ट भोगा उस समय आप कहां थीं? किसी की मांग कितनी न्यायोचित या वाजिब हैं, एक अलग प्रश्न है लेकिन लोकतंत्र में मिली आंदोलन की सुविधा का जैसा दुरूपयोग भारत में दिखाई देने लगा है वैसा दुनिया में और कहां देखा गया है? आप किसी भी जाति, समुदाय अथवा सम्प्रदाय के हों लेकिन यदि किसी भी प्रकार से अपने लोगों की भावनाएं उभारने का माद्दा है तब सिकन्दर बनते देर नहीं लगेगी। ट्रेनों का आवागमन रोक देना, ट्रेनों और अन्य परिवहन साधनों को निशाना बनाना, खाद्यान्न अथवा दूध आदि की आपूर्ति रोकने की धमकी देना, सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाना, आखिर यह सब क्या है? उस पर तुर्रा यह कि आपके विरूद्ध बल प्रयोग नहीं होना चाहिए। कानून के शासन के बावजूद ऐसी मनमानी क्या जंगल राज या जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावतों को सच साबित नही कर देती हैं? वोट बैंक की राजनीति से उठकर सभी को गंभीर रूप लेती इस प्रवृत्ति को रोकने पर विचार करना होगा। टीवी चैनलों गाल बजाने और अखबारों में कलम दौड़ाने वालों को भी निडर होकर सकारात्मक सुझाव देने होंगे।
आल इंडिया जाट आरक्षण समिति के आह्वान पर आंदोलनरत जाट समुदाय ने उत्तर प्रदेश में रेल लाइन और हाईवे से अवरोध हटा लिये हैं। जाटों के नेताओं ने कहा है कि केंद्र सरकार की नौकरियों में जाटो के लिए आरक्षण के बारे में जल्द निर्णय नहीं लिया गया तो वे नये सिरे से व्यापक आंदोलन शुरू करेंगे। खबर है कि हरियाणा में आंदोलनकारी जाट अभी भी अपने कदम पीछे हटाने को तैयार नहीं है। जाट आंदोलनकारियों ने गत ५ मार्च से रेल लाइन और हाइवे पर अवरोध पैदा कर आवागमन ठप्प सा कर दिया था। उनके आंदोलन से अकेले रेल्वे को एक अरब रूपये की चोट पड़ी है। आम आदमी को अलग परेशानी हुई। बीमार लोग इलाज के लिए दिल्ली नहीं जा पा रहे थे, कितने ही बेरोजगार समय पर इंटरव्यू के लिए नहीं पहुंच पाए। एक अनुमान के अनुसार हर दिन लखनऊ से ही १३-१४ हजार लोग देश की राजधानी जाते और कमोवेश इतनी ही बड़ी संख्या में वहां से लौटते हैं। कल्पना की जा सकती है कि रेल और सडक़ परिवहन ठप्प किए जाने से आम आदमी को कितनी पेरशानी हुई होगी। राजस्थान में गुर्जर आंदोलनों के समय इसी तरह का नजारा देखने को मिला था। गुर्जरों का आंदोलन भी आरक्षण के लिए रहा हैं। आरक्षण संबंधी गुर्जरों और जाटों की मांग के पक्ष-विपक्ष में सैंकड़ों तक दिये जा सकते है। मुद्दा यह है कि कोई भी समुदाय या सम्प्रदाय अथवा जाति के लोग अपनी मांग मनवाने के लिए आम आदमी का जीवन क्यों मुश्किल कर देते हैं? राष्ट्र की सम्पत्ति को क्यों नुकसान पहुंचाया जाता है? सबसे बड़ी बात यह है कि वोट बैंक खोने के डर से जहां सरकार चलाने वाले लोग नपुंसकों की तरह देखते हैं वहीं अवसरवादी राजनेता ऐसे आन्दोलन को अपने-अपने ढंग से हवा देते हैं। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन के दौरान लोगों को हुई परेशानी और सार्वजनिक सम्पत्ति के नुकसान के बावजूद तत्कालीन वसुन्धरा राजे सरकार और केंद्र हाथ पर हाथ बांधे ताकते रहे। उस समय भी न्यायपालिका को आगे आकर जवाब-तलब करना पड़ा। इस बार जाट आंदोलन से लोगों को हो रही परेशानी पर भी मायावती सरकार खर्राटे मार कर सो रही थी। हाईकोर्ट द्वारा रेल लाइन से आंदोलनकारियों को हटाये जाने का आदेश देने पर राज्य सरकार जागी। मुख्यमंत्री मायावती ने जाट आंदोलनकारियों के ट्रैक से हटने का Ÿोय लेने में पलभर की देर नहीं की। मायावती तो जाट समुदाय की मांग को पहले ही समर्थन दे चुकी हैं। मजाल है कि कोई उनसे पूछ सके कि आंदोलन के कारण आम लोगों ने १५ दिनों तक जो कष्ट भोगा उस समय आप कहां थीं? किसी की मांग कितनी न्यायोचित या वाजिब हैं, एक अलग प्रश्न है लेकिन लोकतंत्र में मिली आंदोलन की सुविधा का जैसा दुरूपयोग भारत में दिखाई देने लगा है वैसा दुनिया में और कहां देखा गया है? आप किसी भी जाति, समुदाय अथवा सम्प्रदाय के हों लेकिन यदि किसी भी प्रकार से अपने लोगों की भावनाएं उभारने का माद्दा है तब सिकन्दर बनते देर नहीं लगेगी। ट्रेनों का आवागमन रोक देना, ट्रेनों और अन्य परिवहन साधनों को निशाना बनाना, खाद्यान्न अथवा दूध आदि की आपूर्ति रोकने की धमकी देना, सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाना, आखिर यह सब क्या है? उस पर तुर्रा यह कि आपके विरूद्ध बल प्रयोग नहीं होना चाहिए। कानून के शासन के बावजूद ऐसी मनमानी क्या जंगल राज या जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावतों को सच साबित नही कर देती हैं? वोट बैंक की राजनीति से उठकर सभी को गंभीर रूप लेती इस प्रवृत्ति को रोकने पर विचार करना होगा। टीवी चैनलों गाल बजाने और अखबारों में कलम दौड़ाने वालों को भी निडर होकर सकारात्मक सुझाव देने होंगे।
Friday, March 18, 2011
उपदेश मत दीजिये!
---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एस. एच. कपाडिय़ा ने कहा है, ‘‘न्यायाधीशों को अपना काम करते समय समाज को उपदेश नहीं देना चाहिए। उन्हें विधायिका की बुद्धिमत्ता का आकलन नहीं करना चाहिए।’’ जस्टिस कपाडिय़ा ने आगे कहा, ‘‘समस्या यह है कि हम अपने मूल्यों, अपनी पसंद-नापसंद समाज पर थोप देते हैं।’’ वह संवैधानिक नैतिकता विषय पर न्यायमूर्ति पीडी देसाई स्मृति व्याख्यान दे रहे थे। प्रधान न्यायाधीश ने न्यायाधीशों को उपदेश नही देने की सलाह दी है। इसका सीधा अर्थ यह है कि मामले से जुड़े सिद्धान्तों के अलावा किसी विषय पर नही बोला जाना चाहिए। जस्टिस कपाडिय़ा की उक्त टिप्पणी उनके दीर्घ अनुभव पर आधारित हैं। उन्होंने वह बात कही है जिसके विषय मे लम्बे समय से लोग सोचते रहे हैं लेकिन विषय न्यायपालिका से जुड़ा होने के कारण खुलकर बोलने से बचते रहे। वास्तव में लोकतंत्र मे न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका का अपना महत्व और अपनी-अपनी भूमिकाएं है’। आधुनिक लोकतंत्र में चौथे स्तम्भ के रूप में प्रेस/मीडिया को अघोषित मान्यता सी मिली हुई है। इन चारों की अपनी कार्य प्रणाली और सीमायें है। यह अपेक्षा की जाती है कि ये सभी अपनी सीमाओ में रहें तथा यह अवश्य सुनिश्चित किया जाए कि कोई किसी के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर टकराव पैदा नही कर रहा है। इसके लिए संवैधानिक प्रावधानों के साथ साथ नियम कानून हैं। लेकिन हमारे यहां कई बार विचित्र स्थिति उत्पन्न होती दिखी। मर्यादा की मेढ़ टूटने की आशंका हुई। गनीमत यह है कि लगभग चारों स्तम्भ समय रहते सजग हो गए। जस्टिस कपाडिय़ा की टिप्पणी पर विचार करते समय दो बिंदुओं पर केंद्रित हो सकते हैं। मसलन, न्यायाधीश फैसला सुनाते समय कहीं निजी धारणाओं के प्रवाह में तो नहीं आ गए और न्यायपालिका की अति सक्रियता। कुछ लोग न्यायपालिका की अति सक्रियता की बात करते हैं लेकिन भारत के संदर्भ में एक सकारात्मक बात यह है कि न्यायपालिका ने हमेशा उन्हीं विषयों पर व्यवस्था दी जहां किसी भी कारण से लोकतंत्र के अन्य स्तम्भ पीछे रह गए। यही कारण है कि ऐसी व्यवस्थाओं को आमजन का भरपूर समर्थन मिला तथा लोगों का न्यायपालिका के प्रति विश्वास और अधिक मजबूत हुआ। जब बात किसी न्यायाधीश द्वारा उपदेश शैली मे टिप्पणी की जाती है अथवा मामलो से जुड़े सिद्धांतो के अलावा किसी अन्य विषय पर कुछ कहा गया तब उसपर प्रतिक्रिया भी हुई। ऐसी प्रतिक्रियायें मर्यादा और अनुशासन की सीमाओं मे रहीं। हाल में ही कम से कम दो उदाहरण सामने आए जिनमें अदालत की किसी टिप्पणी पर खुलकर असहमति व्यक्त की गई तथा उसे वापस लेने या उसमें संशोधन के लिए उचित न्यायिक मंच का सहारा लिया गया। ऐसी ही एक टिप्पणी को स्वयं सुप्रीम कोर्ट पिछले दिनों संशोधन कर चुका है। निष्कर्ष यह है कि सभी को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए सीमाओ का ध्यान रखना चाहिए। यह बात विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से जुड़े सभी लोगो पर लागू होती है। सवाल यह है कि कोई भी विषयान्तर क्यों हो? न्यायाधीश एक सम्मानीय और प्रतिष्ठापूर्ण पद है। वहां से निकले शब्दों का ब्रह वाक्य के रूप लिया जाता है। प्रधान न्यायाधीश की यह अपेक्षा उचित है ‘‘हमें सिर्फ संवैधानिक सिद्धांतो के लिए ही काम करना चाहिए।’’ संवैधानिक व्यवस्था में किसी को अधिकार नही है कि वह दूसरों को उनके काम के बारे में बताये। लोकतंत्र की परिपक्वता और सफलता इसी पर टिकी है।
प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एस. एच. कपाडिय़ा ने कहा है, ‘‘न्यायाधीशों को अपना काम करते समय समाज को उपदेश नहीं देना चाहिए। उन्हें विधायिका की बुद्धिमत्ता का आकलन नहीं करना चाहिए।’’ जस्टिस कपाडिय़ा ने आगे कहा, ‘‘समस्या यह है कि हम अपने मूल्यों, अपनी पसंद-नापसंद समाज पर थोप देते हैं।’’ वह संवैधानिक नैतिकता विषय पर न्यायमूर्ति पीडी देसाई स्मृति व्याख्यान दे रहे थे। प्रधान न्यायाधीश ने न्यायाधीशों को उपदेश नही देने की सलाह दी है। इसका सीधा अर्थ यह है कि मामले से जुड़े सिद्धान्तों के अलावा किसी विषय पर नही बोला जाना चाहिए। जस्टिस कपाडिय़ा की उक्त टिप्पणी उनके दीर्घ अनुभव पर आधारित हैं। उन्होंने वह बात कही है जिसके विषय मे लम्बे समय से लोग सोचते रहे हैं लेकिन विषय न्यायपालिका से जुड़ा होने के कारण खुलकर बोलने से बचते रहे। वास्तव में लोकतंत्र मे न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका का अपना महत्व और अपनी-अपनी भूमिकाएं है’। आधुनिक लोकतंत्र में चौथे स्तम्भ के रूप में प्रेस/मीडिया को अघोषित मान्यता सी मिली हुई है। इन चारों की अपनी कार्य प्रणाली और सीमायें है। यह अपेक्षा की जाती है कि ये सभी अपनी सीमाओ में रहें तथा यह अवश्य सुनिश्चित किया जाए कि कोई किसी के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर टकराव पैदा नही कर रहा है। इसके लिए संवैधानिक प्रावधानों के साथ साथ नियम कानून हैं। लेकिन हमारे यहां कई बार विचित्र स्थिति उत्पन्न होती दिखी। मर्यादा की मेढ़ टूटने की आशंका हुई। गनीमत यह है कि लगभग चारों स्तम्भ समय रहते सजग हो गए। जस्टिस कपाडिय़ा की टिप्पणी पर विचार करते समय दो बिंदुओं पर केंद्रित हो सकते हैं। मसलन, न्यायाधीश फैसला सुनाते समय कहीं निजी धारणाओं के प्रवाह में तो नहीं आ गए और न्यायपालिका की अति सक्रियता। कुछ लोग न्यायपालिका की अति सक्रियता की बात करते हैं लेकिन भारत के संदर्भ में एक सकारात्मक बात यह है कि न्यायपालिका ने हमेशा उन्हीं विषयों पर व्यवस्था दी जहां किसी भी कारण से लोकतंत्र के अन्य स्तम्भ पीछे रह गए। यही कारण है कि ऐसी व्यवस्थाओं को आमजन का भरपूर समर्थन मिला तथा लोगों का न्यायपालिका के प्रति विश्वास और अधिक मजबूत हुआ। जब बात किसी न्यायाधीश द्वारा उपदेश शैली मे टिप्पणी की जाती है अथवा मामलो से जुड़े सिद्धांतो के अलावा किसी अन्य विषय पर कुछ कहा गया तब उसपर प्रतिक्रिया भी हुई। ऐसी प्रतिक्रियायें मर्यादा और अनुशासन की सीमाओं मे रहीं। हाल में ही कम से कम दो उदाहरण सामने आए जिनमें अदालत की किसी टिप्पणी पर खुलकर असहमति व्यक्त की गई तथा उसे वापस लेने या उसमें संशोधन के लिए उचित न्यायिक मंच का सहारा लिया गया। ऐसी ही एक टिप्पणी को स्वयं सुप्रीम कोर्ट पिछले दिनों संशोधन कर चुका है। निष्कर्ष यह है कि सभी को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए सीमाओ का ध्यान रखना चाहिए। यह बात विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से जुड़े सभी लोगो पर लागू होती है। सवाल यह है कि कोई भी विषयान्तर क्यों हो? न्यायाधीश एक सम्मानीय और प्रतिष्ठापूर्ण पद है। वहां से निकले शब्दों का ब्रह वाक्य के रूप लिया जाता है। प्रधान न्यायाधीश की यह अपेक्षा उचित है ‘‘हमें सिर्फ संवैधानिक सिद्धांतो के लिए ही काम करना चाहिए।’’ संवैधानिक व्यवस्था में किसी को अधिकार नही है कि वह दूसरों को उनके काम के बारे में बताये। लोकतंत्र की परिपक्वता और सफलता इसी पर टिकी है।
Thursday, March 17, 2011
लीबिया को इराक बनाने अमादा अमेरिका
---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने लीबियाई शासक मुअम्मर गद्दाफी को नया अल्टीमेटम दिया है। ओबामा का कहना है कि गद्दाफी के विरुद्ध बढ़ते जन आंदोलन के कारण उन्हें अब पद छोड़ देना चाहिए। दरअसल, अमेरिका को चिंता इस बात को लेकर है कि गद्दाफी की वफादार सेना एक बार फिर भारी पडऩे लगी है गद्दाफी के वफादारों ने विद्रोहियों के कब्जे से कुछ क्षेत्रों को मुक्त करा लिया है। लीबिया के घटनाक्रमों और गद्दाफी को पदच्युत कराने में अमेरिका और उसके पश्चिम दोस्तों की बढ़ती रुचि से आशंका यह होने लगी है कि लीबिया का हश्र इराक जैसा हो सकता है। लीबिया एक ऐसे लंबे गृहयुद्ध में उलझने जा रहा है जिसके बाद स्थायी शांति की आशा अगले कई सालों तक संभव नहीं दिखती। पिछले एक पखवाड़े के दौरान कुछ बातें स्पष्ट रूप से समझ में आई हैं। जैसे अमेरिका गद्दाफी के विरुद्ध सैन्य बल का उपयोग करने को छटपटा रहा है लेकिन इस मकसद की पूर्ति में सबसे बड़ा रोड़ा रूस, चीन और भारत हो सकते हैं। अमेरिका जैसी मनोदशा फ्रांस और ब्रिटेन की देखी जा रही है। फ्रांस और ब्रिटेन पहले ही लीबिया को नो फ्लाई जोन घोषित कर चुके हैं। ताजा रिपोर्टो से साबित हो चुका है कि ब्रिटेन ने पहले से ही अपने जासूस लीबिया में छोड़ रखे थे। अत: यह आरोप लगाने में किसी को संकोच नहीं होना चाहिए कि लीबिया में चल रहे मौजूदा विरोधी आंदोलन की रूपरेखा लंदन, पेरिस और वाशिंगटन में तैयार की गई होगी तथा मौजूदा प्रदर्शनों के रिमोर्ट कंट्रोल इन्हीं तीन राजधानियों में हैं। यह उत्सुकता का विषय हो सकता है कि लीबिया के नागरिकों के कथित दमन को लेकर आज अमेरिका, ब्रिटेन फ्रांस और यूरोपीय संघ इतना क्यों विचलित हैं? मुअम्मर गद्दाफी को इस तरह धमकियां क्यों दी जा रही हैं। हैरानी की बात है कि अमेरिका ने अपनी बातें संयुक्त राष्ट्र संघ महासचिव के मुंह से निकलवा कर अपने तर्कों को न्यायोचित ठहराने की कोशिश तक कर डाली। नि:संदेह मुअम्मर गद्दाफी को एक तानाशाह ही माना जाएगा। लीबिया के इस शासक के अब तक के कार्यकाल के दौरान आम लोगों को उतनी आजादी न मिली हो जैसी कहीं और देखी जा जाती है लेकिन यह भी सच है कि गद्दाफी ने पूरी दमदारी से चार दशकों तक लीबिया को एकसूत्र में बांधे रखा। गद्दाफी के आत्मविश्वास पूर्ण व्यवहार को लोग अकड़ कह सकते हैं। यही अकड़ अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की आंखों में मिर्च की तरह पीड़ा देती रही। गद्दाफी को सउदी अरब और मिस्र के पूर्व शासकों की तरह अमेरिका के समक्ष कभी मिमियाते नहीं देखा गया। दुनिया में इस तानाशाह के दोस्त भी कम नहीं है। भारत, रूस और चीन से लीबिया के रिश्ते ठीक-ठाक रहे हैं। ईरान, निकारागुआ, क्यूबा और ब्राजील के साथ लीबिया के संबंध बहुत अच्छे हैं। ईरान ने खुली धमकी दी है कि यदि लीबिया पर हमला किया गया तो वहां अमेरिका सैनिकों की कब्रगाह बना दी जाएगी। दरअसल, ऐसा लगता है कि अमेरिका वही गलती या साजिश लीबिया में दोहराने जा रहा है जो इराक में सद्दाम हुसैन के विरुद्ध की गई थी। एक आधुनिक इराक को अमेरिकी साजिश ने हिंसा ग्रस्त राष्ट्र में बदल डाला। अमेरिका ने अपनी कठपुतली सरकार बैठा दी परन्तु कहना मुश्किल है कि इराक में कल क्या होगा? लीबिया में अमेरिकी मंडली की रुचि गद्दाफी को सत्ता से हटाने तक सीमित नहीं है। यह क्यों न कहें कि इराक की तरह लीबिया के तेल के लिए यह सारा झगड़ा है। जार्ज डब्ल्यु बुश की सनक के चलते इराक बर्बाद हो गया। बराक ओबामा लीबिया को तहत-नहस करने पर उतारु हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने लीबियाई शासक मुअम्मर गद्दाफी को नया अल्टीमेटम दिया है। ओबामा का कहना है कि गद्दाफी के विरुद्ध बढ़ते जन आंदोलन के कारण उन्हें अब पद छोड़ देना चाहिए। दरअसल, अमेरिका को चिंता इस बात को लेकर है कि गद्दाफी की वफादार सेना एक बार फिर भारी पडऩे लगी है गद्दाफी के वफादारों ने विद्रोहियों के कब्जे से कुछ क्षेत्रों को मुक्त करा लिया है। लीबिया के घटनाक्रमों और गद्दाफी को पदच्युत कराने में अमेरिका और उसके पश्चिम दोस्तों की बढ़ती रुचि से आशंका यह होने लगी है कि लीबिया का हश्र इराक जैसा हो सकता है। लीबिया एक ऐसे लंबे गृहयुद्ध में उलझने जा रहा है जिसके बाद स्थायी शांति की आशा अगले कई सालों तक संभव नहीं दिखती। पिछले एक पखवाड़े के दौरान कुछ बातें स्पष्ट रूप से समझ में आई हैं। जैसे अमेरिका गद्दाफी के विरुद्ध सैन्य बल का उपयोग करने को छटपटा रहा है लेकिन इस मकसद की पूर्ति में सबसे बड़ा रोड़ा रूस, चीन और भारत हो सकते हैं। अमेरिका जैसी मनोदशा फ्रांस और ब्रिटेन की देखी जा रही है। फ्रांस और ब्रिटेन पहले ही लीबिया को नो फ्लाई जोन घोषित कर चुके हैं। ताजा रिपोर्टो से साबित हो चुका है कि ब्रिटेन ने पहले से ही अपने जासूस लीबिया में छोड़ रखे थे। अत: यह आरोप लगाने में किसी को संकोच नहीं होना चाहिए कि लीबिया में चल रहे मौजूदा विरोधी आंदोलन की रूपरेखा लंदन, पेरिस और वाशिंगटन में तैयार की गई होगी तथा मौजूदा प्रदर्शनों के रिमोर्ट कंट्रोल इन्हीं तीन राजधानियों में हैं। यह उत्सुकता का विषय हो सकता है कि लीबिया के नागरिकों के कथित दमन को लेकर आज अमेरिका, ब्रिटेन फ्रांस और यूरोपीय संघ इतना क्यों विचलित हैं? मुअम्मर गद्दाफी को इस तरह धमकियां क्यों दी जा रही हैं। हैरानी की बात है कि अमेरिका ने अपनी बातें संयुक्त राष्ट्र संघ महासचिव के मुंह से निकलवा कर अपने तर्कों को न्यायोचित ठहराने की कोशिश तक कर डाली। नि:संदेह मुअम्मर गद्दाफी को एक तानाशाह ही माना जाएगा। लीबिया के इस शासक के अब तक के कार्यकाल के दौरान आम लोगों को उतनी आजादी न मिली हो जैसी कहीं और देखी जा जाती है लेकिन यह भी सच है कि गद्दाफी ने पूरी दमदारी से चार दशकों तक लीबिया को एकसूत्र में बांधे रखा। गद्दाफी के आत्मविश्वास पूर्ण व्यवहार को लोग अकड़ कह सकते हैं। यही अकड़ अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की आंखों में मिर्च की तरह पीड़ा देती रही। गद्दाफी को सउदी अरब और मिस्र के पूर्व शासकों की तरह अमेरिका के समक्ष कभी मिमियाते नहीं देखा गया। दुनिया में इस तानाशाह के दोस्त भी कम नहीं है। भारत, रूस और चीन से लीबिया के रिश्ते ठीक-ठाक रहे हैं। ईरान, निकारागुआ, क्यूबा और ब्राजील के साथ लीबिया के संबंध बहुत अच्छे हैं। ईरान ने खुली धमकी दी है कि यदि लीबिया पर हमला किया गया तो वहां अमेरिका सैनिकों की कब्रगाह बना दी जाएगी। दरअसल, ऐसा लगता है कि अमेरिका वही गलती या साजिश लीबिया में दोहराने जा रहा है जो इराक में सद्दाम हुसैन के विरुद्ध की गई थी। एक आधुनिक इराक को अमेरिकी साजिश ने हिंसा ग्रस्त राष्ट्र में बदल डाला। अमेरिका ने अपनी कठपुतली सरकार बैठा दी परन्तु कहना मुश्किल है कि इराक में कल क्या होगा? लीबिया में अमेरिकी मंडली की रुचि गद्दाफी को सत्ता से हटाने तक सीमित नहीं है। यह क्यों न कहें कि इराक की तरह लीबिया के तेल के लिए यह सारा झगड़ा है। जार्ज डब्ल्यु बुश की सनक के चलते इराक बर्बाद हो गया। बराक ओबामा लीबिया को तहत-नहस करने पर उतारु हैं।
Monday, March 7, 2011
अरुंधति की जुबान को कूची का जवाब
---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
कहना मुश्किल लग रहा है कि चित्रकार प्रणब प्रकाश की उस पेंटिंग की आलोचना करें या चुप रहा जाए जिसमें बूकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुंधति राय को बिस्तर पर चीनी नेता माओ और अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी ओसामा बिन लादेन के साथ नग्रा लेटे हुए चित्रित किया गया है। प्रणब प्रकाश इससे पहले प्रसिद्ध चित्रकार एम.एफ. हुसैन की न्यूड पेंटिंग बनाकर खबरों में रह चुके हैं। माओ और लादेन के साथ अंरुधति राय के न्यूड पेंटिंग बनाने के लिए प्रणब प्रकाश का अपना तर्क है। उनका कहना है कि ‘‘अरुंधति राय उन बेरहम नक्सलियों का समर्थन करती हैं जिन्होंने बेकसूर भारतीयों के विरुद्ध युद्ध छेड़ रखा है।’’ यह लेखिका उन निर्दयी कश्मीरी हत्यारों के साथ सांठगांठ करती रही है जिन्हें अपने कृत्य पर रत्तीभर पश्चाताप नहीं होता।’’ प्रणब प्रकाश यही नहीं रुक रहे हैं। उन्होंने बुद्धिजीवी समुदाय के उन लोगों पर भी प्रहार किया जो अरुंधति राय का समर्थन करते हैं। ‘‘प्रणब का कहना है, ये लोग प्रचार की धुन में उस भूखे बंदर की तरह नाचते हैं जो एक केला खाने को मिलने की आशा में मदारी द्वारा बजाये जा रहे डमरू की आवाज में नाचता है।’’ प्रणब प्रकाश के पेंटिंग पर अंरुधति राय और उनकी बौद्धिक-वानर सेना की ओर से किसी प्रकार की प्रतिक्रिया सुनने में नहीं आई है।’’ वैसे भी वे किस मुंह से प्रणब प्रकाश की पेंटिंग का विरोध कर सकते हैं। जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में अरुंधति राय और उनकी Ÿोणी के अन्य तथाकथित बुद्धिजीवी, तमाम बकबक करते हैं, उसी अधिकार का उपयोग प्रणब प्रकाश ने किया है। अरुंधति राय को लिखना और जुबान हिलाना आता है। प्रणब प्रकाश को कैनवास पर कूची के सहारे रंग बिखेरने की कला की गहरी समझ है। अरुंधति राय जुबान से निकले हजारों शब्दों का जवाब प्रणब प्रकाश ने एक चित्र बनाकर दे दिया। निश्चित रूप से उवत पेंटिंग को सिरफिरों की अक्ल को दुरुस्त कर देने वाला माने अरुंधति राय में हत्यारों और अलगाववादियों के प्रति हमदर्दी और मोहब्बत उमड़ती है। अत: उन्हें समझ लेना चाहिए कि करोड़ों राष्ट्र भक्तों को अरुंधति के नाम से या उनकी शक्ल देखकर वमन को जी करता है। उसकी अभिव्यक्ति प्रणब प्रकाश की यह पेंटिंग कर गई। एक नारी के रूप में अरुंधति की हैसियत के बावजूद यहां उनका समर्थन करने की इच्छा नहीं हो रही है। प्रणब प्रकाश ने प्रचार के भूखे कतिपय बुद्धिजीवियों पर बड़ा सटीक प्रहार किया है। ये अपनी सिरफिरी सोच से सरकार के फैसले प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। बिनायक सेन का मामला ही लें। छत्तीसगढ़ की अदालत ने इस माओवादी को दोषी पाकर सजा सुनाई है लेकिन तथाकथित मानव अधिकारवादी और प्रचार के भूखे बुद्धिजीवी अदालत के फैसले को ही गलत बताने में जुट गये। रैलियां और प्रदर्शन आयोजित किये गये। अंग्रेजी मीडिया में बैठी वामपंथी लॉबी ने बिनायक सेन के समर्थन में अपनी पूरी ताकत झोंक डाली। सारी दुनिया में बिनायक सेन जैसे ड्रामेबाज को महान समाजसेवी और गरीबों के हमदर्द के रूप में प्रचारित किया गया। लंदन में ऐमनेस्टी इंटरनेशनल तक ने सेन की रिहाई की मांग कर दी। राहत की बात है कि सरकार न डरी न डिगी। बिनायक सेन जेल में हैं और उसे अपने अपराध के कारण जेल में ही रहना चाहिए। सेन की पत्नी कह चुकी हैं कि उसे यहां के न्याय प्रणाली पर भरोसा नहीं है। अरुंधति भी इस देश को कोस चुकी हैं। हमारा मानना है कि मिसेज सेन और अरुंधति को उस देश में चले जाना चाहिए जो उन्हें झेलने को तैयार हो। हां, अरुंधति राय को प्रणब प्रकाश की पेंटिंग की प्रिंट कापी अवश्य भेंट की जाए। उसे अहसास होना चाहिए कि ‘‘जैसे देव की वैसी पूजा’’ इसी को कहते हैं।
कहना मुश्किल लग रहा है कि चित्रकार प्रणब प्रकाश की उस पेंटिंग की आलोचना करें या चुप रहा जाए जिसमें बूकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुंधति राय को बिस्तर पर चीनी नेता माओ और अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी ओसामा बिन लादेन के साथ नग्रा लेटे हुए चित्रित किया गया है। प्रणब प्रकाश इससे पहले प्रसिद्ध चित्रकार एम.एफ. हुसैन की न्यूड पेंटिंग बनाकर खबरों में रह चुके हैं। माओ और लादेन के साथ अंरुधति राय के न्यूड पेंटिंग बनाने के लिए प्रणब प्रकाश का अपना तर्क है। उनका कहना है कि ‘‘अरुंधति राय उन बेरहम नक्सलियों का समर्थन करती हैं जिन्होंने बेकसूर भारतीयों के विरुद्ध युद्ध छेड़ रखा है।’’ यह लेखिका उन निर्दयी कश्मीरी हत्यारों के साथ सांठगांठ करती रही है जिन्हें अपने कृत्य पर रत्तीभर पश्चाताप नहीं होता।’’ प्रणब प्रकाश यही नहीं रुक रहे हैं। उन्होंने बुद्धिजीवी समुदाय के उन लोगों पर भी प्रहार किया जो अरुंधति राय का समर्थन करते हैं। ‘‘प्रणब का कहना है, ये लोग प्रचार की धुन में उस भूखे बंदर की तरह नाचते हैं जो एक केला खाने को मिलने की आशा में मदारी द्वारा बजाये जा रहे डमरू की आवाज में नाचता है।’’ प्रणब प्रकाश के पेंटिंग पर अंरुधति राय और उनकी बौद्धिक-वानर सेना की ओर से किसी प्रकार की प्रतिक्रिया सुनने में नहीं आई है।’’ वैसे भी वे किस मुंह से प्रणब प्रकाश की पेंटिंग का विरोध कर सकते हैं। जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में अरुंधति राय और उनकी Ÿोणी के अन्य तथाकथित बुद्धिजीवी, तमाम बकबक करते हैं, उसी अधिकार का उपयोग प्रणब प्रकाश ने किया है। अरुंधति राय को लिखना और जुबान हिलाना आता है। प्रणब प्रकाश को कैनवास पर कूची के सहारे रंग बिखेरने की कला की गहरी समझ है। अरुंधति राय जुबान से निकले हजारों शब्दों का जवाब प्रणब प्रकाश ने एक चित्र बनाकर दे दिया। निश्चित रूप से उवत पेंटिंग को सिरफिरों की अक्ल को दुरुस्त कर देने वाला माने अरुंधति राय में हत्यारों और अलगाववादियों के प्रति हमदर्दी और मोहब्बत उमड़ती है। अत: उन्हें समझ लेना चाहिए कि करोड़ों राष्ट्र भक्तों को अरुंधति के नाम से या उनकी शक्ल देखकर वमन को जी करता है। उसकी अभिव्यक्ति प्रणब प्रकाश की यह पेंटिंग कर गई। एक नारी के रूप में अरुंधति की हैसियत के बावजूद यहां उनका समर्थन करने की इच्छा नहीं हो रही है। प्रणब प्रकाश ने प्रचार के भूखे कतिपय बुद्धिजीवियों पर बड़ा सटीक प्रहार किया है। ये अपनी सिरफिरी सोच से सरकार के फैसले प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। बिनायक सेन का मामला ही लें। छत्तीसगढ़ की अदालत ने इस माओवादी को दोषी पाकर सजा सुनाई है लेकिन तथाकथित मानव अधिकारवादी और प्रचार के भूखे बुद्धिजीवी अदालत के फैसले को ही गलत बताने में जुट गये। रैलियां और प्रदर्शन आयोजित किये गये। अंग्रेजी मीडिया में बैठी वामपंथी लॉबी ने बिनायक सेन के समर्थन में अपनी पूरी ताकत झोंक डाली। सारी दुनिया में बिनायक सेन जैसे ड्रामेबाज को महान समाजसेवी और गरीबों के हमदर्द के रूप में प्रचारित किया गया। लंदन में ऐमनेस्टी इंटरनेशनल तक ने सेन की रिहाई की मांग कर दी। राहत की बात है कि सरकार न डरी न डिगी। बिनायक सेन जेल में हैं और उसे अपने अपराध के कारण जेल में ही रहना चाहिए। सेन की पत्नी कह चुकी हैं कि उसे यहां के न्याय प्रणाली पर भरोसा नहीं है। अरुंधति भी इस देश को कोस चुकी हैं। हमारा मानना है कि मिसेज सेन और अरुंधति को उस देश में चले जाना चाहिए जो उन्हें झेलने को तैयार हो। हां, अरुंधति राय को प्रणब प्रकाश की पेंटिंग की प्रिंट कापी अवश्य भेंट की जाए। उसे अहसास होना चाहिए कि ‘‘जैसे देव की वैसी पूजा’’ इसी को कहते हैं।
Sunday, March 6, 2011
बच्चों को वाहन न थमायें!
---अनिल बिहारी श्रीवास्तव
मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में पंद्रह वर्षीय एक किशोरी की दुपहिया वाहन दुर्घटना में मौत से आहत नीमा समाज ने बच्चों को वाहन चलाने देने के संबंध में जो निर्णय लिये उन पर सभी अभिभावकों को अवश्य ध्यान देना चाहिए। खबरों के अनुसार समाज ने निर्णय लिया है कि अब कोई भी अभिभावक अपने १८ साल से कम उम्र के बच्चों को वाहन चलाने की अनुमति नहीं देगा। १८ साल से अधिक उम्र के बच्चों को पहले वाहन चलाने का विधिवत प्रशिक्षण लेकर यातायात नियमों को जानना होगा। इसके बाद ही वे ड्राइविंग लाइसेंस के लिए आवेदन करेंगे। निश्चित रूप से नीमा समाज की यह पहल अनुकरणीय है। देश में इस समय जिस तेजी से सडक़ दुर्घटनाओं और उनमें मरने वालों की संख्या बढ़ रही है उसके साथ एक तथ्य यह जुड़ा है कि दुर्घटनाओं में दुपहिया वाहन सवारों की संख्या काफी अधिक है। ऐसा क्यों हो रहा है? मोटे तौर पर समझ में यह आता है कि देखा-देखी और होड़ के चलते बच्चे माता-पिता पर दुपहिया वाहन के लिए दबाव डालते हैं। कभी माता-पिता दबाव में आकर दुपहिया वाहन दे देते हैं और कभी अपनी सुविधा के लिए ऐसा करते हैं। कुछ अभिवाहक यह देखकर फूले नहीं समाते कि उनका बेटा या बेटी (जो पाय:१८ वर्ष से कम आयु के ही होते हैं) कैसे फर्राटे से मोटर साइकिल दौड़ा लेते हैं। ऐसे ही बच्चों के साथ दुर्घटना की स्थिति अक्सर बनते देखी जाती है। नि:संदेह १६ वर्ष से अधिक के बच्चों को बिना गियर की दुपहिया वाहन चलाने की अनुमति है लेकिन उसे चलाने से पूर्व तेज रफ्तार के जोखिम और यातायात नियमों के बारे में जानकारी होनी ही चाहिए। देखा यह जा रहा है कि संतुलन साध लेने, रफ्तार बढ़ाने-घटाने की समझ और ब्रेक लगाना सीख लेने को पर्याप्त मान लिया जाता है। जबकि इसके साथ यातायात नियमों के कड़ाई से पालन की शिक्षा जरूरी होती है। जब से तेज रफ्तार मोटर साइकिलों का चलन बढ़ा है दुर्घटनाओं की संख्या काफी बढ़ गई। छोटे-छोटे शहर से लेकर महानगरों की सडक़ों पर इन आधुनिक फटफटियों की धमा चौकड़ी देखी जा सकती है। इस मामले में नव धनाढ्यों की संतानें आगे पाई जाती हैं। वे अपनी जान जोखिम में डालने के साथ-साथ दूसरों के जीवन पर भी संकट खड़े करते रहते हैं। पुलिस रिकार्ड छान लिये जाएं ऐसे सैकड़ों मामले सामने आ जाएंगे जिनमें किसी किशोर या युवक दुपहिया वाहन चालक की गफलत से किसी की जान चली गई या कोई जीवन भर के लिए लाचार बन गया। इस स्थिति के लिए तीन पक्ष जिम्मेदार माने जा सकते हैं। एक-बच्चों को बगैर प्रशिक्षण के दुपहिया वाहन थमाने वाले माता-पिता, दो-सडक़ परिवहन विभाग जहां कुछ रुपये दलालों के माध्यम से रिश्वत देकर आसानी से ड्राइविंग लायसेंस थमा दे दिया जाता है और तीन-ट्रैफिक पुलिस जो आमतौर पर वसूली में ही व्यस्त रहती है। पिछले दिनों एक खबर आई थी। सरकार ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर सजा और जुर्माने के प्रावधानों को कड़ा कर रही है। सवाल उठता है कि इससे होगा क्या? पहले आप ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को सख्त बनाइये? बिना लाइसेंस वाहन चलाने वालों पर भारी जुर्माने का प्रावधान हो। नाबालिग बच्चे वाहन चलाते मिलें तो अभिभावकों पर दस गुना जुर्माना लगाया जाये। इसके बाद ही स्थिति में सुधार की गुंजाइश है। लेकिन नीमा समाज ने एक अभूतपूर्व रास्ता दिखाया है। सभी समाजों को विचार करना चाहिए कि हमारे बच्चों का जीवन अमूल्य है। उसकी रक्षा के लिए कुछ कड़े फैसले लेना ही चाहिए ताकि बाद मेें पछताना न पड़े।
मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में पंद्रह वर्षीय एक किशोरी की दुपहिया वाहन दुर्घटना में मौत से आहत नीमा समाज ने बच्चों को वाहन चलाने देने के संबंध में जो निर्णय लिये उन पर सभी अभिभावकों को अवश्य ध्यान देना चाहिए। खबरों के अनुसार समाज ने निर्णय लिया है कि अब कोई भी अभिभावक अपने १८ साल से कम उम्र के बच्चों को वाहन चलाने की अनुमति नहीं देगा। १८ साल से अधिक उम्र के बच्चों को पहले वाहन चलाने का विधिवत प्रशिक्षण लेकर यातायात नियमों को जानना होगा। इसके बाद ही वे ड्राइविंग लाइसेंस के लिए आवेदन करेंगे। निश्चित रूप से नीमा समाज की यह पहल अनुकरणीय है। देश में इस समय जिस तेजी से सडक़ दुर्घटनाओं और उनमें मरने वालों की संख्या बढ़ रही है उसके साथ एक तथ्य यह जुड़ा है कि दुर्घटनाओं में दुपहिया वाहन सवारों की संख्या काफी अधिक है। ऐसा क्यों हो रहा है? मोटे तौर पर समझ में यह आता है कि देखा-देखी और होड़ के चलते बच्चे माता-पिता पर दुपहिया वाहन के लिए दबाव डालते हैं। कभी माता-पिता दबाव में आकर दुपहिया वाहन दे देते हैं और कभी अपनी सुविधा के लिए ऐसा करते हैं। कुछ अभिवाहक यह देखकर फूले नहीं समाते कि उनका बेटा या बेटी (जो पाय:१८ वर्ष से कम आयु के ही होते हैं) कैसे फर्राटे से मोटर साइकिल दौड़ा लेते हैं। ऐसे ही बच्चों के साथ दुर्घटना की स्थिति अक्सर बनते देखी जाती है। नि:संदेह १६ वर्ष से अधिक के बच्चों को बिना गियर की दुपहिया वाहन चलाने की अनुमति है लेकिन उसे चलाने से पूर्व तेज रफ्तार के जोखिम और यातायात नियमों के बारे में जानकारी होनी ही चाहिए। देखा यह जा रहा है कि संतुलन साध लेने, रफ्तार बढ़ाने-घटाने की समझ और ब्रेक लगाना सीख लेने को पर्याप्त मान लिया जाता है। जबकि इसके साथ यातायात नियमों के कड़ाई से पालन की शिक्षा जरूरी होती है। जब से तेज रफ्तार मोटर साइकिलों का चलन बढ़ा है दुर्घटनाओं की संख्या काफी बढ़ गई। छोटे-छोटे शहर से लेकर महानगरों की सडक़ों पर इन आधुनिक फटफटियों की धमा चौकड़ी देखी जा सकती है। इस मामले में नव धनाढ्यों की संतानें आगे पाई जाती हैं। वे अपनी जान जोखिम में डालने के साथ-साथ दूसरों के जीवन पर भी संकट खड़े करते रहते हैं। पुलिस रिकार्ड छान लिये जाएं ऐसे सैकड़ों मामले सामने आ जाएंगे जिनमें किसी किशोर या युवक दुपहिया वाहन चालक की गफलत से किसी की जान चली गई या कोई जीवन भर के लिए लाचार बन गया। इस स्थिति के लिए तीन पक्ष जिम्मेदार माने जा सकते हैं। एक-बच्चों को बगैर प्रशिक्षण के दुपहिया वाहन थमाने वाले माता-पिता, दो-सडक़ परिवहन विभाग जहां कुछ रुपये दलालों के माध्यम से रिश्वत देकर आसानी से ड्राइविंग लायसेंस थमा दे दिया जाता है और तीन-ट्रैफिक पुलिस जो आमतौर पर वसूली में ही व्यस्त रहती है। पिछले दिनों एक खबर आई थी। सरकार ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर सजा और जुर्माने के प्रावधानों को कड़ा कर रही है। सवाल उठता है कि इससे होगा क्या? पहले आप ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को सख्त बनाइये? बिना लाइसेंस वाहन चलाने वालों पर भारी जुर्माने का प्रावधान हो। नाबालिग बच्चे वाहन चलाते मिलें तो अभिभावकों पर दस गुना जुर्माना लगाया जाये। इसके बाद ही स्थिति में सुधार की गुंजाइश है। लेकिन नीमा समाज ने एक अभूतपूर्व रास्ता दिखाया है। सभी समाजों को विचार करना चाहिए कि हमारे बच्चों का जीवन अमूल्य है। उसकी रक्षा के लिए कुछ कड़े फैसले लेना ही चाहिए ताकि बाद मेें पछताना न पड़े।
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